विवेचनाः मुसलमान क्यों पागल थे हेमवती नंदन बहुगुणा के लिए?

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्र भानु गुप्त अक्सर कहा करते थे, 'बहुगुणा के नाम पर मत जाइए. उनका व्यक्तित्व और चरित्र उसके ठीक उल्टा है.'

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में से एक रहे सी बी गुप्ता को बहुगुणा की तिकड़म का स्वाद तब चखना पड़ा, जब 1974 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने गढ़ लखनऊ में न सिर्फ़ वो हारे, बल्कि उनकी ज़मानत भी ज़ब्त हो गई, 1977 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब दोनों एक पार्टी में आ गए तो गुप्ता ने बहुगुणा से पूछ ही लिया, 'बहुगुणा अब बता ही डालो कि 1974 में तुमने किया क्या था?'

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Image caption ज्योति बसु के साथ हेमवती नंदन बहुगुणा

सबसे चतुर नेताओं में थी गिनती

1977 के लोकसभा चुनाव के बाद जब मत पेटियों को सेफ़ हाउज़ में रखा जा रहा था, तो बहुगुणा ने ये सुनिश्चित करवाया कि उस सेफ़ हाउज़ के रोशनदान तक को सील किया जाए.

चंद्र भानु गुप्त ने उस समय बड़ी दिलचस्प और बारीक टिप्पणी की थी, 'अब मुझे पता चला कि उस चुनाव में मेरी ज़मानत क्यों ज़ब्त हुई थी.'

इस घटना में सच्चाई हो या न हो, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने ज़माने में हेमवती नंदन बहुगुणा की गिनती भारत के सबसे चतुर नेताओं में होती थी.

बहुगुणा को नज़दीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार बी एन उन्याल कहते हैं, 'बहुगुणा बहुत तेज़ थे, मेधावी थे. बहुत जल्दी हर इंसान की नब्ज़ पहचान लेते थे. एक नज़र से किसी को भाँपना, तोल लेना और ये अंदाज़ा लगा लेना कि वो किस काम के काबिल है, बहुगुणा की ख़ूबी थी.'

वो कहते हैं, 'उस दौर में उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश के लोगों के बारे में इतनी जानकारी हो गई थी कि वो हर पंचायत से लेकर ब्लॉक और राज्य तक वो हर नेता को न सिर्फ़ नाम से बल्कि शक्ल से भी जानते थे. और अपनी पार्टी के नेता को ही नहीं, बल्कि विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भी. और खाली जानना ही नहीं था, बल्कि जिसे कहते हैं गोट बैठाना. वो जानते थे कि किस की नब्ज़ कहाँ है? कौन किसकी सुनता है? किस का किस पर असर है? कौन किसके कहने से क्या करेगा? कौन हाँ कहेगा? कौन न कहेगा? कैसे इससे हाँ कहलवाना है? ये सब गुर उनमें थे.'

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Image caption राजकुमारी अमृत कौर

राजकुमारी अमृत के चुनाव से बहुगुणा ने खींची सबकी नज़र

बहुगुणा की राजनीति की शुरुआत इलाहाबाद से हुई थी, जहाँ वो पहले छात्र नेता और फिर मज़दूर नेता हुआ करते थे. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान तब बनी जब जवाहरलाल नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रही राज कुमारी अमृत कौर का चुनाव लड़वाने मंडी भेजा.

बी एन उन्याल बताते हैं, '1952 में पहले संसदीय चुनाव में राज कुमारी अमृत कौर को हिमाचल प्रदेश के मंडी संसदीय सीट से टिकट दिया गया था. वो कभी पहाड़ों पर गई नहीं थी. कुछ दिनों में वो तंग आ गईं और नेहरू को फ़ोन कर उन्होंने कहा, कहाँ भेज दिया तुमने मुझे जवाहर लाल? मेरे लिए बड़ा मुश्किल हो रहा है. किसी को मेरी मदद के लिए यहाँ भेजो तुरंत. पंडितजी ने इलाहाबाद में कभी आनंद भवन में बहुगुणाजी को देखा होगा. उन्होंने शास्त्रीजी से कहा, वो इलाहाबाद में जो पहाड़ी लड़का था न बहुगुणा, वो कहाँ है आज कल? शास्त्रीजी ने कहा, वहीं होगा इलाहाबाद में. नेहरू ने कहा, उसे तुरंत मंडी भेजो, अमृत के चुनाव में काम करने के लिए.'

वो कहते हैं, 'बहुगुणा ने इससे पहले कभी मंडी का नाम भी नहीं सुना था. लेकिन जवाहरलाल समझते थे कि चाहे यूपी का पहाड़ी हो या हिमाचल का, सब एक जैसे हैं. बहरहाल बहुगुणा वहाँ पहुंचे और उन्होंने दो महीने राज कुमारी अमृत कौर के चुनाव के लिए जम कर काम किया. चुनाव जीतने के बाद दिल्ली लौट कर अमृत कौर ने नेहरू से बहुगुणा की जम कर तारीफ़ की. वहाँ से वो जवाहरलाल की नज़र में आ गए. उसके बाद स्थानीय कांग्रेस में भी उनका क़द बढ़ गया. उससे उनको फ़ायदा ये हुआ कि उन्हें चार लोग जानने लगे. दिल्ली में उनकी इतनी पहचान हो गई कि जब वो लोगों से मिलने जाएं, तो लोग उन्हें मुंह लगाने लगे.'

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Image caption जवाहर लाल नेहरू

जब बहुगुणा ने नेहरू की मीटिंग की बत्ती गुल कराई

राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए बहुगुणा अपनी तरफ़ से भी काफ़ी जतन करते थे.

मशहूर पत्रकार जनार्दन ठाकुर ने अपनी किताब 'ऑल द जनता मेन' में बहुगुणा से जुड़ा एक बहुत मज़ेदार किस्सा लिखा है, '1951 में जब जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो वो इलाहाबाद आए. लाल बहादुर शास्त्री ने बहुगुणा को बुला कर कहा कि वो नेहरू के स्वागत के लिए एक बहुत बड़ी रैली कराएं.'

वो कहते हैं, 'बहुगुणा ने पुरुषोत्तम लाल टंडन पार्क में लोगों की भीड़ जमा करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया. जब रैली हुई तो टंडन पार्क लोगों से खचाखच भरा हुआ था. लेकिन बहुगुणा को मंच पर नहीं जाने दिया गया. वो भीड़ के पीछे चले गए और चाट खाने लगे. अचानक चारों तरफ़ अंधेरा छा गया. बत्ती चली गई और सब कुछ सुनाई देना बंद हो गया. लोग बेचैन हो उठे और भीड़ के बीच बहुगुणा, बहुगुणा की आवाज़े उठने लगीं. बहुगुणा भागते हुए मंच पर पहुंचे. जैसे ही उनके कदम मंच पर पड़े, बत्ती वापस आ गई. लोगों ने नेहरू की उपस्थिति में ही नारा लगाया, 'बहुगुणा ज़िदाबाद'!'

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Image caption इंदिरा गांधी

मुख्यमंत्री बनते ही इंदिरा से मतभेद शुरू

बहुगुणा के आलोचक कहते हैं कि ये सब बहुगुणा ने खुद करवाया था. 1971 में इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद इंदिरा गाँधी ने उन्हें पहले अपने मंत्रिमंडल में संचार राज्यमंत्री बनाया और फिर 1974 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना कर उन्हें लखनऊ भेजा. लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही उनके और इंदिरा गाँधी के बीच मतभेद शुरू हो गए.

ख़ुद बहुगुणा ने एक बार बीबीसी से बात करते हुए कहा था, 'मेरे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही मेरे और इंदिरा गाँधी के बीच एक बुनियादी बात पर झगड़ा हो गया. उनका ख़्याल था कि मैं हर काम उनसे पूछ कर करूंगा. मेरा कहना था कि 'बैक सीट ड्राइविंग' संभव नहीं है. इतने बड़े प्रदेश को चलाने वाले मुख्यमंत्री को अपना फ़ैसला ख़ुद लेना होगा. मैंने उनसे साफ़ कहा कि मेरे कंधे पर आपका सिर नहीं हो सकता. वो चाहती थीं कि मैं उनके लड़के को लेकर उत्तर प्रदेश में घूमूं, जैसे कि राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री कर रहे थे. मैंने इंकार कर दिया. मैंने कहा उन्हें अपने पैरों पर चलना होगा. वो काम करें, आगे बढ़ें, लेकिन मेरे कंधों पर ये नहीं हो सकता.'

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राज्यसभा चुनाव में बिरला की हार

उसी दौरान मशहूर उद्योगपति के. के. बिड़ला ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का चुनाव लड़ा. उन्हें इंदिरा गाँधी का समर्थन हासिल था, लेकिन बहुगुणा ने उनका विरोध किया, जिसकी वजह से वो चुनाव हार गए.

हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी रीता बहुगुणा जो कि इस समय उत्तर प्रदेश सरकार में पर्यटन मंत्री हैं बताती हैं, 'के. के. बिड़ला की आप आत्मकथा उठा लीजिए. उन्होंने बहुगुणा पर पाँच छह पन्ने लिखे हैं. इंदिराजी ने उन्हें समर्थन दिया, लेकिन गुप्त रूप से, खुल कर नहीं और न ही उन्होंने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया. पिताजी का कहना था कि अगर पार्टी इन्हें अपना उम्मीदवार बनाए, तब तो मैं इन्हें जिताउंगा, वर्ना नहीं. मेरे पिता 'लेफ़्ट टु सेंटर' की राजनीति करते थे. उन्होंने कहा कि मैं किसी पूंजीपति को बिना पार्टी का समर्थन मिले, नहीं जिता सकता.'

वो कहती हैं, 'इंदिराजी खुलेआम बिड़ला का समर्थन नहीं करना चाहती थीं, क्योंकि उनकी प्रगतिशील नेता की छवि थी. संजय गांधी ने पापा को बुलवाया. वो नहीं गए. आप बिड़ला की आत्मकथा उठा कर पढ़ लीजिए. वो कहते हैं कि संजय गाँधी ने कहा कि बिड़ला को इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा. इंदिरा और संजय इस बात से बहुत नाराज़ हुए और ये एक कारण बना बहुगुणा के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से जाने का.'

जब नाक टूटने पर भी इंदिरा ने बोलना जारी रखा

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Image caption अजमेर शरीफ में हेमवती नन्दन बहुगुणा

इंदिरा के आँख की किरकिरी

इसके अलावा कुछ ऐसी भी चीज़े हो गईं जिसकी वजह से इंदिरा गाँधी को भ्रम हो गया कि बहुगुणा उनकी कुर्सी हथियाने की फ़िराक में हैं.

बी. एन. उनियाल बताते हैं, 'बहुगुणा ने एक बार लखनऊ में 'ग्लोबल मुस्लिम कांफ़्रेंस' कराई. वो बहुत अच्छे इंतेज़ामकर्ता थे. छोटी छोटी बातों का बहुत ध्यान रखते थे. हर मुल्क के प्रतिनिधि ने जब लखनऊ से दिल्ली आ कर इंदिरा गाँधी से मुलाकात की तो एक स्वर से कहा कि बहुगुणा बहुत क़ाबिल है. चारों तरफ़ उनकी वाह वाह शुरू हो गई, ख़ास तौर से मुस्लिम समाज में.'

वो कहते हैं, 'इंदिरा गाँधी के एक ख़ास दरबारी होते थे मोहम्मद यूनुस. एक बार इंदिरा ने उन्हें मध्यपूर्व देशों के दौरे पर भेजा. उन्होंने वापस आ कर बताया कि वहाँ तो हर शख़्स बहुगुणा का ही नाम ले रहा है. कहते हैं मोहम्मद यूनुस ने बहुगुणा के ख़िलाफ़ इंदिरा गाँधी के काफ़ी कान भरे. उनको समझाया गया कि बहुगुणा ज़मीन तैयार कर रहे हैं प्रधानमंत्री बनने के लिए.'

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Image caption एक सभा के दौरान जगजीवन राम, इंदिरा गांधी, उमा शंकर दीक्षित और कलमापति त्रिपाठी के साथ हेमवती नंदन बहुगुणा

मुसलमान मानते थे बहुगुणा को अपना सबसे बड़ा नेता

चाहे नवाब हों या आम मुसलमान लोग, सभी बहुगुणा के मुरीद थे. जवाहरलाल के बाद अगर उत्तर प्रदेश का मुसलमान किसी को अपना नेता समझता था, तो वो थे हेमवती नंदन बहुगुणा. मुज़फ़्फ़रनगर से ले कर गोरखपुर तक वो मुसलमानों के अकेले नेता थे.

उनको उर्दू बोलने का शौक था और वो अक्सर अपने भाषणों में शेरो-शायरी किया करते थे, जिसे मुसलमान बेहद पसंद करते थे.

हाँलाकि उनके आलोचक कहा करते थे कि वो अपने उर्दू भाषण देवनागरी में लिखवा कर उन्हें रट लिया करते थे. आज कल के राजनीतिक इफ़्तारों से कहीं पहले बहुगुणा ने इफ़्तार पार्टियाँ देना शुरू किया था.

कई बार किसी पब्लिक मीटिंग के दौरान अज़ान की आवाज़ सुनाई देना पर वो बोलना बंद कर देते थे. ईद के दिन उन्हें ईदगाह के बाहर मुसलमानों से गले मिलते देखा जाता था. ये चीज़े उन्हें मुसलमानों से जोड़ती थी लेकिन उनके आलोचक इसे 'स्टंट' की संज्ञा देते थे.

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खाना बनाने के शौकीन थे बहुगुणा

बहुगुणा की बेटी रीता बहुगुणा बताती हैं, 'पिताजी पढ़ते बहुत थे. उनकी याददाश्त ग़ज़ब की थी. कोई चीज़ भूलते नहीं थे.'

वो कहती हैं, 'उन्हें खाना बनाने का शौक था. जब वो बहुत मूड में होते थे, तो कहते थे आज चूल्हा जलाओ. उस ज़माने में कोयले पर खाना बना करता था. वो बेहतरीन 'कुक' थे. वो पुलाव बहुत अच्छा बनाते थे. वो जिन सब्ज़ियों पर हाथ लगा देते ते, उनमें स्वाद ही स्वाद भर जाता था. वो नॉन वेजेटेरियन थे. नॉनवेज खाना भी वो बहुत अच्छा बनाते थे. संगीत का उन्हें इतना शौक नहीं था, लेकिन सहगल के गाने उन्हें बहुत पसंद थे.'

Image caption बाबू जगजीवन राम

जगजीवन राम से बहुगुणा की गुप्त मुलाकातें

1977 में जब आम चुनाव की घोषणा हुई तो बहुगुणा ने जगजीवन राम से कई बार गुप्त मुलाकातें की.

जनार्दन ठाकुर अपनी किताब ऑल द जनता मेन में लिखते हैं, 'बहुगुणा ने बहुत होशियारी से ऐलान करवा दिया कि वो यूपी निवास में बीमार पड़े हैं. कई डॉक्टर उनके कमरे में आते जाते, जिससे ये ख़बर फैल गई कि बहुगुणा वाकई गंभीर रूप से बीमार हैं.'

उन्होंने आगे लिखा, 'जैसे ही रात होती वो एक मुड़ी तुड़ी धोती निकालते, अपने आप को कंबल से ढ़कते और जगजीवन राम के 6 कृष्ण मेनन वाले निवास पर पहुंच जाते. वहाँ वो न सिर्फ़ जगजीवन राम से बातें करते, बल्कि उनकी पत्नी और बेटे सुरेश राम से भी बतियाते. फिर वो उसी भेष में शाही इमाम से मिलने जामा मस्जिद चले जाते.'

बी. एन. उनियाल बताते हैं, 'वो पहले इस संबंध में चव्हाण साहब से मिले. उन्होंने कहा कि ये क्या बेवकूफ़ी की बात कर रहे हो. उन्हें इस बात का डर था कि कहीं उनकी बातें टेप न की जा रही हों. इसलिए वो उनसे अपने लॉन में आ कर बातें करते थे. आख़िर में वो माने नहीं. जब बहुगुणा ने अपना ध्यान जगजीवन राम पर केंद्रित किया. उनसे मिलने के लिए उन्हें बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी.'

वो कहते हैं, 'हमारे जैसे दोस्त उनके काम आते थे. वो टैक्सी लेकर आते थे और इंडिया गेट पर उतर जाते थे. फिर वहाँ से पैदल जोधपुर हाउज़ जाते थे. फिर वहाँ से दूसरी गाड़ी बदल कर किसी तरह जगजीवन राम के घर पहुंचते थे. शुरू में उनको राज़ी करना भी बहुत मुश्किल था. जब बहुगुणा ने उन्हें समझाया कि आप अगले प्रधानमंत्री बनेंगे, तब जा कर वो राज़ी हुए. इसमें बहुगुणा से ज़्यादा भूमिका उनके बेटे सुरेश राम ने निभाई और बहुगुणा ने सुरेश राम पर भी काफ़ी काम किया.'

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कांग्रेस में फिर वापसी और इस्तीफ़ा

जनता पार्टी सरकार दो साल से अधिक चल नहीं पाई. बहुगुणा ने एक बार फिर इंदिरा कांग्रेस का दामन पकड़ा. वहाँ एक बार फिर इंदिरा गाँधी से उनकी नहीं बनी और फिर उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी.

बहुगुणा ने एक बार बीबीसी को खुद बताया था, 'मैं जनता पार्टी और बाद में चरण सिंह के साथ बहुत खुश नहीं था. इंदिरा गाँधी के लोगों ने मुझसे संपर्क किया. नेहरू जयंती के दिन वो शाँति वन से लौटते हुए सपरिवार मेरे सुनहरीबाग रोड वाले निवास पर रुकीं. संजय, राजीव, सोनिया, राहुल और प्रियंका सब उनके साथ थे. वहीं इंदिरा ने संजय से कहा कि मामाजी के पैर छुओ.'

वो कहते हैं, 'इसके बाद मेरी और उनकी क्नॉट प्लेस के एक होटल सेंटर पॉइंट में लगातार चार दिनों तक मुलाकात हुई. धवन उन्हें अपनी कार में बैठा कर लाते थे. उन्होंने मुझे अपनी पार्टी का सेक्रेटेरी जनरल बनाया. लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने मेरी अवहेलना करनी शुरू कर दी और मेरे लिए उनकी पार्टी में सम्मान के साथ रहना मुश्किल हो गया. मैंने न सिर्फ़ उनकी पार्टी छोड़ी, बल्कि गढ़वाल लोकसभा सीट से भी इस्तीफ़ा दे दिया.'

Image caption बीबीसी स्टूडियो में वरिष्ठ पत्रकार बी. एन. उनियाल के साथ रेहान फ़ज़ल

इलाहाबाद में हार

बहुगुणा इलाहाबाद में 1984 का लोकसभा चुनाव अमिताभ बच्चन से हार गए. इसके बाद उनका राजनीतिक जीवन कभी उठ नहीं पाया. बहुगुणा शायद उन ऊँचाइयों को नहीं छू पाए जिसकी कि उनके प्रशंसक या वो ख़ुद उम्मीद करते थे. लेकिन एक बात तय थी कि वो आम राजनेताओं से हट कर थे.

बी. एन. उनियाल कहते हैं, 'शायद उनमें एक कमी थी कि उनमें धीरज नहीं था. वो रुक नहीं सकते थे. हर चीज़ में थोड़ी जल्दबाज़ी करते थे. दूसरी सबसे बड़ी बात ये थी कि वो चतुर ज़रूर थे, लेकिन विवेकशील नहीं थे. उनमें दीर्घ दृष्टि नहीं थी. इसकी वजह से उनसे कई ग़लत फ़ैसले हुए जिनका उन्हें बहुत राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा.'

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