UPSC 2017: चार साल के बेटे की माँ के लिए कितना मुश्किल था टॉप करना

  • 29 अप्रैल 2018
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हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली चार साल के बेटे की मां अनु कुमारी ने यूपीएससी परीक्षा में दूसरी रैंक हासिल की है.

अनु कुमारी ने दो साल पहले बीस लाख रुपए सालाना पैकेज की एक निजी नौकरी छोड़कर सिविल सेवा की तैयारी शुरू की थी.

एक समय में उनके लिए मुश्किल रहा ये फ़ैसला अब उनके जीवन का सबसे अच्छा फ़ैसला भी साबित हो गया है.

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शुक्रवार को यूपीएससी ने सिविल सेवा परीक्षा 2017 के नतीजे जारी किए. अनु कुमारी इस सूची में दूसरे और महिलाओं में पहले स्थान पर हैं.

बीबीसी ने अनु कुमारी से बात की और कामयाबी के इस सफ़र को उनसे ही जाना.

अनु बताती हैं, "मुझे निजी क्षेत्र में नौकरी करते हुए नौ साल हो गए थे. धीरे-धीरे मुझे अहसास होने लगा था कि ये काम मैं आजीवन नहीं कर सकती और अगर मैं यही करती रही तो अपना जीवन पूरी तरह से नहीं जी पाउंगी. मैंने कई बार इस पर विचार किया और मैंने नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया."

लेकिन क्या नौकरी छोड़ने का फ़ैसला एक बड़ा फ़ैसला नहीं था?

इस सवाल के जवाब में अनु कहती हैं, "मैंने तय किया था कि सिविल सेवा की तैयारी करूंगी और अगर कामयाब नहीं रही तो शिक्षिका बन जाउंगी. मैं दोबारा निजी क्षेत्र में नहीं लौटना चाहती थी."

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Image caption अपने भाई के साथ अनु कुमारी

भाई ने की मदद

सिविल सेवा की तैयारी करने के लिए अनु को उनके छोटे भाई ने मनाया.

वो बताती हैं, "मेरे मामाजी और मेरे भाई ने मुझ पर बहुत ज़ोर दिया कि मैं नौकरी छोड़ दूं. जब टीना डाबी ने सिविल सेवा में टॉप किया तो मेरे मामाजी ने मुझे मैसेज भेजकर कहा कि बेटा अगर तू नौकरी छोड़कर सिविल सेवा की तैयारी करना चाहती है तो तेरा साल डेढ़ साल का ख़र्च मैं उठाने को तैयार हूं. उस समय मुझे लगा कि लोगों को मुझमें विश्वास है. इसी बीच मेरे भाई ने मुझे बिना बताए ही मेरा प्री का फॉर्म भर दिया. उसे भरोसा था कि वो मुझे नौकरी छोड़ने के लिए मना लेगा."

अनु ने अपने पहले प्रयास में डेढ़ महीने की तैयारी के बाद सिविल सेवा की प्री परीक्षा दी और नाकाम रहीं. लेकिन उन्होंने अगले साल की तैयारी शुरू कर दी.

अनु बताती हैं, "मैं हर महीने एक लाख साठ हज़ार कमा रही थी. इससे मुझे समय के साथ आर्थिक स्थिरता हासिल हो गई. पैसा अब मेरे लिए रुकावट नहीं रहा था. मुझे ये भरोसा भी था कि अगर मैं यूपीएससी में पास नहीं भी हो पाई तो अपने बेटे का पेट पाल ही सकती हूं."

निजी क्षेत्र की नौकरी के दौरान अनु को काफ़ी समय दफ़्तर में देना पड़ता था.

अनु बताती हैं कि एक समय उनके ससुराल में लोगों को लगने लगा था कि यदि नौ से पांच की नौकरी होती तो अच्छा रहता.

अनु के ससुर ने उनसे सीजीएल (कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल) की परीक्षा की तैयारी करने के लिए कहा लेकिन उनके भाई ने उन्हें समझाया कि उनमें इससे बेहतर करने की क्षमता है.

जब आंखों में आए आंसू...

अनु एक चार साल के बेटे की मां हैं, जब उन्होंने तैयारी शुरू की थी तब वो लगभग तीन साल का था. अपने बेटे के बारे में बात करते हुए अनु भावुक हो गईं.

वो बताती हैं, "मेरा बेटा मेरे बिना रह नहीं पाता था. उससे दूर रहना सबसे मुश्किल था. मैं अपनी मौसी के घर की छत पर जाकर उसे याद करके बहुत देर तक रोती थी."

Image caption अपनी मां के साथ अनु कुमारी

अनु के पिता एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे. उनकी मां बताती हैं, "बचपन में हम भैंस पालते थे. पूरी छत पर उपले हुआ करते थे. अनु कोने में कुर्सी डालकर पढ़ा करती थी. ये बचपन से ही बहुत तेज़ थी."

नौकरी की चुनौतियां कैसे झेलेंगी अनु?

एक सिविल सर्वेंट के तौर पर आनी वाली दिक्कतों के लिए अनु कितनी तैयार हैं?

इस सवाल पर वो कहती हैं, "मैं जानती हूं कि हमारी व्यवस्था में कुछ ख़ामियां हैं. हम इससे नज़र नहीं फेर सकते. लेकिन मैंने निजी नौकरी के साथ अपने परिवार को संभाला है इसलिए मुझे भरोसा था कि आगे जो भी चुनौतियां होंगी मैं उनका सामना कर लूंगी."

वो कहती हैं, "मैं बहुत ईमानदार हूं और मुझे अपनी ईमानदारी में पूरा भरोसा है. महात्मा गांधी ने कहा था कि आपके अंदर भले ही कुछ गुण न हो लेकिन अगर ज़ज़्बा हो तो आपके भीतर वो गुण भी आते चले जाएंगे. हो सकता है कि आज मेरे भीतर कुछ गुण न हों लेकिन मुझे भरोसा है कि समय के साथ मेरे भीतर वो गुण भी आ जाएंगे."

अनु कहती हैं, "मैं हमेशा से ही सशक्त महसूस करती रही हूं. एक बार साक्षात्कार में मुझसे पूछा गया था कि क्या आप स्वयं को सशक्त महसूस करती हैं तब भी मैंने कहा था कि हां मैं सशक्त हूं क्योंकि सशक्त होने के लिए शिक्षा और आत्मनिर्भरता चाहिए होती है, बेहतर स्वास्थ्य चाहिए होता है और भगवान की दुआ से मेरे पास ये सब कुछ था. मैं उस समय भी सशक्त थी लेकिन आज जो अहसास है वो अलग है. आज हरियाणा की लड़कियां मुझे प्रेरणा स्रोत के रूप में देख रही हैं. उन्हें मेरी कहानी अच्छी लगती है."

वो कहती हैं, "जब एक महिला अपने भीतर से स्वयं को मज़बूत महसूस करती है, उसके भीतर डर नहीं होता है, वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती है, अपने बच्चों के लिए फैसले ले पाती है तब वो सही मायनों में सशक्त होती है."

अनु अपनी कामयाबी का श्रेय अपनी मां और मौसी को देती हैं. वो कहती हैं, "मेरी मां ने मेरे बेटे को पाला है और मेरी मां ने मुझे पहला है. वो ही मेरी कामयाबी का आधार स्तंभ है. जब मैं तैयारी करती थी तब मेरी मौसी मुझे बैठे-बैठे खाना देती थीं."

इंटरव्यू में रही कैसी चुनौतियां?

अपने साक्षात्कार के बारे में अनु बताती हैं, "साक्षात्कार में सिर्फ़ व्यक्तित्व देखा जाता है. वो ज्ञान से ज़्यादा आपका चरित्र ही देखते हैं. वो देखते हैं कि बंदा कितना कूल और शांत चित्त का है. वो ये परखते हैं कि उम्मीदवार तनाव को झेल पाएंगे या नहीं, मुश्किल परिस्थिति में शांत रह पाएगा या नहीं."

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"मैं जब साक्षात्कार देने जा रही थी मैंने सोचा कि मैं अपने परिवार के बुज़ुर्गों से बात करने जा रही हूं जिनसे मैं खुलकर बात कर सकती हूं. उन बुज़ुर्गों से जो बहुत इंटेलिजेंट है जिन्हें बहुत कुछ पता है. मैं साक्षात्कार के लिए जाते वक़्त बेहद ख़ुश थी. बोर्ड के सदस्य मुझे देखकर मुस्कुराए और मैं उन्हें देखकर मुस्कुराई. बोर्ड सदस्य स्मिता नागराज बेहद शांत और स्थिर होकर बैठी थी."

साक्षात्कार के दौरान कोई तनाव था?

अनु कहती हैं, "कुछ उम्मीदवार बताते हैं कि उनसे काउंटर क्वेश्चन किए गए, उन्होंने मुझसे भी सवाल पूछे थे लेकिन मुझे लगता है कि वो सवाल डराने या तनाव देने के बजाए तर्कशक्ति समझने के लिए किए गए थे. साक्षात्कार के दौरान एक सिर बैठे थे जिन्होंने पूरे समय अपना चेहरा बेहद कठोर और स्थिर बनाए रखा. बोर्ड के अन्य सदस्य मुस्कुरा रहे थे लेकिन बस वो देख रहे थे. जब उनका सवाल पूछने का समय आया तो मैं उन्हें देखकर मुस्कुरा दी और वो भी मुझे देखकर मुस्कुरा दिए. मेरा साक्षात्कार बहुत अच्छा रहा."

आगे चलकर राजनेताओं ख़ासकर विधायकों और मंत्रियों के साथ आप कैसे सामजस्य बिठाएंगी? इस सवाल पर अनु कहती हैं, "अभी मेरे विचार बहुत सादे है. मैं मानती हूं कि आप किसी नेता या सरकार का आदेश पालन करने के बजाए संविधान, क़ानून और राष्ट्रहित से बंधे हैं. और ऐसी परिस्थितियों से निबटने का हमें प्रशिक्षण दिया जाएगा. भविष्य में ऐसी परिस्थितियां भी आएंगी जब हमें कोई एक रास्ता चुनना होगा. मुझे उम्मीद है कि मैं अपने प्रशिक्षण और मूल सिद्धांतों के दम पर ऐसी परिस्थितियों से निबट पाउंगी."

व्यक्तित्व निर्माण के बारे में पूछे गए सवाल पर अनु कहती हैं, "व्यक्तित्व को बहुत कम समय में विकसित करना मुश्किल होता है. व्यक्तित्व नैसर्गिक होता है और इसे आप धीरे-धीरे विकसित कर सकते हैं. आप कैसे कपड़े पहनते हैं, किस परिस्थिति में कैसे प्रतिक्रिया देते हैं इसका आपके व्यक्तित्व पर असर पड़ता है. लेकिन कुछ तैयारी के साथ व्यक्तित्व को विकसित किया जा सकता है."

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क्या तैयारी के दौरान हुई निराशा?

अनु कहती हैं, "प्री की तैयारी के बाद मैंने अपने वैकल्पिक विषय, समाजशास्त्र, की तैयारी के लिए टेस्ट सिरीज़ ज्वाइन की थी. इसका मैंने दो बार टेस्ट दिया और दोनों बार मैं बीस में से पंद्रह सवाल ही कर पाई. उस समय में दिल्ली में रहकर तैयारी कर रही थी. सवालों के जवाब न लिख पाने के बाद मैं बहुत निराश हो गई थी. उस रात मैं क़रीब दो घंटे तक रोई और रोते-रोते सो गई. अगले दिन सुबह उठकर मैंने फिर से अपनी कमियों को ध्यान में रखकर तैयारी शुरू की."

अपने प्रेरणास्रोत के बारे में बताते हुए वो कहती हैं, "मैंने अपने जज़्बे के साथ शुरूआत की थी. एक समय था जब मैं अपनी निजी क्षेत्र की नौकरी से निराश थी और बार-बार में यही सोच रही थी कि मुझे अपना जज़्बा बरक़रार रखना है. मुश्किल समय सबके जीवन में आता है और बीत जाता है. मैं भी अपने आप से यही कह रही थी कि मेरे जीवन का मुश्किल समय भी बीत जाएगा."

चार साल के बेटे की माँ के लिए कितना मुश्किल था टॉप करना

अनु मानती हैं कि सिविल सेवा की परीक्षा बहुत मुश्किल है और जो प्रतियोगी इसमें पास होते हैं वो बहुत मेहनत करके यहां तक पहुंचते हैं. उन्हें लगता है कि सिविल सेवा पास करने वाले लोगों को महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि वो समाज और देश के लिए बेहद अहम काम करते हैं.

अनु बताती हैं कि वो सिविल सेवा की तैयारी करने से पहले से ही बच्चों के लिए कुछ करने का विचार अपने मन में रखती थीं. वो बताती हैं, "हमारे देश में बच्चियों ख़ासकर महिलाओं के प्रति जो अपराध हो रहे हैं उन्हें रोकने के लिए ठोस क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है और मैं निश्चित तौर पर इस दिशा में काम करना चाहूंगी."

अनु मानती हैं कि हरियाणा को एक पितृसत्तात्मक समाज कहना ग़लत नहीं है लेकिन अच्छी बात ये है कि बदलाव आ रहा है.

वो कहती हैं, "लड़कियों की कम संख्या के लिए बदनाम सोनीपत जैसे ज़िले में स्थितियां बेहतर हो रही हैं. मानुषी छिल्लर और साक्षी मलिक जैसी लड़कियां हरियाणा से निकल रही हैं इसलिए ये तो मानना ही होगा कि हरियाणा में हालात बेहतर हो रहे हैं."

अपने निजी अनुभव के बारे में अनु बताती हैं, "मेरे पिता ने मेरे भाइयों से ज़्यादा मेरी पढ़ाई पर ख़र्च किया. शहरी क्षेत्र में लड़कियों को मौके मिल रहे हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में लड़कियों के लिए हालात थोड़े मुश्किल हैं. मैं सभी लड़कियों से ये कहना चाहती हूं वो तैयारी शुरू करें और अधिक से अधिक संख्या में सिविल सेवा में आए. सपने देखें और अपने सपने पूरे करें."

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