कर्नाटक चुनावः राजनेता क्यों लगाते हैं मठों के चक्कर?

मठ

कर्नाटक में जब भी चुनाव होते हैं तो धार्मिक-राजनीतिक रंग आपस में घुलने-मिलने लगता है. इसकी वजह राज्य में मौजूद तमाम मठ हैं.

लिंगायत मठ, वीरशैव मठ और इसके अलावा तमाम अलग-अलग सुमदायों के मठों का यहां के समाज के साथ-साथ राजनीतिक परिदृश्य और चुनावों में अच्छा-ख़ासा प्रभाव है.

इस बार भी कर्नाटक विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा काफी अहम हो गया है क्योंकि लिंगायतों ने अपने लिए अलग धर्म की मांग ज़ोर-शोर से उठाई है.

हुबली में प्रसिद्ध मुरासवीर मठ के गुरुसिद्ध राजयोगेंद्र स्वामी कहते हैं कि धर्मपीठ हमेशा से ही विधानसभा और संसद से ऊपर रही है.

उनका यह बयान यह बताने के लिए काफ़ी है कि आगामी चुनावों में मठों का प्रभाव कितना अधिक होने वाला है.

मठों का प्रभाव

मुरासवीर मठ सदियों पुराना मठ है जिसका उत्तरी कर्नाटक में अच्छा प्रभाव है. यह मठ बहुत हद तक उत्तरी कर्नाटक की राजनीति की दशा और दिशा तय करता है.

सिर्फ़ मुरासवीर मठ ही नहीं पूरे कर्नाटक में ऐसे बहुत से मठ मौजूद हैं जिनके प्रभाव के चलते राजनीतिक भविष्य तय होते हैं. इन मठों के बहुत से अनुयायी अपने-अपने क्षेत्रों में वोटर होते हैं, इस तरह जिस उम्मीदवार को इन मठों का साथ मिल जाता है उनकी जीत की संभावनाएं काफ़ी हद तक बढ़ जाती हैं.

कर्नाटक की राजनीति में मठों के इतने अधिक प्रभाव के बारे में जब बीबीसी ने हुबली में राजयोगेंद्र स्वामी से बात की तो उन्होंने इस तरह के किसी भी प्रभाव के होने से साफ़ इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा कि मठों के प्रमुख कभी भी सीधे या दूसरे रास्तों से किसी भी राजनेता के पास नहीं जाते.

राजयोगेंद्र ने कहा, ''मठ किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेते. बल्कि तमाम राजनेता ख़ुद हमारे पास आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं. अब जब कोई राजनेता किसी मठ के स्वामी के पास आता है तो वहां मौजूद अनुयायी ख़ुद यह विचार बना लेते हैं कि इस मठ का इस राजनेता को समर्थन है, बस यही बात राजनीति को प्रभावित करती है. लेकिन हम कुछ भी खुले तौर पर नहीं कहते, हम सिर्फ़ इतना कहते हैं कि ईश्वर आपका भला करे.''

Image caption मुरासवीर मठ के गुरुसिद्ध राजयोगेंद्र स्वामी

लिंगायत समुदाय की मांग

इस बार के कर्नाटक चुनावों में मठों का रुख़ ख़ासा अहम माना जा रहा है. कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को वीरशैव समुदाय से अलग मानते हुए उनके अलग धर्म की मांग को स्वीकार कर लिया है. कांग्रेस के इस क़दम ने राज्य की राजनीति को काफ़ी हद तक हिला दिया.

लगभग 30 लिंगायत मठों ने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया है जबकि कई अन्य मठ बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी.एस. येदियुरप्पा को समर्थन जता रहे हैं, जो ख़ुद एक लिंगायत समुदाय से आते हैं.

लेकिन क्या ये पहली बार है जब तमाम धार्मिक मठ इस तरह से खुलकर अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद ज़ाहिर कर रहे हैं?

स्थानीय विशेषज्ञों के अनुसार मठों और उनके प्रमुखों का चुनावों में प्रभाव कोई नई बात नहीं है. पूरे राज्य में, अलग-अलग विधानसभाओं में, जिस उम्मीदवार को अपने इलाके के मठों का समर्थन मिल जाता है, वह अपनी जीत की संभावनाएं तलाशने लगता है. यही वजह है कि जैसे-जैसे चुनाव क़रीब आते जा रहे हैं. वैसे-वैसे कई बड़े राजनेता मठों के चक्कर लगाने लगे हैं.

राजनीति और धर्म का आपसी गठजोड़

धारवाड़ में कर्नाटक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. हरीश रामास्वामी कहते हैं, ''कर्नाटक की राजनीति को समझने के लिए यह समझना बेहद आवश्यक है कि यहां कि राजनीति में मठों का कितना अधिक प्रभाव है. यही वजह है कि जो लोग चुनावी मैदान में उतरे हैं या फिर जो सरकार बनने के बाद सत्ता पर काबिज़ होंगे वे सभी मठों को प्रभावित करने की कोशिशें करते रहते हैं. राजनीति और धर्म को अलग-अलग रखने की बात अक्सर की जाती है लेकिन हक़ीक़त में ऐसा होता नहीं है. यही वजह है कि मठ यहां की राजनीति में अहम किरदार निभाते हैं.''

पूरे कर्नाटक में लिंगायत सुमदाय के सैकड़ों मठ हैं. उनके अनुयायी सिर्फ़ कर्नाटक में ही नहीं बल्कि आस-पास के राज्यों जैसे महाराष्ट्र में भी मौजूद हैं. इन अनुयायियों का अपने मठों के प्रति समर्पण ही इन्हें राजनीति में इतना अहम स्थान प्रदान करता है. यही वजह है कि तमाम राजनेता मठों के ज़रिए उनके अनुयायियों के करीब पहुंचने की कोशिश करते हैं, जो वोटर भी होते हैं.

लेकिन मठों को सिर्फ़ चुनाव और राजनीति तक ही सीमित कर नहीं देखा जा सकता. डॉ. रामास्वामी कहते हैं, ''आज मठ सिर्फ़ धार्मिक संस्था के तौर पर ही नहीं रह गए हैं, ये एक बड़े शिक्षण संस्थान में तब्दील हो चुके हैं. शिक्षण संस्थानों पर जो सरकारी नीतियां लागू होती हैं वे इन मठों पर भी लागू की जाती हैं, यही वजह है कि मठ भी सरकार के साथ बेहतर रिश्ते बनाकर चलना चाहते हैं. एक तरह से इसे किसी व्यावसायिक रिश्ते के जैसा समझा जा सकता है.''

Image caption प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. हरीश रामास्वामी

प्रत्येक मठ ने अपना-अपना क्षेत्र काफी विस्तृत कर दिया है, जिसमें अस्पताल, अनाथालय, हॉस्टल आदि के अलावा शिक्षण संस्थान भी शामिल हैं. ये मठ हर साल सामूहिक शादियां भी आयोजित करवाते हैं. येदियुरप्पा के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार ने कुछ मठों को आर्थिक सहायता भी मुहैया करवाई थी.

इस बार भी जैसे ही चुनावी प्रचार शुरू हुआ तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तमाम मठों और स्वामियों के पास जाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना शुरू कर दिया.

तुमकुर में सिद्धगंग मठ, श्रृंगेरी मठ और उडुपी मठ के साथ-साथ हुबली मुरासवीर और सिद्धरुद्ध मठ का बड़े इलाके में प्रभाव है. इसके अलावा पूरे राज्य में कई समूहों के अपने-अपने मठ हैं.

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आख़िर चुनाव के वक़्त ये मठ करते क्या हैं?

क्या ये मठ किसी एक ख़ास उम्मीदवार को अपना समर्थन देते हैं? डॉ. रामास्वामी इन सवालों के जवाब 'नहीं' में देते हैं.

वे कहते हैं, ''मठ अपना राजनीतिक रुझान कभी भी सीधे तौर पर प्रकट नहीं करते. जब कोई उम्मीदवार मठ में स्वामी के पास आशीर्वाद के लिए जाता है, तब जिस तरह से स्वामी उसे अपनी दुआएं देते हैं या यह कहते हैं कि वे अच्छे इंसान हैं तो उनकी यही बात अनुयायियों के लिए एक संदेश भर होती है. यहीं से उस उम्मीदवार के लिए ज़बानी प्रचार शुरू हो जाता है. बड़े मठों की कई शाखाएं होती हैं. साथ ही कई शिक्षण संस्थान होते हैं, इस तरह मठों की तरफ़ से जारी कोई संदेश बड़ी तेज़ी से फैला दिया जाता है.''

दिल्ली से नेता मठों के प्रमुख और मठाधिपति का आशीर्वाद लेने क्यों आते हैं?

इस सवाल के जवाब में राजयोगेंद्र स्वामी एक बार फिर दोहराते हैं, ''वे नेता यहां सिर्फ़ दर्शन करने और आशीर्वाद लेने आते हैं. हम सिर्फ़ उन्हें दिशा दिखाते हैं. देखिए, यह सिर्फ़ मेरे विचार हैं कि धर्मपीठ विधानसभा या संसद से ऊपर है. इसीलिए प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री सभी धर्मपीठ में आते हैं. और ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ़ चुनावों के वक़्त ही यहां आते हैं. वे हमारे पास कई बार शिक्षा प्राप्त करने आते हैं, लेकिन हम अपने अनुयायियों को चुनावों के मद्देनज़र किसी तरह का आदेश नहीं देते.''

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वहीं, दूसरी तरफ़ डॉ. रामास्वामी कहते हैं कि प्रत्येक मठ का अपने-अपने क्षेत्र में प्रभाव होता है. वे कहते हैं, ''सभी मठों ने अपनी सीमाएं तय की हुई हैं और वे उसी सीमा के भीतर अपने क्षेत्र को प्रभावित करते हैं. जैसे अगर मैसूर के किसी मठ को उत्तरी कर्नाटक में कुछ काम करवाना हो तो उसे पहले वहां के मठों से बात करनी पड़ती है, कोई भी इस विषय में खुले तौर पर नहीं बोलता लेकिन यही सच्चाई है.''

रामास्वामी आगे बताते हैं, ''इन मठों के प्रमुख सबसे अहम होते हैं. राजनेता उनसे ऊपर नहीं हैं. सिर्फ कुछ मठ जिन्हें नेताओं ने ही वोट प्राप्त करने के मक़सद से खड़ा किया है उन्हें छोड़ दें तो उसके अलावा मठाधिपति के शब्द ही अंतिम शब्द होते हैं.''

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कर्नाटक चुनाव में कौन से मुद्दे हैं अहम?

इस तरह ये तमाम बातें साफ़ करती हैं कि चुनावी प्रचार के दौरान राजनेता मठों के चक्कर क्यों लगाने लगते हैं. स्वाभाविक सी बात है कि लिंगायतों के मुद्दों पर मठों का क्या रुख़ है यह सभी दलों के लिए अहम होगा और इसका कर्नाटक चुनाव पर भी असर होता महसूस किया जा सकता है.

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