'अल्लाह मेरे साथ, आख़िरी सांस तक न्याय के लिए लड़ूंगी'

जन्नतबीबी कालूभाई

"मेरे अल्लाह मेरे साथ हैं, मैं अपनी आख़िरी सांस तक न्याय के लिए लड़ूंगी", ये शब्द 55 वर्षीय जन्नतबीबी कालूभाई के हैं, जो नरोदा पाटिया मामले में बजरंग दल के पूर्व नेता बाबू पटेल उर्फ बाबू बजरंगी के ख़िलाफ़ प्रमुख गवाहों में से एक हैं.

बाबू बजरंगी के ख़िलाफ़ सामने आए छह गवाहों में से जन्नतबीबी भी नरोदा पाटिया में रहती हैं. बजरंगी सलाखों के पीछे रहें इसके लिए जन्नतबीबी सुप्रीम कोर्ट जाने को तैयार हैं.

नरोदा पाटिया के जवानगर की संकरी गलियों से गुज़रते हुए जन्नतबीबी को खोजना मुश्किल नहीं है. अपने एक कमरे के घर में बैठकर वो अपना दिन प्लास्टिक के चम्मचों के गुच्छों को पैक करने में गुज़ारती हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं उतना नहीं कमा पाती जिससे मेरा गुज़ारा हो सके, लेकिन अगर बजरंगी रिहा होते हैं तो न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाने के लिए दिल्ली जाऊंगी."

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Image caption जन्नतबीबी कालूभाई

बजरंगी के ख़िलाफ़ गवाही में 'विरोधाभास'

नरोदा पाटिया नरसंहार मामले में बजरंगी के ख़िलाफ़ जन्नतबीबी गवाही का उल्लेख करते हुए हाल ही में गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि, इस गवाह के पुलिस में दिए बयान और कोर्ट के सामने दी गवाही में विरोधाभास है और माना कि बजरंगी के ख़िलाफ़ आरोप साबित करने के लिए इस गवाह की गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.

गवाह संख्या पीडब्ल्यू-142, जन्नतबीबी ने नरोदा पाटिया जनसंहार मामले की साक्षी होने का दावा किया है, जहां उपद्रव कर रहे लोगों ने एक गर्भवती महिला कौसरबानू के पेट को काट दिया था. बाद में कथित रूप से कौसरबानू और भ्रूण दोनों को जला दिया गया था. कोर्ट में अपने बयान में जन्नतबीबी ने कहा था कि इस घटना में तलवार चलाने वाले व्यक्ति बाबू बजरंगी थे.

हालांकि, कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि कौसरबानू के पेट को काटने वाले व्यक्ति के बारे में जन्नतबीबी ने तीन अलग-अलग विवरणों में तीन अलग-अलग नाम बताए हैं. पुलिस को दिए उनके बयान में जन्नतबीबी ने गुड्डु छारा को वो व्यक्ति बताया जिसने कौसरबानू की हत्या की वहीं एसआईटी को दिए बयान में उन्होंने जय भवानी की हत्या करने वाले के तौर पर पहचान की लेकिन कोर्ट में उन्होंने बताया कि बाबू बजरंगी हत्या ही वह शख़्स थे.

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "इस प्रकार, घटना की व्याख्या करने में कोई विसंगति नहीं है लेकिन अभियुक्त का नाम देने में एक विसंगति है और इसलिए गवाह के साक्ष्य अलग-अलग थे."

गुड्डु छारा और जय भवानी इस मामले में दो प्रमुख अभियुक्त हैं.

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ग़रीब हैं लेकिन लड़ेंगी जन्नतबीबी

जन्नतबीबी को डर है कि अब, जबकि माया कोडनानी बाहर आ गई हैं, अन्य अभियुक्त भी बिना सज़ा पूरी किए आने वाले सालों में बाहर आ जाएंगे. अन्य पीड़ितों की ही तरह, वो इस फ़ैसले से खुश नहीं हैं और कहती हैं, "मैं बजरंगी को 21 साल की कम सख़्त सज़ा दिए जाने से खुश नहीं हूं."

जब बीबीसी ने उनसे संपर्क किया और उस दिन हुई घटना के विषय में जानना चाहा तो उन्होंने उस बारे में कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया लेकिन कहा कि हमें न्याय चाहिए. वो कहती हैं, "इन आरोपियों को रिहा करने या बजरंगी की सज़ा को कम करने के लिए उचित कारण होना चाहिए."

बेहद ग़रीबी में रहते हुए जन्नतबीबी 1500 रुपये बतौर किराया देती हैं और अक्सर पड़ोसियों के दिए भोजन से गुज़ारा करती हैं.

बीबीसी से बातचीत के दौरान ही स्थानीय बिजली कंपनी के एक अधिकारी आते हैं और उनके घर के कटे हुए बिजली कनेक्शन को चालू करने के लिए 4600 रुपये भुगतान करने को कहते हैं.

वो उनसे कहती हैं, "मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है. मुझे बिजली के बिना ही रहने दो."

उनकी एक बेटी है, जिनकी शादी दूसरे राज्य में हुई है.

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बाबू बजरंगी और उनका पक्ष

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बजरंगी के ख़िलाफ़ 10 गवाहों में से कोर्ट ने चार पुलिस गवाहों की सुनवाई को स्वीकार किया जबकि छह मुसलमानों की गवाही को हटा दिया गया.

बीबीसी से बात करते हुए हाई कोर्ट में बजरंगी के वकील योगेश लखानी ने कहा, "कोर्ट ने आशीष खेतान के बयान के आधार पर बजरंगी के 'कोर्ट के बाहर अपराध स्वीकार करने' को उसकी स्वीकृति मान लिया. कोर्ट ने आशीष खेतान को प्रमुख गवाह के तौर पर स्वीकार कर लिया."

2012 में निचली अदालत ने बजरंगी को दोषी पाया था और मौत तक जेल में रहने की सज़ा सुनाई थी.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

हालांकि बीबीसी से बात करते हुए लखानी ने कहा कि हाई कोर्ट ने कहा कि इन्हीं धाराओं में अन्य दोषियों को निचली अदालत ने 24 साल की सज़ा सुनाई. उन्होंने कहा, "कोर्ट ने बजरंगी की सज़ा को उन अभियुक्तों के बराबर नहीं माना, जिनपर ये ही धाराएं लगाई गई हैं. इसीलिए उसने बजरंगी की सज़ा को कम करते हुए 21 साल कर दिया."

लखानी कहते हैं कि इस मामले में स्टिंग ऑपरेशन बजरंगी के ख़िलाफ़ गया. हालांकि, उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि स्टिंग ऑपरेशन में बजरंगी के अपराध कबूल करने को 'कोर्ट के बाहर अपराध स्वीकारने के साक्ष्य' के तौर पर नहीं लिया जा सकता क्योंकि स्टिंग में उन्हें शेख़ी बघारने के लिए उकसाया गया था.

बजरंगी का नाम नरोदा पाटिया के साथ साथ नरोदा गाम मामले की एफ़आईआर में भी शामिल है. उन्होंने कहा, "दोनों एफ़आईआर में उन्हें अभियुक्त के रूप में नामित किया गया है. क्या एक अभियुक्त दो जगहों पर एक साथ मौजूद रह सकता है, ये कैसे संभव है?"

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Image caption बाबू बजरंगी

क्या बजरंगी बरी हो जाएंगे?

जब गुजरात हाई कोर्ट सज़ा सुना रही थी तब विश्व हिंदू परिषद के गुजरात के महासचिव रणछोड़ भारवाड़ और उनकी टीम बजरंगी के घर पर ठहरी थी. वीएचपी बजरंगी के परिवार के साथ काम कर रही है ताकि उनका परिवार सुप्रीम कोर्ट जा सके.

बीबीसी बातचीत में भार्गव ने कहा, "बजरंगी और हम सभी हिंदुत्व के जरिए एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और हम हर जगह उनकी मदद करना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि उनके परिवार को और अधिक तक़लीफ ना हो."

वीएचपी यह सुनिश्चित करने में लगी है कि सुप्रीम कोर्ट से बजरंगी बरी हो जाएं. वीएचपी ने बजरंगी और उनके परिवार को तमाम बाधाओं से पार पाने में मदद के लिए एक कमिटी का गठन किया है.

Image caption बजरंगी का घर

बजरंगी के साथ गुजारा था एक दिन

पत्रकार आशीष खेतान के स्टिंग ऑपरेशन से पहले, मुंबई के फ़िल्म निर्माता राकेश शर्मा ने अपनी फ़िल्म "फ़ाइनल सॉल्यूशन" पर फ़ॉलो अप के लिए बजरंगी के साथ एक दिन गुजारा था.

"फ़ाइनल सॉल्यूशन" नरोदा पाटिया नरसंहार पर पुरस्कार प्राप्त वृतचित्र (डॉक्यूमेंट्री) है. शर्मा ने अपनी डॉक्यूमेंट्री पूरी करने के लिए पीड़ितों और अभियुक्तों से मुलाकात की थी.

फ़िल्म 2004 में रिलीज़ हुई और उसपर तुरंत ही प्रतिबंध लगा दिया गया था. इसे अक्तूबर 2004 में फिर जारी किया गया था.

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शर्मा ने बीबीसी से अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि वो उस व्यक्ति की (बजरंगी की) मानसिकता पढ़ना चाहते थे जिसने 2002 के नरोदा पाटिया कांड को अंजाम देने में लगभग मास्टमाइंड की भूमिका निभाई थी.

उन्होंने कहा, "जब मैं उनसे पहली बार मिला तो वो सत्ता के मद में चूर और कई राजनेताओं की नज़दीकी का आनंद उठा रहे थे." शर्मा को बजरंगी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं का अनुभव हुआ. एक आक्रामक हिंदू नेता बनने का गुण उनमें से एक था."

"गिरफ़्तारी से पहले, बजरंगी अपने एनजीओ से जुड़े काम में व्यस्त थे, जो हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों से शादी करने से बचाने का काम करता है. वो उसे 'माइंड वाश' कहते हैं. वो उन लड़कियों को अपने घर लाकर उन्हें मुसलमानों से दूर रहने के लिए सलाह देते थे. 2008 के दौरान उनका घर इस तरह की लड़कियों के लिए पनाहगाह जैसा था."

उन्होंने कहा, "संक्षेप में कहें तो अधिकांश दक्षिणपंथियों की तरह बजरंगी हमेशा हिंदुओं के लिए शुद्धता की बातें करते थे."

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Image caption गुजरात दंगा

नरोदा पाटिया मामला

गुजरात हाई कोर्ट ने नरोदा पाटिया मामले में राज्य की बीजेपी सरकार में मंत्री रहीं माया कोडनानी को बरी करने का फ़ैसला किया. इससे 2002 में हुए उस दंगे के पीड़ितों, उनके समर्थकों के साथ ही अभियुक्तों और उनके परिवार की यादें ताज़ा हो गईं.

बजरंगी के समर्थकों को राहत की उम्मीद है जबकि पीड़ियों को नाइंसाफ़ी का डर. हालांकि, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में मामले के जाने का इंतजार है.

28 फरवरी 2002 को विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के बंद के आह्वान के दौरान अहमदाबाद के नरोदा पाटिया इलाके में दंगों के दौरान मुस्लिम समुदाय के 97 लोगों की मौत हो गई थी. हिंसा में 33 लोग घायल भी हुए थे.

स्थानीय पुलिस और सुप्रीम कोर्ट की नियुक्त विशेष जांच टीम ने 62 लोगों को अभियुक्त बनाया. इनमें से 32 लोगों को निचली अदालत ने दोषी करार दिया. गुजरात हाई कोर्ट ने अपने हाल के आदेश में इन 32 लोगों में से 18 लोगों को बरी कर दिया.

दंगे में मारे गए अधिकांश मुसलमान कर्नाटक के गुलबर्ग से थे और दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करते थे. 2002 से अब तक उनमें से कई पीड़ित परिवार नरोदा पाटिया से चले गए हैं. वे अहमदाबाद के वातवा, जुहापुरा और सरखेज इलाके में रह रहे हैं.

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