चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा को लेकर इतने जजमेंटल क्यों हैं कुछ लोग?

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जस्टिस दीपक मिश्रा पढ़ाई के दिनों में नाटकों में हिस्सा लिया करते थे, लेकिन तब उन्हें शायद ही अंदाज़ा होगा कि देश के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर उनका कार्यकाल इतना नाटकीय हो जाएगा.

स्वभाव से मृदुभाषी माने जाने वाले जस्टिस दीपक मिश्रा ने ग़रीब क़ैदियों को मुफ़्त क़ानूनी सलाह दिए जाने और एफ़आईआर को 24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर डाले जाने जैसे अहम आदेश दिए हैं लेकिन उनकी चर्चा आज दूसरे कारणों से हो रही है.

उन पर आरोप लग रहे हैं कि वे ख़ास तरह के मुक़दमों को कुछ ख़ास जजों को देते हैं, यहाँ तक कि ग़लत हलफ़नामे पर ज़मीन लेने के पुराने आरोप बाहर निकल आए हैं और एक शिक्षण ट्रस्ट से जुड़े मुकदमे में उनकी भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं.

वे भारतीय न्याय-व्यवस्था के इतिहास में पहले मुख्य न्यायधीश हैं जिनके साथ काम करने वाले चार सीनियर जजों ने प्रेस-कॉन्फ़्रेंस करके देश की सबसे ऊंची अदालत के कामकाज पर सवाल उठाए थे.

चारों सीनियर जजों का कहना था कि चीफ़ जस्टिस महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई से वरिष्ठ जजों को अलग रख रहे हैं और जूनियर जजों को अहम मुकदमे सौंप रहे हैं जबकि जस्टिस मिश्रा का कहना था कि ये मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है.

महाभियोग नोटिस बदले की कार्रवाई?

वो देश के पहले मुख्य न्यायाधीश के तौर पर याद किए जाएंगे जिनके ख़िलाफ़ महाभियोग का नोटिस दिया गया.

बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस और छह अन्य दल जस्टिस लोया की मौत की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग को नकारने की वजह से मुख्य न्यायाधीश से नाराज़ हैं, बीजेपी ने विपक्ष के महाभियोग के नोटिस को 'बदले की कार्रवाई' बताया.

जस्टिस मिश्रा ने अयोध्या में रामजन्मभूमि विवाद के मालिकाना हक़ के मुकदमे की नियमित सुनवाई का भी आदेश दिया है.

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की जांच करने वाले जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 'पहले विध्वंस की आपराधिक साज़िश का मामला निबटाना सही होता, न कि मालिकाना हक़ का मामला.'

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Image caption भारत के पूर्व क़ानून मंत्री और वरिष्ठ वकील शांति भूषण

विवादों का पुराना सिलसिला

विवादों का सिलसिला उनके मुख्य न्यायाधीश बनने से बहुत पहले से ही शुरू हो गया था.

ओडिशा स्थित एक सामाजिक कार्यकर्ता जयंत दास ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर उन पर ग़लत हलफ़नामा देकर ज़मीन हासिल करने का आरोप लगाया था.

शिकायत के मुताबिक़ ये मामला 1970 के दशक का था जब दीपक मिश्रा कटक कोर्ट में वकालत करते थे. इस मामले में सीबीआई की जांच भी हुई थी.

भारत के पूर्व क़ानून मंत्री और मशहूर वकील शांति भूषण ने तो एक लेख लिखकर जस्टिस दीपक मिश्रा को मुख्य न्यायाधीश बनाये जाने की नैतिकता पर सवाल उठाया था.

लेख में ज़मीन आवंटन और दूसरे मामलों के ज़िक्र के साथ-साथ उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल के सुसाइड नोट का भी ज़िक्र किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट में जारी रिश्वतख़ोरी की बात कही गई थी.

पूर्व क़ानून मंत्री कहते हैं कि जांच में सामने आया है कि सुसाइड नोट असली है, हालांकि वो ये भी मानते हैं कि मामले में अभी पूरी छानबीन नहीं हुई है.

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ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा

शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में जजों के बीच मुकदमों के बंटवारे को लेकर एक याचिका दाख़िल कर रखी है और उनके बेटे प्रशांत भूषण जस्टिस मिश्रा की अदालत से ये कहते हुए पैर पटकर निकल गए थे कि उन्हें बोलने का मौक़ा नहीं दिया जा रहा है.

मुंबई सीरियल बम धमाकों के सिलसिले में दिए गए फ़ैसले पर जस्टिस मिश्रा को धमकियां मिलीं जिसके मद्देनज़र उन्हें ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करवाई गई है.

बुलेटप्रूफ़ कार में सफ़र करने वाले वो सुप्रीम कोर्ट के अकेले जज हैं. उनके साथ पुलिस की गाड़ियों का एक दल भी होता है.

जस्टिस मिश्रा उस बेंच के मुख्य जज थे जिसने 1993 सीरियल ब्लास्ट के दोषी याक़ूब मेमन की दया याचिका ख़ारिज की थी. इसके बाद जस्टिस मिश्रा के घर के पीछे के दरवाज़े पर एक चिट्ठी फेंककर धमकी दी गई थी, 'चाहे तुम्हारे पास कितनी भी कड़ी सुरक्षा हो, हम तुम्हें ख़त्म कर देंगे.'

सिनेमाघरों में फ़िल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाए जाने का हुक्म भी उन्होंने ही जारी किया था. फ़ैसले में कहा गया था कि 'देशभक्ति और राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति के लिए' दर्शकों को हॉल में खड़ा होना चाहिए.

इस फ़ैसले को लेकर उनकी आलोचना हुई थी, आगे चलकर सरकार ने ख़ुद ही इस फ़ैसले को वापस लेने का आग्रह किया. जस्टिस मिश्रा ने महाराष्ट्र के डांस बार पर लगी रोक भी हटाई जिस पर लोगों की राय बँटी हुई है.

फ़िलहाल जस्टिस मिश्रा को लेकर न सिर्फ़ राजनीतिक दल बल्कि जजों और वकीलों के गुट भी उनके विरोध या समर्थन में बँटे हुए हैं.

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Image caption चीफ़ जस्टिस मिश्रा के पिता रघुनाथ मिश्रा

प्रतिष्ठित परिवार और कांग्रेस से रिश्ते

चीफ़ जस्टिस मिश्रा ओडिशा के एक प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखते हैं, उनके दादा पंडित गोदाबरिश मिश्रा ओडिशा के नामी कवि थे. वे स्वतंत्रता आंदोलन में भी शामिल रहे थे.

चीफ़ जस्टिस मिश्रा के पिता रघुनाथ मिश्रा कांग्रेस पार्टी के सक्रिय नेता थे और बानपुर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके हैं.

दीपक मिश्रा के पिता तीन भाई थे. भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे रंगनाथ मिश्रा उनके सगे चाचा थे, उनके दूसरे चाचा लोकनाथ मिश्रा कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता थे और 1990 के दशक में असम के राज्यपाल रहे थे.

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने 1984 के सिख विरोधी दंगों की जाँच भी की थी, बाद में रंगनाथ मिश्रा राज्यसभा के सदस्य भी रहे.

ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री जेबी पटनायक की बेटी सुदत्ता पटनायक एमए के समय कटक के रैवेनशॉ कालेज में जस्टिस मिश्रा की सहपाठी थीं.

वे कहती हैं, "वो जो कुछ कहते थे उसमें सहजता होती थी जिससे उनकी बातें लोगों पर असर छोड़ती थीं."

सरकार और न्यायपालिका के बीच चल रही खींचतान पर जाने-माने वकील संजय हेगड़े कहते हैं, "संस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट भारी दबाव में है, इनमें से कुछ परिस्थितियाँ तो उसकी ख़ुद की तैयार की हुई हैं और कुछ के लिए सरकार जिम्मेदार है"

संजय हेगड़े कहते हैं, "कोई भी मज़बूत राजनीतिक व्यवस्था एक मज़बूत न्यायालय नहीं चाहती. देखिए इंदिरा गांधी ने अपने समय में क्या किया था?"

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