ग्राउंड रिपोर्ट: 'सम्मान' के लिए हिंदू धर्म छोड़ बौद्ध बने ऊना के दलित

उना में आयोजित समारोह

गुजरात के ऊना के पास मोटा समाधियाला गांव में लगभग तीन सौ दलित परिवारों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया.

इनमें ऊना पिटाई कांड के पीड़ित भी शामिल थे.

साल 2016 में इसी गांव में ख़ुद को गौरक्षक बताने वाले लोगों ने वाश्रम सरवैया और उनके भाई पर गायों को मारने का आरोप लगाया और अधनंगा करके उनकी पिटाई की.

पिटाई की घटना के बाद गुजरात में दलितों का गुस्सा फूट पड़ा और कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए. इस घटना से नाराज़ कई लोगों ने रविवार को बौद्ध धर्म अपना लिया.

ऊना के पीड़ितों ने पहले ही एलान कर दिया था कि उनके परिवार धर्म बदल लेंगे. उनका आरोप था कि वो हिंदू धर्म में लगातार भेदभाव का सामना कर रहे हैं और गुजरात सरकार उन्हें किसी तरह की मदद देने में नाकाम रही है.

रविवार को हुए समारोह का आयोजन सरवैया परिवार ने किया था. इसमें गुजरात के कई हिस्सों से आए दलितों ने भाग लिया. हालांकि ऊना की घटना के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले जिग्नेश मेवाणी जैसे दलित नेता समारोह में मौजूद नहीं थे.

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22 प्रतिज्ञा ली

पिता बालू सरवैया और चचेरे भाई अशोक सरवैया के साथ बौद्ध धर्म अपनाने वाले वाश्रम, रमेश और बेचर ने 'आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएं' दोहराईं.

इन प्रतिज्ञाओं में 'हिंदू देवी देवताओं में विश्वास नहीं करना और हिंदू रीतियों का पालन नहीं करना' भी शामिल हैं.

बालू सरवैया समारोह में हिस्सा लेने आ रहे हर व्यक्ति का बेहद खुशी के साथ स्वागत कर रहे थे और आने वालों के लिए किए गए खाने और पानी के इंतज़ाम पर भी लगातार नज़र बनाए हुए थे.

तापमान करीब 43 डिग्री सेल्सियस था लेकिन समारोह में आए लोगों ने कार्यक्रम पूरा होने तक अपनी जगह नहीं छोड़ी.

बालू ने बीबीसी गुजराती से कहा कि आज से वो नई ज़िंदगी शुरू करेंगे.

उन्होंने कहा, "हम सभी राज्य में बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे और डॉ. बीआर आंबेडकर के दिखाए रास्ते पर चलेंगे."

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क्यों बदला धर्म?

सरवैया भाइयों में वाश्रम सबसे ज़्यादा बातें करते हैं. हिंदू धर्म को छोड़ने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, "उस धर्म को मानने का क्या फ़ायदा जहां आपको सम्मान न मिलता हो"

वाश्रम सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे और समारोह में भीड़ को नियंत्रित कर रहे कार्यकर्ताओं को लगातार निर्देश दे रहे थे.

उन्होंने आगे कहा कि बौद्ध धर्म इंसान को प्यार करना सिखाता है बजाए इसके कि सिर्फ गाय या किसी और जानवार से प्यार किया जाए.

कड़ी सुरक्षा

कार्यक्रम के दौरान पुलिस सतर्क थी. ऊना से मोटा समाधियाला जाते वक्त कई जगहों पर पुलिस का भारी बंदोबस्त नज़र आया.

गीर-सोमनाथ ज़िले के पुलिस अधीक्षक ने बीबीसी गुजराती से कहा, "समारोह के लिए 350 पुलिसकर्मी लगाए गए थे. इनमें तीन उप पुलिस अधीक्षक थे. अहम जगहों पर पुलिस इंस्पेक्टरों की टीम भी तैनात थी."

ऊना के पीड़ित अब एक बौद्ध मठ बनाना चाहते हैं.

वाश्रम सरवैया ने बीबीसी से कहा कि वो इस्तेमाल नहीं की जा रही ज़मीन पर अधिकार हासिल करने की कोशिश करेंगे. ये वो ही जगह है जहां वो पिटाई कांड के पहले जीवन यापन के लिए गायों की खाल उतारते थे.

बनेगा बौद्ध विहार

"ये ही वो जगह है जहां हमें पीटा गया, अब हम यहां एक बौद्ध विहार बनाना चाहते हैं."

उनका परिवार ज़मीन हासिल करने के लिए जल्दी ही क़ानूनी प्रक्रिया शुरू करेगा.

उन्होंने कहा, "हर गांव में मरी हुई गायों की खाल उतारने के लिए जगह है. ऐसी ज़मीन आमतौर पर देखभाल के लिए दलितों को सौंप दी जाती है. इसलिए हम अपने क्षेत्र में ऐसी जगह पर अधिकार चाहते हैं."

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क्या है ऊना मामला?

जुलाई 2016 में दलितों की पिटाई का एक वीडियो सामने आया था जिसे लेकर पूरे देश के दलितों की नाराज़गी सामने आई थी.

बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के बाद घटना की प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज की गई.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल समेत कई नेताओं ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की थी.

ऊना पिटाई मामले में 45 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. उनमें से अब सिर्फ 11 लोग ही सलाखों के पीछे हैं. बाकी ज़मानत पर बाहर हैं.

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अधूरा वादा

तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने पीड़ितों को नौकरी और खेती के लिए ज़मीन देने का वादा किया था. हालांकि दलित नेता जिग्नेश मेवाणी की ओर से पूछे गए एक सवाल के जवाब में राज्य सरकार ने जानकारी दी कि तब की मुख्यमंत्री की ओर से किए गए वादे को लेकर लिखित में कुछ भी नहीं है.

उधर, दलित समुदाय धर्म परिवर्तन की मंज़ूरी के लिए जल्दी ही जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर सकते हैं.

उनका कहना है कि दलितों ने भले ही बौद्ध धर्म अपना लिया है लेकिन सरकार के रिकॉर्ड में उनका दर्ज़ा 'हिंदू' का ही है.

ऊना के दलित नेता केवलसिंह राठौर कहते हैं कि गुजरात में साल 2013 से बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित अब भी सरकारी काग़ज़ों में अपना धार्मिक दर्ज़ा बदलने का इंतज़ार कर रहे हैं.

राठौर कहते हैं कि गुजरात में धर्म परिवर्तन रोकने के लिए बना क़ानून असंवैधानिक है और हम इसे जल्दी कोर्ट में चुनौती देंगे.

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