मोदी पर गरजे राहुल, भीड़ भी उमड़ी, पर क्या 2019 में बनेगी बात?

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दिल्ली की तपती दोपहर और रामलीला मैदान में कार्यकर्ताओं का भारी हुजूम.

राहुल गांधी के बतौर अध्यक्ष कमान संभालने के बाद रविवार को कांग्रेस पार्टी की पहली रैली थी. दिल्ली रैली में मौजूद कई कार्यकर्ताओं ने बीबीसी से कहा, "ये राहुल की औपचारिक ताजपोशी" है.

रामलीला मैदान तक आने वाले सभी रास्ते बैनरों और पोस्टरों से पटे हुए थे. कार्यकर्ता नारे लगाते और गाने गाते हुए रामलीला मैदान की तरफ जा रहे थे.

कांग्रेस की जनआक्रोश रैली में मौजूद रहे बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के मुताबिक इस रैली के लिए लंबे समय से की गई तैयारी रंग लाती दिखी.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं को जोश दिलाते हुए 2019 में सत्ता परिवर्तन का दावा किया. वहीं पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा, "देश में परिवर्तन की आंधी के आसार हैं."

पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने बेरोजगारी, महंगाई और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर उठते सवालों का ज़िक्र किया और आरोप लगाया, "मोदी सरकार अपने किसी वादे को पूरा नहीं कर पाई "

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रैली के बाद गदगद दिखे कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता ट्विटर पर खुशी ज़ाहिर करते रहे.

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्विटर पर लिखा, "राहुलजी ने दी देश के आक्रोश को एक मज़बूत आवाज़ और किया निर्णायक संघर्ष का आग़ाज़ "

प्रियंका चतुर्वेदी ने लिखा, "कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का जोशीला, आक्रामक और शानदार भाषण"

लेकिन केंद्र में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस की जनाक्रोश रैली में कोई दम नहीं दिखा.

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन ने कहा, " कांग्रेस की रैली फ़्लॉप, जब राहुल गांधी बोल रहे थे तो लोग वहाँ से जा रहे थे."

उधर, राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी की राय थी कि कांग्रेस ने रविवार की रैली के जरिए एक मायने में "2019 के लिए चुनावी बिगुल बजा दिया है."

नीरजा चौधरी ने कहा कि सोनिया गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह ने तमाम उन मुद्दों पर चिंता जताई जिन पर देश के कई लोग सवाल उठा रहे हैं.

"संसद, न्यायपालिका, शिक्षा संस्थान, एनजीओ और चुनाव आयोग को लेकर मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी भी सवाल उठा ही रहे हैं."

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी ने रविवार की रैली से जुड़े दूसरे तमाम मुद्दों पर भी बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बात की. पढ़ें उनका नजरिया-

रैली का हासिल

मुझे लगा कांग्रेस ने विपक्षी दल होने के नाते सही मायने में अपनी भूमिका निभाई है. सत्ताधारी गठबंधन में जो खामियां नज़र आने लगी हैं, उसे उजागर करने की कोशिश की है. एक मायने में 2019 के लिए भी चुनावी बिगुल बजा दिया है.

रैली में जुटी भीड़

कांग्रेस अभी तक भीड़ नहीं जुटा पा रही थी. या तो मनोबल नहीं था या उस मायने में इच्छा शक्ति नहीं थी. अब लगता है कि पिछले कुछ महीनों में स्थिति बदली है.

कांग्रेस के अंदर एक आशा आई है कि शायद हम 2019 के लिए हम कुछ कर सकते हैं. शायद हम सत्ता में आ सकते हैं और ऐसा एलान तो आज राहुल गांधी ने कर ही दिया है.

जब पार्टी 'डाउन एंड आउट' होती है तो उसका कार्यकर्ता भी हताश हो जाता है. कांग्रेस का कार्यकर्ता आज हताश नहीं दिख रहा है.

हम ऐसा नहीं कह सकते हैं कि कांग्रेस सत्ता में आएगी. लेकिन कार्यकर्ता किसी भी पार्टी का सबसे अहम हिस्सा है. कार्यकर्ताओं में उत्साह दिख रहा है. इस रैली के लिए कांग्रेस ने तैयारी तो की होगी. ये राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस की पहली रैली थी.

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क्या कहते हैं राहुल के तेवर?

कांग्रेस अध्यक्ष का भाषण आक्रामक था. गुजरात चुनाव के दौरान और कर्नाटक के चुनाव प्रचार के दौरान भी राहुल गांधी काफ़ी आक्रामक भाषण दिए हैं. ये भी साफ़ है कि राहुल गांधी ने स्पष्ट तौर से केंद्र की मोदी सरकार के ऊपर और भारतीय जनता पार्टी के ऊपर धावा बोला है.

राहुल गांधी कितना बदले हैं और उनमें कितनी परिपक्वता आई है, ये समय बताएगा. अभी भी राहुल गांधी के बारे में आम लोगों से बात कीजिए तो ऐसा नहीं है कि जनता उमड़ कर उनके पीछे आ रही है. ऐसा भी नहीं है कि नरेंद्र मोदी अपनी लोकप्रियता खो बैठे हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की सरकार की कई चीजों से लोग नाखुश हैं.

राहुल गांधी ने जिन मोर्चों पर परिपक्वता दिखाई है, उनमें से एक है कि उन्होंने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को कमान दी. उनको स्वतंत्रता दी.

कर्नाटक में भी सिद्धारमैया को फ़्री हैंड दिया गया है. हाईकमान की तरफ़ से चीज़ें थोपी नहीं जा रही हैं जैसा हुआ करता था, ये एक बदलाव दिख रहा है. इससे पार्टी को मज़बूती मिलती है.

दूसरी बात ये है कि राहुल गांधी अपने समुदायों में पकड़ रखने वाले जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल जैसे नेताओं से मिल रहे हैं.

वो दलितों और किसानों का मुद्दा उठा रहे हैं. ये दो बातें रणनीति के तौर पर सामने आ रही हैं. वो सोशल मीडिया में काफ़ी सक्रिय हो गए हैं.

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मुद्दों का चुनाव

राहुल गांधी वो मुद्दे उठा रहे हैं, जहां सवाल उठने शुरू हो गए हैं. ये बहुत लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री बहुत कुछ बोलते हैं, लेकिन किया क्या-क्या गया है. ये सवाल उठने लग गया है.

दूसरा भ्रष्टाचार का मामला है. राफ़ेल डील का मामला है. नीरव मोदी का मामला है. इन सवालों को राहुल गांधी और मज़बूती के साथ रख रहे हैं.

किसानों के मामले में तो कई सवाल उठ रहे हैं. उन्हें फ़सल की क़ीमत नहीं मिल रही. जहां असंतोष है, राहुल गांधी उन सवालों को मज़बूत आवाज़ में सामने रख रहे हैं. ये उनके भाषण में साफ तौर पर दिखा.

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जीत के दावे में कितना दम?

आज की तारीख़ में जीत का दावा करने का मकसद कार्यकर्ताओं में जोश भरना लगता है. कुछ महीने पहले तक तो कहा जाता था कि कांग्रेस कहां आएगी.

मान लीजिए कांग्रेस अगर कर्नाटक हार जाती है, तो कांग्रेस की सरकार सिर्फ़ पंजाब और मिज़ोरम में रह जाएगी. कांग्रेस के लिए कार्यकर्ता का मनोबल बनाए रखना ज़रूरी है. अगर कार्यकर्ता कूद पड़ा तो स्थिति बदल सकती है.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस के अंदर की जो लड़ाई है, अगर उससे पार्टी जूझ लेती है तो वहां जीत की अच्छी संभावना बन सकती है. वजह ये है कि इन राज्यों में एंटी इन्कम्बेंसी है.

कर्नाटक में ज़बरदस्त टक्कर के आसार हैं, लेकिन ये भी सही है कि सिद्धारमैया वहां एक दीवार की तरह खड़े हैं. नहीं तो कर्नाटक का तो रिकॉर्ड रहा है कि हर पांच साल में वहां सरकार बदलती है.

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कांग्रेस की चुनौती

कांग्रेस की असल चुनौती है कि उसे ड्राइंग रूम पार्टी से आगे जाना होगा. सिर्फ रैली में भाषण करके पार्टी को दोबारा खड़ा नहीं किया जा सकता है. हालांकि कार्यकर्ताओं को उत्साहित करना पहला कदम बढ़ाने जैसा है.

छोटी पार्टियां भी लगातार नज़ीर पेश कर रही हैं. वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र को विशेष दर्जे को लेकर 13 ज़िलों में पदयात्रा की. क्या कांग्रेस ऐसा कर सकती है?

लेफ्ट पार्टियों के बैनर तले महाराष्ट्र में किसान 180 किलोमीटर चलकर मुंबई आए. अपनी मांग के लिए सारी रात बैठे रहे. क्या कांग्रेस ऐसा कर सकती है? जब तक कांग्रेस ज़मीनी स्तर पर सक्रिय नहीं दिखेगी तब तक वो सीरियस प्लेयर बनेगी, ऐसा मुझे नहीं लगता.

कांग्रेस के नेताओं में एक सॉफ्टनेस दिखती है. वो मानते हैं कि गांधी परिवार जिताकर लाएगा. गांधी परिवार पार्टी को इकट्ठा रख सकता है.

कांग्रेस को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी. ज़मीनी स्तर पर मेहनत करनी होगी और लोगों के सवाल उठाने होंगे.

(ये नीरजा चौधरी के निजी विचार हैं)

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