नज़रियाः आसाराम जैसे बाबा भक्तों के लिए क्यों भगवान बन जाते हैं

  • 29 अप्रैल 2018
आसाराम इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत दलालों और बिचौलियों का देश है और जैसा कि एक अक़्लमंद इंसान ने सही ही कहा था कि ये लोग आम जनता की ज़िंदगी आसान बनाते हैं.

बिचौलियों और दलालों को सिर्फ़ सियासी और आर्थिक रोल वाले चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा. आज की तारीख़ में आध्यात्म को भी सिर्फ़ ध्यान ही नहीं, ऐसे मध्यस्थों की ज़रूरत होती है. आध्यात्म को ऐसे बिचौलियों की ज़रूरत इसलिए होती है ताकि वो आम लोगों और भगवान-हुक्मरानों के बीच पुल का काम कर सकें.

दुनिया नए दौर से गुज़र रही है. ऐसे में हमारे धर्मगुरुओं और बाबाओं को भी समाज में एक व्यवस्थित रोल के लिए ख़ुद को तैयार करने की ज़रूरत है. ये सिर्फ़ इसलिए ज़रूरी नहीं है कि आज कई बाबा विवादों और स्कैंडल में घिरे हुए हैं और देश में धर्मनिरपेक्षता की महामारी फैल रही है जिसमें धर्मगुरुओं को नीचा दिखाया जाता है बल्कि धर्मगुरुओं को अपने रोल को नए सिरे से इसलिए देखने की ज़रूरत है कि वो जागरूकता और आधुनिकता के इस माहौल में अपने रोल को मज़बूत कर सकें.

'आसाराम अब 'बापू' नहीं 'बलात्कारी''

आसाराम: आस्था के साम्राज्य से जेल की सलाखों तक

इमेज कॉपीरइट Getty Images

समाज का अहम हिस्सा

आज हम गहराई से देखें तो धर्मगुरु और बाबा लोग समाज का अहम हिस्सा हैं. उनका पारिवारिक पुजारियों से बड़ा रोल है. लेकिन, ये बाबा स्वामी नारायण और रमन्ना महर्षि जैसे महान धर्म गुरुओं से कमतर हैं. हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आसाराम, गुरमीत राम रहीम और रामपाल जैसे बाबा सर्विस प्रोवाइडर हैं, यानी वो जनता को ज़रूरी सेवाएं देते हैं.

ज़िंदगी को एक मायने देना और धार्मिक कर्मकांड भी एक प्लंबर और खान-पान जैसी एक सेवा ही है. असल में आज की तारीख़ में ये बाबा शहरी ज़िंदगी, ख़ास तौर से छोटे शहरों और क़स्बों में आम लोगों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गए हैं. आसाराम और राम रहीम की कामयाबी की कहानियां हमारे दौर की अपेक्षाओं-आकांक्षाओं के पूरे होने की उम्मीद भरी कहानियां हैं. उनके शानदार आश्रमों में देश का मध्यम वर्ग अपने आदर्श और उम्मीदें पूरी होता देखता है.

आसाराम बापू का वेलेंटाइंस डे आइडिया

इमेज कॉपीरइट Getty Images

आश्रम और सत्संग दो अहम पहलू

उत्तर भारत के किसी भी छोटे शहर या क़स्बे में सत्संग, ज़िंदगी का अहम हिस्सा होते हैं. ये लोगों के मेल-जोल और सामाजिक सद्भाव का ज़रिया होते हैं. लोग इन सत्सगों में शामिल होकर ख़ुद को समाज और एक समुदाय का हिस्सा महसूस करते हैं.

किसी बाबा का आश्रम और सत्संग हमारी सामाजिक ज़िंदगी के दो अहम पहलू हैं. बाबा अपने भक्तों को बराबरी, सामाजिक मेल-जोल के ख्वाब दिखाते हैं. दुनियावी चुनौतियों से निपटने की अपनी तकनीकी महारत से वो आम लोगों को भक्ति से ओत-प्रोत कर देते हैं.

इन बाबाओं का ही योगदान है कि आज छोटे शहर, अनजान ठिकाने नहीं हैं. इन बाबाओं की वजह से छोटे शहर भी अब ऐतिहासिक अहमियत हासिल कर रहे हैं. इनकी वजह से ही आज छोटे शहरों में आधुनिकता दस्तक दे रही है. लोगों की ज़िंदगी को मायने मिल रहा है.

आसाराम के ख़िलाफ़ गवाही देने वाले की कहानी...

इमेज कॉपीरइट AFP

बाबाओं में क्या ख़ूबियां देखते हैं?

राजनैतिक नज़रिए से देखें, तो ये बाबा वोट बैंक का काम करते हैं. यहां तक कि कई राजनेता भी इनके भक्त बन जाते हैं. यहां पर हम बाबा और नेता के बीच लेन-देन का तयशुदा नाता देखते हैं. ये लेन-देन वोट, आस्था और पैसे का होता है.

धर्म और राजनीति के इस लेन-देन के बगैर भारतीय लोकतंत्र के पहिए के घूमने की रफ़्तार शायद और भी धीमी होती. हमें बाबाओं की असली पहचान और पहुंच को समझना होगा. ये बाबा स्थानीय स्तर के बिचौलिए हैं, जो अपने अंदर जादुई ताक़त होने का दावा करते हैं.

अक्सर ये बाबा समाज के निचले तबक़े से ताल्लुक़ रखने वाले होते हैं. वो सद्गुरु या श्री श्री जैसे अंतरराष्ट्रीय धर्म गुरु नहीं होते. वो राजनीति के मध्यम वर्ग के मैदान के खिलाड़ी होते हैं, जहां कमोबेश हर धर्म में ऐसे दो-चार बाबाओं के लिए जगह निकल ही आती है, जो आध्यात्म के कारोबारी होते हैं.

किसी भी बाबा में हम दो बुनियादी ख़ूबियां देखते हैं. एक तरफ़ तो वो वैराग्य का प्रतीक होता है, तो दूसरी तरफ़ वो अपनी ताक़त और धन-वैभव के लिए भी शोहरत बटोरता है. ये अनोखा मेल होता है. किसी भी बाबा का वैराग्य या संन्यासी भाव धर्म के प्रति उसके लगाव को दिखाता है.

इमेज कॉपीरइट PTI

भक्तों का शोषण

वहीं ऐसे बाबा अपनी अति को कभी तकनीक की मदद से ख़्वाबों की ताबीर होने या यौन संबंधों के ज़रिए सही ठहराते हैं. जैसे कि आसाराम ने जबरन यौन संबंध बनाकर अपने आप को सही साबित करने की कोशिश की. वहीं, गुरमीत राम रहीम ने तकनीक और यौन संबंध दोनों को ज़रिया बनाया.

राम रहीम ने अपने डेरे में ओशो के आश्रम जैसा माहौल बनाया ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जोड़ सकें. इससे हमें बाबाओं की ताक़त का भी अंदाज़ा होता है और ये भी पता चलता है कि देश का मध्यम वर्ग किस तरह की उम्मीदों वाला भविष्य देखता है. आज की तारीख़ में कोई भी बाबा ख़ुद को तकनीक से अनजान रखने का ख़तरा नहीं मोल ले सकता. आज हर बाबा और धर्म गुरु ख़ुद को तकनीक से वाक़िफ़ रखना चाहता है. उस पर महारत हासिल करना चाहता है. स्थानीय मध्यम वर्ग अपने बाबाओं में भी अपने जैसी उम्मीदें देखना चाहता है.

गुरमीत राम रहीम ने तो ख़ुद को सुपरहीरो जताते हुए कई फ़िल्में भी इसीलिए बनाईं. हक़ीक़त तो ये है कि हर बाबा के लिए सियासी-आध्यात्मिक और आर्थिक समीकरण ठीक उतने ही अहम हैं, जिस तरह से राजनेताओं और उद्योगपतियों के गठजोड़ के लिए सामरिक-औद्योगिक हेल-मेल ज़रूरी है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

हाल के दिनों में यौन संबंध और इसमें तमाम तरह के तजुर्बे बाबाओं की ख़ूबी बन गए हैं. इसका नतीजा ये हुआ है कि भक्तों का शोषण हो रहा है. मानव तस्करी भी हो रही है. लेकिन आज के बाबाओं के लिए ये पहचान का नया ज़रिया बन गया है. सेक्स के मोर्चे पर अपनी ताक़त दिखाए बग़ैर, उसके लिए तमाम साज़िशें रचे बग़ैर किसी भी बाबा को ये नहीं लगता कि वो आम जनता के बीच ख़ुद की मर्दों वाली छवि बना पाएगा.

तकनीक, ताक़त और यौन संबंधों का ये मेल ही धर्म गुरुओं को स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के डॉन का दर्जा दे देता है. नेताओं की तरह ही इन बाबाओं के आश्रम लोगों की सेवा के लिए काम करने का प्रचार करते हैं. पर हक़ीक़त तो ये है कि ये आश्रम सत्ता, चुनावी राजनीति और इसकी अपार संभावनाओं का जाल बुनते हैं. नतीजा ये होता है कि अध्यात्म हमारे लोकतंत्र में धर्म और सत्ता के बीच लेन-देन का ज़रिया बन जाता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption डेरा सच्चा सौदा

आश्रम बन रहे क़ानून-व्यवस्था के लिए चुनौती

स्थानीय स्तर पर कमोबेश हर आश्रम और हर बाबा के कुछ अप्रवासी भारतीय भक्त भी होते हैं. भारत में अर्थव्यवस्था का ग्लोबलाइज़ेशन बहुत बाद में हुआ. सबसे पहले तो अपराध और अध्यात्म का अंतरराष्ट्रीयकरण हुआ था.

आश्रम और इनके बाबा दावा ये करते हैं कि वो समाज सेवा करते हैं. सच तो ये है कि समाजसेवा की आड़ में वो लोगों का सामाजिक शोषण करते हैं. उनकी करतूतों पर अक्सर क़ानून का शिकंजा कसता है. लेकिन, इसकी रफ़्तार बहुत धीमी होती है. हालांकि आख़िर में ये साबित होता है कि बड़ी कंपनियों की तरह ही ये आश्रम भी क़ानून की राह में रोड़े हैं. जब क़ानून इन बाबाओं पर शिकंजा कसता है, तो उनके आश्रम क़ानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाते हैं. मसलन, जब आसाराम के जुर्म पर कोर्ट फ़ैसला सुनाने वाला था, तो जोधपुर में धारा 144 लगानी पड़ी थी. नेताओं की तरह ही ये बाबा ख़ुद को क़ानून से ऊपर समझते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption हरियाणा के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा के बाहर तैनात पुलिस

लोकतंत्र का मज़ाक़

ये बात दिलचस्प मगर क़ाबिले-ग़ौर है कि हमारे लोकतंत्र के लिए ये धार्मिक नेता भी उतने ही ख़तरनाक हैं, जितने धर्मनिरपेक्ष लोग. इसी वजह से बलात्कार जैसे गंभीर अपराध के मामलों में भी ताक़त और सत्ता का दुरुपयोग होता है, फिर चाहे बलात्कारी अध्यात्म के कारोबार से जुड़ा हो, या फिर सियासत के. कठुआ के बलात्कारियों का समर्थन करने वाले बीजेपी नेता हों, या फिर आसाराम जैसे बाबा, दोनों ही सत्ता के अहंकार के नुमाइंदे हैं. ये लोकतंत्र का मज़ाक़ बना देते हैं.

अफ़सोस की बात ये है कि आम भारतीय को जीने के लिए अध्यात्म और सियासत की ख़ुराक चाहिए. ऐसा लगता है कि हम अध्यात्म और सियासत के तमाशे को देखकर ख़ुशी हासिल करते हैं. भारत में हर ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त में सियासी और धार्मिक ड्रामे एक अलग ही रंग भरते हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए