सुप्रीम कोर्ट और सरकार की खींचतान, समझिए आख़िर क्या चल रहा है?

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Image caption जस्टिस के. एम. जोसफ़

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस केएम जोसफ़ की नियुक्ति के मामले में कॉलेजियम और सरकार के टकराव का अगला मोड़ क्या होगा, इस पर देश की निगाहें टिकी हैं.

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को तय करना है कि क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को क्या जवाब दिया जाए जिन्होंने उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जोसेफ़ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफ़ारिश पर दोबारा विचार करने को कहा है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों के समूह यानी कॉलेजियम ने जनवरी में इंदु मल्होत्रा और केएम जोसेफ़ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफ़ारिश की थी लेकिन लंबे इंतज़ार के बाद क़ानून मंत्री ने इंदु मल्होत्रा के नाम की सिफ़ारिश को मान लिया लेकिन जोसेफ़ के नाम पर दोबारा विचार करने को कहा.

क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने देश के चीफ़ जस्टिस और कॉलेजियम के प्रमुख दीपक मिश्रा को पत्र लिखकर तीन कारण बताए कि क्यों केएम जोसेफ़ को सुप्रीम कोर्ट में जज नहीं बनाया जाना चाहिए.

पहला कि केरल से एक जज पहले ही सुप्रीम कोर्ट में हैं जो राज्यों के प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुरुप नहीं है, दूसरा जस्टिस जोसेफ़ वरीयता क्रम में देश में 42वें नंबर पर हैं जो काफ़ी नीचे है, तीसरा कि सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति या जनजाति का कोई जज नहीं है.

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Image caption जस्टिस इंदु मल्होत्रा

रविशंकर प्रसाद की चिट्ठी मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच सीनियर जजों में से एक, कुरियन जोसफ़ ने अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' से कहा, "कॉलेजियम अपनी सिफारिश दोबारा सरकार को भेजेगी और तथ्यों और आंकड़ों के हवाले से बताएगी कि कैसे सरकार ने उनकी नियुक्ति की सिफ़ारिश को वापस करते हुए पिछली नज़ीरों को ध्यान में नहीं रखा है."

इसके अगले ही दिन उसी अख़बार में क़ानून मंत्रालय के एक अनाम शीर्ष अधिकारी के नाम से सरकार की ओर से आपत्ति दर्ज कराई गई है कि "कॉलेजियम की बैठक होने से पहले एक जज का इस तरह अपने मन की बात प्रेस को बताना परंपरा और नियमों के अनुरुप नहीं है."

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क्या है कॉलेजियम?

कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट के पांच सीनियर जजों की एक समीति है जो नियुक्तियों और प्रोमोशन से जुड़े मामलों पर फ़ैसले लेती और सरकार को भेजती है, जिसे सरकार राष्ट्रपति को भेजती है. राष्ट्रपति का कार्यालय नोटिफिकेशन जारी करता है जिसके बाद जज की नियुक्ति होती है.

सरकारें आम तौर पर कॉलेजियम के फ़ैसलों को मानती रही हैं लेकिन इस बार मोदी सरकार ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केएम जोसफ़ को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनाने की कॉलेजियम की सिफ़ारिश को दोबारा विचार करने की बात कहते हुए लौटा दिया है.

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के कुलपति फैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "कॉलेजियम अगर अपने फ़ैसले को सरकार को दोबारा भेजती है तो सरकार उसे मानने के लिए बाध्य होगी." कॉलेजियम बुधवार को ऐसा करती है या नहीं, ये देखने वाली बात होगी.

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क्या है जस्टिस जोसफ़ का मामला?

जस्टिस जोसफ़ का नाम सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहीं इंदु मलहोत्रा के नाम के साथ सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त किए जाने के लिए सरकार को जनवरी में भेजा गया था.

सरकार ने इंदु मलहोत्रा के नाम को हरी झंडी दे दी और उन्होंने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर शपथ भी ले ली. वे वकील से सीधे सुप्रीम कोर्ट जज बनने वाली गिनी-चुनी महिला वकीलों और विधिवेत्ताओं में से एक हैं.

लेकिन केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जस्टिस जोसफ़ का नाम प्रांतीय-जातीय प्रतिनिधित्व और वरीयता के सिद्धांत के प्रतिकूल बताते हुए चीफ़ जस्टिस मिश्रा को वापस कर दिया.

क़ानूनी मामलों पर दशकों से रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्ठ पत्रकार राकेश भटनागर रविशंकर प्रसाद के तर्कों पर सवाल उठाते हैं, "सुप्रीम कोर्ट में जज बनने की ये शर्तें कब और किसने तय कीं, कई राज्य ऐसे हैं जहां से एक से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट के जज हैं".

भटनागर दिल्ली की मिसाल देते हुए कहते हैं कि दिल्ली से ताल्लुक रखने वाले तीन लोग-जस्टिस एमबी लोकूर, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एके सीकरी सुप्रीम कोर्ट में जज के पद पर नियुक्त हैं.

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टकराव की वजह पिछला फ़ैसला?

कांग्रेस सरकार में क़ानून मंत्री रह चुके कपिल सिब्बल ने कहा, "सरकार की मंशा साफ़ है. अगर वो आपको पसंद नहीं करती है तो आपकी नियुक्ति नहीं होने देगी".

सुप्रीम कोर्ट के क़रीब 100 वकीलों के एक समूह ने भी गुरुवार को इस मामले को चीफ़ जस्टिस के नेतृत्व वाली बेंच के सामने उठाया.

वकीलों के समूह की मुखिया इंदिरा जयसिंह ने साफ़ तौर पर कहा कि जस्टिस जोसफ़ के ख़िलाफ़ सरकार का रवैया उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के फ़ैसले को अवैध करार देने के कारण है.

जस्टिस जोसफ़ के नेतृत्व वाली बेंच ने अप्रैल 2016 में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के लगाए जाने के मोदी सरकार के फ़ैसले को ग़लत ठहराया था. इसके बाद वहाँ बर्खास्त की गई कांग्रेस की हरीश रावत सरकार ने सत्ता संभाल ली थी.

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Image caption जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ

क़ानूनी मामलों के जानकार फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "किसी भी समझदार व्यक्ति को ये समझ में आ सकता है कि जस्टिस जोसफ़ की नियुक्ति को टालने की वजह उनका उत्तराखंड वाला फ़ैसला ही है."

उत्तराखंड के मुख्य न्यायधीश जस्टिस जोसेफ़ की एक और फ़ाइल दो साल से केंद्र सरकार के पास अटकी पड़ी है.

कॉलेजियम के सदस्य जस्टिस कुरियन ने इंडियन एक्सप्रेस से हुई बातचीत में कहा था, "यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने जस्टिस जोसेफ़ के मामले में टालमटोल का रवैया अपनाया है. जस्टिस जोसफ़ ने दो साल पहले स्वास्थ्य कारणों से ठंडे पर्वतीय प्रांत उत्तराखंड से तबादले का आग्रह किया था. सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश-तेलंगाना हाई कोर्ट में उनके तबादले की सिफ़ारिश की थी, और उसकी फ़ाइल सरकार को भेज दी थी, लेकिन सरकार ने इस मामले पर अब तक कोई जवाब नहीं दिया है."

जस्टिस कुरियन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ.

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Image caption सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा

केरल से ताल्लुक रखने वाले जस्टिस कुरयिन ने हाल में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लिखकर आगाह किया था कि सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों को लटका रही है और ये "देश की सुप्रीम कोर्ट के अस्तित्व पर ही एक बड़ा ख़तरा पैदा कर रहा है".

जस्टिस कुरियन ने तीन अन्य सीनियर जजों के साथ एक प्रेस कांफ्रेंस कर जस्टिस दीपक मिश्रा के कामकाज के तरीक़ों पर सवाल उठाए थे.

कॉलेजियम के प्रमुख चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा पर सारी निगाहें टिकी हैं कि वे सरकार को क्या जवाब भेजते हैं, उन पर उनके साथी जजों का दबाव है कि वे सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता को बचाए रखें और सरकार को कॉलेजियम की सिफ़ारिश दोबारा भेज दें. लेकिन ऐसा होगा या नहीं, ये तो कॉलेजियम की बैठक के बाद ही पता चलेगा.

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