यशवंत की बग़ावत से जयंत का खेल तो नहीं बिगड़ेगा!

जयंत सिन्हा इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha/BBC

वह साल 2014 था और अप्रैल का महीना. झारखंड के हज़ारीबाग़ संसदीय क्षेत्र में एक खास चुनावी बैनर सुर्ख़ियों में रहा था. तस्वीरों में नरेंद्र मोदी, यशवंत सिन्हा और जयंत सिन्हा और स्लोगन था - यश हो, जय हो नमो-नमो....दरअसल जयंत सिन्हा बीजेपी के उम्मीदवार थे और उनके पिता यशवंत सिन्हा खुलकर चुनावी मोर्चा संभाल रहे थे.

अब साल 2018. तारीख़ 21 अप्रैल. बीजेपी और केद्र सरकार की कार्यशैली, नीतियों से ख़फ़ा चल रहे यशवंत सिन्हा ने पार्टी के साथ अपने सभी संबंधों को समाप्त करने के साथ दलगत राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी. इन बदली परिस्थितियों में चर्चाएं होने लगी हैं कि क्या पिता की ग़ैर-मौजूदगी और बदले मिज़ाज में जयंत सिन्हा की चुनावी राह कठिन होगी.

दरअसल, हज़ारीबाग़, यशवंत सिन्हा की कर्मस्थली रही है. माना जाता है कि दो दशकों से ज़्यादा वक़्त में उन्होंने अपना ख़ासा प्रभाव जमाया है. 1998, 1999 और 2009 के संसदीय चुनावों में उन्होंने हज़ारीबाग़ से जीत दर्ज की थी जबकि 2004 के चुनाव में विपक्ष के एकजुट होकर लड़ने पर हार गए थे.

हां, मैंने मोदी का समर्थन किया था: यशवंत सिन्हा

यशवंत सिन्हा ने बीजेपी छोड़ने की घोषणा की

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha/BBC

तब जयंत सिन्हा राजनीति में नए थे

2014 के चुनावों में बीजेपी का तानाबाना बदलने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री का चेहरा बनकर सामने आने पर हज़ारीबाग़ से जयंत सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया. उस समय जयंत सिन्हा राजनीति में नए थे.

तब पिता के लिए पुत्र को विजयी बनाना नाक का सवाल बना था और इसके लिए यशवंत सिन्हा ने कोई कसर नहीं छोड़ी. ख़ुद जयंत सिन्हा भी चुनावी सभाओं, दौरे, बैठकों के दरम्यान तथा और सोशल साइट्स के ज़रिए लोगों के सामने अपने पिता के कामों की उपलब्धियां बताते-गिनाते रहे. इधर नरेंद्र मोदी की लहर भी साथ चलती रही. सारे समीकरण पक्ष में होते चले गए और वह एक लाख 59 हजार 128 वोट से चुनाव जीते.

इसके बाद जयंत सिन्हा को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया. अभी केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री की ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं. 2019 के संसदीय चुनाव में कुछ महीने शेष हैं. लिहाज़ा राज्य की प्रतिष्ठामूलक सीटों को लेकर जोड़-घटाव भी होने लगे हैं.

रामगढ़ में बीजेपी के महामंत्री बलराम प्रसाद कुशवाहा कहते हैं कि यशवंत सिन्हा मंझे और प्रभावी राजनेता रहे हैं. पिछले चुनाव में जयंत सिन्हा को पिता के प्रभाव और अनुभवों का भरपूर लाभ मिला ही था. अब प्रत्यक्ष तौर पर यशवंत सिन्हा के मैदान में नहीं रहने से जयंत जी को कई किस्म की कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है. वैसे चार सालों में सांसद-मंत्री के नाते जयंत जी ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है.

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha/BBC

रामगढ़ ज़िला बीजेपी के अध्यक्ष पप्पू बनर्जी कहते हैं कि ''बेशक यशवंत सिन्हा के फ़ैसले ने जमीनी कार्यकर्ताओं को सकते में डाला है. चुनावों में उनकी कमी ज़रूर महसूस होगी तब इसे पाटने की चुनौती भी होगी क्योंकि उनका अपना तजुर्बा बहुत रहा है. लेकिन कार्यकर्ता पार्टी के प्रति वफादारी निभाने से कभी पीछे नहीं हटने वाले. फिर जयंत सिन्हा भी लोकप्रिय सांसद तथा जनप्रतिनिधि के रूप में उभर कर सामने आए हैं. इसका लाभ उन्हें मिलेगा.''

बीजेपी के ही कुंतु बाबू अभी सासंद प्रतिनिधि हैं. वे कहते हैं कि ''यशवंत सिन्हा ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया है. लेकिन वे एसा कुछ भी नहीं करने जा रहे हैं कि बीजेपी या हजाराबीग सीट को नुकसान हो. ये ठीक है कि यशवंत जी का लंबा अनुभव रहा है और हजारीबाग को उन्होंने सींचा है. लेकिन जयंत सिन्हा ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और झारखंड में मुख्यमंत्री रघुबर दास के हाथों को मजबूत करने और विकास पर विजन दिखाने में सफल रहे हैं.''

वे भावनात्मक संबंधों पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि सैकड़ों कार्यकर्ताओं से सालों तक जुड़े रहे यशवंत सिन्हा जी के सामने पिता धर्म भी तो होगा.

गौरतलब है कि हाल ही में जयंत सिन्हा ने ट्वीटर के ज़रिए दावा किया है कि ''हजारीबाग में अद्वितीय विकास हुआ है. हमने एक तरफ विश्व स्तरीय प्रोजेक्ट शुरू किए और दूसरी तरफ मूलभूत सुविधाएं दी हैं. साथ ही इसी वर्ष मेडिकल कॉलेज में कक्षाएं शुरू करने का प्रयास है तथा हजारीबाग- बड़कागांव सड़क निर्माण को गति देने का प्रयास किया जा रहा है.''

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha/BBC

हजारीबाग को जिया है

हजारीबाग प्रमंडल में बीजेपी को सालों से कवर करते रहे स्थानीय पत्रकार नीलेंदु जयपुरियार का कहना है कि 'जयंत सिन्हा सहज- सरल दिखते हैं और करप्शन- कमीशन के खिलाफ भी. अभी वे हजारीबाग समेत झारखंड के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में जुटे हैं. इसके साथ ही शिक्षा, कृषि, सड़क के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम की कोशिशें करते रहे हैं.'

लेकिन यही चीजें चुनाव जीतने का पैमाना नहीं होती. लंबी पारी खेलने की वजह से चुनावी बिसात पर शह- मात के खेल में यशवंत सिन्हा की महारत रही है. विरोधियों को भी वे बखूबी साधते रहे हैं और पार्टी के अंदर की उलझनों को समझते हैं. कार्यकर्ता- वोटर से उनका वन टू वन संबंध रहा है.

उनके फैसले के संकेत यही हैं कि प्रत्यक्ष तौर पर वे मैदान में बैटिंग करते नहीं दिखेंगे, ज़ाहिर है इसकी भरपाई करना जयंत जी के लिए कठिन होगा क्योंकि हजारीबाग में सभी विधानसभा क्षेत्रों में अलग- अलग समीकरण हैं.

बीजेपी के यूथ विंग में सक्रिय ज़िम्मेदारी निभाते रहे अनुपम सिन्हा कहते हैं, "अगर किन्हीं बातों पर यशवंत सिन्हा जैसे शख्स ने राजनीति से संन्यास लिया है, तो उसके कारणों पर चर्चा जरूर होती रहेगी. उनके फैसले ने हजारीबाग में कई कार्यकर्ताओं को हैरत में डाला है. दरअसल हजारीबाग को उन्होंने जिया है. जनता के सवालों और पार्टी से जुड़े मुद्दों पर ज़मीनी संघर्ष से लेकर जेल जाने- गिरफ़्तारी देने में भी उनका कद और पद कभी आड़े नहीं आया."

हालांकि हजारीबाग जिला बीजेपी के अध्यक्ष टुन्नू गोप कहते हैं, "वे लोग इस बार हजारीबाग की सीट ज्यादा वोटों से जीतेंगे. पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के काम और नीति का कायल है. बीजेपी की लहर है. फिर बुजुर्ग हो चले यशवंत जी ने अपनी इच्छा से फ़ैसला लिया है. वे हमारे अभिभावक थे और उनका सम्मान भी करते रहेंगे. यशवंत जी ने भी कभी किसी कार्यकर्ता को संगठन के काम पर रोका- टोका नहीं है. अलबत्ता यह कहते रहे हैं कि पूरे लगन से अपना काम करते रहो."

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha/BBC

दांव-पेंच से अनजान

राष्ट्रीय खबर के संपादक तथा राजनीतिक विश्लेषक रजत कुमार गुप्ता का कहना है कि जयंत सिन्हा एक सुसंस्कृत, हार्वर्ड से पढ़े लिखे कई विषयों के जानकार हो सकते हैं, लेकिन भारतीय राजनीति और चुनावी बिसात पर जो दांव-पेंच खेलना पड़ता है, उससे वह बहुत वाकिफ़ नहीं हैं.

वो कहते हैं, "रही बात यशवंत सिन्हा की, तो वे बीजेपी के अंदर और हजारीबाग लोकसभा के समीकरणों को साधना जानते थे. इसलिए इस चुनाव में यशवंत के प्रत्यक्ष तौर पर सामने नहीं आने से जयंत जी की राहें कठिन हो सकती है. लेकिन केंद्र की सरकार में जयंत जी के योग्यता और काम पर संदेह या सवाल खड़े नहीं किए जा सकते. वे नरेंद्र मोदी के पसंद भी माने जाते रहे हैं और बीजेपी के पास तो अभी सबसे बड़ा ब्रांड नरेंद्र मोदी ही हैं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)