ब्लॉगः टीम मोदी ने परफ़ेक्ट कर ली है मुद्दों को किनारे लगाने की तकनीक

  • 28 अप्रैल 2018
अमित शाह, नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली इमेज कॉपीरइट Getty Images

ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब 'मानो या न मानो', 'विचित्र किंतु सत्य' जैसे कॉलम या रेडियो पर लोकरुचि समाचार का एक साप्ताहिक बुलेटिन होता था. ये समाचारों की भरपूर खुराक के साथ, अचार के एक टुकड़े जैसे थे.

अब ये देश मानो अचार से ही पेट भरने लगा है, इसका उसकी सेहत पर क्या असर होगा, ये भी मुद्दा नहीं है.

इस समय देश के बड़े मुद्दे क्या हैं? जब तक आप इसका जवाब दें, तब तक दृश्य बदल जाता है. इस समय देश में बहुत सारे मुद्दे हैं या कोई मुद्दा नहीं है, यह समझना कठिन है. टीवी पर आठ अलग-अलग खिड़कियों में बैठे लोग, एक-दूसरे पर चीख़ रहे होते हैं तो लगता है कि ज़रूर ये ज्वलंत मुद्दा है, लेकिन अगले दिन उसका अता-पता तक नहीं होता.

भारत में मुद्दे भी अब मनोरंजन का साधन बन गए हैं, और लोगों को हर रोज़ नया मनोरंजन चाहिए, इसलिए फॉलोअप या एक मुद्दे पर टिके रहने में मीडिया की रुचि नहीं रह गई है. चाहे कितना भी बड़ा मामला हो, वो दो-चार दिन के बाद सुर्खि़यों में नहीं रहता. ये किसी भी सरकार के लिए कितनी राहत की बात है.

मनोरंजन जितना अधिक, मुद्दा उतना बड़ा. 'पद्मावती' को लेकर हुआ विवाद पूरे देश के सामूहिक बुद्धि-विवेक की मेडिकल रिपोर्ट है. फ़िल्म को लेकर उठे बवाल ने दिखाया कि तरह-तरह के बयानबाज़ किस तरह देश की चेतना पर चढ़ बैठे हैं, इनमें कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हैं.

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अंतर समझना ज़रूरी

मुद्दे, बयान और विवाद तीन अलग-अलग चीज़ें हैं. सामूहिक समझदारी वाले देशों में लोग इन तीनों में फ़र्क़ समझते हैं. थोड़ा ग़ौर करने पर आप समझ सकते हैं कि पूरे देश में चीज़ें एक ख़ास पैटर्न पर चल रही हैं.

ग़रीबी, बेरोज़गारी, शिक्षा का हाल, महिलाओं की सुरक्षा, सामाजिक न्याय, मेडिकल केयर की बदहाली, क़ानून-व्यवस्था की हालत, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, संवैधानिक संस्थानों की दुर्दशा और भ्रष्टाचार वगैरह मुद्दे हैं. लेकिन अगर ये मुद्दे हैं तो इन पर चर्चा होनी चाहिए, कितनी चर्चा आप सुनते हैं इन मुद्दों पर? सुनते हैं तो घोषणाएँ, प्रचार या फिर आरोप, चर्चा नहीं होती. बाक़ी दुनिया में मुद्दे की बात पर चर्चा होती है.

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पद्मावती का चरित्र-चित्रण ही नहीं, ताजमहल में पूजन, भारतीय जनसंचार संस्थान में हवन, हल्दीघाटी की लड़ाई में राणा प्रताप की जीत, जींस पहनने वाली औरतों पर टीका-टिप्पणी जैसी सैकड़ों मिसालें हैं जब बोगस मुद्दे खड़े किए गए जिनका व्यापक जनहित से कोई ताल्लुक नहीं था.

बयान वो है जो विवाद पैदा करने की मंशा से दिया जाता है, बयान से पैदा हुआ विवाद अक्सर जान-बूझकर बढ़ाया जाता है, फिर मुद्दों को ढाँपने के लिए विवाद का इस्तेमाल अपने-आप हो जाता है.

जो मुद्दे पिछले कुछ समय में उछाले गए हैं उनमें तीन तरह के पैटर्न दिखते हैं. पहला पैटर्न है--गणेशजी की प्लास्टिक सर्जरी, पुष्पक विमान से लेकर महाभारत में इंटरनेट की मौजूदगी तक, ऐसे सभी बयानों का मक़सद हिंदू संस्कृति के प्राचीन वैभव का बखान है.

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दूसरा पैटर्न है--'मुसलमानों की बढ़ती आबादी पर रोक' की माँग, संविधान में से सेक्युलर शब्द हटाने का ज़िक्र, भारत के सभी मुसलमानों को पाकिस्तानी या आतंकवादी बताने वाले ढेर सारे बयान, जिनका उद्देश्य मुसलमानों को हमेशा दबाव और शक के दायरे में रखना है.

तीसरा पैटर्न है- जब सरकार किसी मुद्दे पर घिर रही हो तो ऐसी स्थितियाँ पैदा करना जिनसे ध्यान कांग्रेस की ऐतिहासिक ग़लतियों पर जाए या हेडलाइन उससे छीन ली जाए.

इसके बीसियों उदाहरण हैं. ताज़ा मिसाल है संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा न होने पर कांग्रेस का अनशन, इस अनशन के जवाब में बीजेपी का अनशन. यानी जो मैच जीता न जा सके, उसे अक्रामक तरीक़े से ड्रॉ करा दिया जाए.

इस तिहरी रणनीति के तीन फ़ायदे भी हैं--हिंदुत्व की हुंकार में आनंदमग्न जनता को लगता है कि सरकार हिंदुओं की वाहवाही और मुसलमानों की फज़ीहत कर रही है, और दूसरा ये कि सरकार की नाकामियों और जवाबदेही पर चर्चा की नौबत तक नहीं आती और तीसरा ये कि विपक्ष दबाव बनाने की जगह, ख़ुद ही दबाव में आ जाता है.

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ऐसा नहीं है कि चार साल पहले सोशल मीडिया नहीं था, या तब ज्वलंत मुद्दे नहीं थे, ये भी नहीं है कि कांग्रेस की सरकार अपनी आलोचना को लेकर बेपरवाह थी और मीडिया को कंट्रोल में नहीं रखना चाहती थी. कांग्रेस वह पार्टी है जिसने देश में इरमजेंसी लगाई, राजीव गांधी पत्रकारों पर अंकुश लगाने के लिए 1988 में मानहानि विधेयक लेकर आए जो विरोध के बाद वापस ले लिया गया.

भाजपा ने प्रेस पर नियंत्रण के मामले में सख़्ती की जगह, चुस्ती और चतुराई का सहारा लिया है. सरकार की आलोचना करना या मुश्किल सवाल पूछना, पहले से अधिक मुश्किल हो गया है. अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स सां फ्रांतिए (रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर) की ताज़ा रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पिछले साल के मुक़ाबले भारत दो पायदान नीचे खिसककर 138वें नंबर पर चला गया है. रिपोर्ट यहाँ देखिए.

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Image caption पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि को लेकर मई 2012 में सड़कों पर प्रदर्शन करते लोग

अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में तेल और डीज़ल की क़ीमतें गिरने के बावजूद भारत में उनकी क़ीमतें आसमान छू रही हैं और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार ने उस पर भारी टैक्स लगा रखा है, आज अगर भाजपा विपक्ष में होती तो तेल की क़ीमतों पर हाहाकार मच जाता लेकिन कांग्रेस को जैसे लकवा मार गया हो. विपक्ष में भाजपा के शानदार प्रदर्शन से राहुल गांधी ने कुछ भी सीखा हो, ऐसा लगता तो नहीं है.

Image caption किसानों का प्रदर्शन

मुद्दे की बात करना इतना मुश्किल क्यों?

शायद आपको याद होगा कि जब हज़ारों किसान 180 किलोमीटर पैदल चलकर, पैरों में छाले लिए मुंबई पहुँचे थे तो टीवी चैनल मोहम्मद शमी और उनकी बीवी की तकरार दिखाते रहे, इससे पहले उन्होंने दसियों दिन गुरमीत राम-रहीम की गुफ़ा दिखाने और हनीप्रीत की तलाश में निकाल दिए थे.

मीडिया इसमें क्या कुछ सरकार की मदद करने के लिए कर रहा है, क्या कुछ टीआरपी के लिए, ये पता लगाना या साबित करना कठिन काम है लेकिन इस पर कौन एतराज़ कर सकता है कि पत्रकार भी कभी-कभार ही सही, मौक़ा मिलने पर भी सरकार से ज़रूरी और मुश्किल सवाल पूछते नहीं दिख रहे जो उनकी ज़िम्मेदारी है.

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Image caption विज्ञापन पर सरकार ने ख़र्चे पौने चार हज़ार करोड़ रुपये

सरकार की कोशिशों और उसकी कामयाबियों के विज्ञापनों से पूरा देश गुंजायमान है. एक आरटीआई के जवाब से पता चला कि मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से दिसंबर 2017 के बीच सरकार ने विज्ञापनों पर लगभग पौने चार हज़ार करोड़ रु. यह रकम 'मंगलयान' के कुल ख़र्च से सात गुना ज़्यादा है.

जनता का इतना पैसा विज्ञापनों पर ख़र्च करने वाली सरकार जानती है कि लोग प्रचार और ख़बरों में अंतर समझते हैं इसलिए सरकार राजनीतिक प्रबंधन के केंद्र में 'हेडलाइन मैनेजमेंट' को रखती है, इसमें वो काफ़ी सफल भी रही है, उसका फ़ोकस साफ़ है--मुद्दे हेडलाइन में नहीं होने चाहिए, अगर हों तो सरकार को नहीं, विपक्ष को परेशानी में डालने वाले होने चाहिए.

एक मिसाल देखिए, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के फरार होने के बाद सरकार ने जिस फुर्ती से मीडिया में चलने वाली हेडलाइनों का रुख़ मोड़ा वो गज़ब था, सरकार के कई मंत्रियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि सभी लोन तब दिए थे जब कांग्रेस सत्ता में थी जो बात अगले दिन ग़लत साबित हुई.

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम के बेटे कार्ति की गिरफ़्तारी की टाइमिंग भी दिलचस्प थी. ग़ौर करें कि उनकी गिरफ़्तारी देश से बाहर जाते समय नहीं की गई, देश में लौटने पर की गई, अच्छी हेडलाइन के लिए उन्हें एयरपोर्ट पर गिरफ्तार किया गया, जिससे ऐसा आभास हुआ कि वे देश छोड़कर भागने वाले थे.

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Image caption नीरव मोदी

जब नीरव मोदी मामला गर्म था और सरकार की किरकिरी हो रही थी तभी कई ऐसी चीज़ें हुईं जिन्हें राजनीति को समझने वाले संयोग नहीं मान सकते, ज़मीन घोटाले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के ख़िलाफ़ चार्जशीट फ़ाइल हो गई, पंजाब के मुख्यमंत्री के दामाद गुरपाल सिंह के ख़िलाफ़ एफ़आइआर दर्ज हो गई और कांग्रेस के नेता अभिषेक मनु सिंघवी की पत्नी को इनकम टैक्स विभाग का नोटिस मिल गया कि उन्होंने नीरव मोदी से हीरे कैसे ख़रीदे.

ज़ाहिर है, ये सभी ख़बरें हेडलाइन बनीं, इन लोगों के दोषी होने, न होने का फ़ैसला तो अदालत करेगी लेकिन सरकार ने नीरव मोदी की फ़रारी से हो रही बदनामी को मैनेज करने के लिए समानांतर सुर्ख़ियाँ पैदा कीं, ऐसे उदाहरण आपको लगभग हर मामले में मिल जाएँगे. जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह के बहीखातों की तफ़्सील 'द वायर' ने छापी तो हंगामा खड़ा हो गया.

इस संकट से निबटने के लिए आपराधिक मानहानि और दीवानी मानहानि के दो मुकदमे गुजरात में दर्ज कराए गए, 'द वायर' से 100 करोड़ रुपए के हर्जाने की माँग की गई. 'द वायर' पर मुकदमे से इमेज की लड़ाई के लिए हेडलाइन का हथियार मिल गया, लेकिन मुकदमे को लेकर जय शाह कितने गंभीर थे इसका आभास तब मिला जब केस की पहली दो तारीख़ों 11 अक्तूबर और 12 नवंबर को मुकदमा दायर करने वाले जय शाह अदालत गए ही नहीं.

Image caption कठुआ और उन्नाव रेप की घटनाओं को लेकर सड़कों पर उतरे लोग

इसके अलावा, कठुआ में एक मुसलमान लड़की के साथ मंदिर में हुए कथित बलात्कार और हत्या का मामला जब तूल पकड़ गया तो भाजपा से जुड़े लोगों ने सासाराम में हुए बलात्कार पर ज़्यादा कवरेज की माँग सोशल मीडिया पर तेज़ कर दी, और अब शायद कठुआ कांड का जवाब मिल गया है, दिल्ली के गाज़ीपुर में एक मदरसे में एक हिंदू लड़की के साथ हुए कथित बलात्कार को लेकर भाजपा के दो सांसद -- महेश गिरि और मनोज तिवारी सड़कों पर उतर आए हैं.

ज्यादातर लोग तो यही कहेंगे कि रेप तो रेप है, सभी बलात्कारों की निंदा होनी चाहिए लेकिन भाजपा मानो चाहती है कि जब दोषी या अभियुक्त मुसलमान हो तो अधिक निंदा की जाए और हिंदू हो तो कम. सोशल मीडिया पर पत्रकारों पर आरोप लगाए जाते हैं कि वे कठुआ पर अधिक रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हैं और आसाराम पर कम क्यों, इसके तीन मक़सद होते हैं--सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सरकार को दिक्कत में डालने वालों को चुप कराना और सरकार को जवाबदेही से बचाना.

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ग़ौर करने की बात ये भी है कि जब भी कोई मुद्दा गर्म होता है, चाहे वो रोहित वेमुला की आत्महत्या हो, गोरखपुर में अस्पताल में बच्चों की मौत या अख़लाक की हत्या या फिर दलितों पर अत्याचार का मामला, प्रधानमंत्री मुँह नहीं खोलते, कम से कम तब तो नहीं जब मामला गर्म हो.

ऐसा इसलिए है क्योंकि मोदी जानते हैं कि दो-चार दिन धैर्य रखने की बात है, मुद्दा कैसा भी क्यों न हो, उसे दो-चार दिन में किनारे लगाने की तकनीक उनकी टीम ने परफेक्ट कर ली है.

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