कर्नाटक: न हवा, न लहर चुनाव में हावी है जाति

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भारत के दक्षिणी राज्य कर्नाटक में 12 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव के प्रचार में सभी दलों ने ताक़त झोंक दी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक का दौरा शुरू कर दिया है और पांच दिन के दौरान एक दर्जन से ज़्यादा रैलियां करेंगे.

भारतीय जनता पार्टी के अलावा सत्ताधारी कांग्रेस और जनता दल सेकुलर के नेता भी प्रचार के दौरान हवा को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हैं.

तीनों ही दल 224 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत हासिल करने का दावा कर रहे हैं.

राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस और केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए 15 मई को आने वाले चुनाव नतीजे अहम माने जा रहे हैं.

कई राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से सिर्फ़ राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों की ही नहीं बल्कि साल 2019 में होने वाले आम चुनावों की दिशा भी तय हो सकती है.

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राज्य के हर हिस्से में नारों और दावों का शोर है लेकिन ज़मीन पर स्थिति क्या है?

वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन यही आकलन करने के लिए इन दिनों कर्नाटक के दौरे पर हैं. बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने चुनाव से जुड़े तमाम मुद्दों पर उनसे बात की. पढ़िए राधिका रामाशेषन का आकलन

कर्नाटक में ज़मीन पर किस पार्टी का असर ज़्यादा है?

मुझे किसी की लहर नज़र नहीं आ रही है. कर्नाटक के हर क्षेत्र में अलग ट्रेंड दिखाई दे रहे हैं.

जैसे बेंगलुरू की बात करें तो ग्रामीण क्षेत्र में जनता दल सेकुलर (जेडीएस) का काफ़ी बोलबाला दिखाई दे रहा है. वहीं बेंगलुरू के शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) बराबर नज़र आते हैं.

पुराने मैसूर क्षेत्र में 65 सीटें हैं. वहां पर जेडीएस बहुत अच्छी तरह चुनाव लड़ रही है. यहां कांग्रेस संघर्ष में है. हालांकि कांग्रेस कुछ पीछे दिखाई देती है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ थोड़ी सत्ता विरोधी लहर (एंटी इन्कम्बैंसी) दिखाई देने लगी है.

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त्रिकोणीय मुक़ाबला

लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने ग़रीबों के लिए योजना शुरू की हैं, वो ठीक हैं लेकिन योजना सही तरह से लागू नहीं हुई हैं. लोग ये भी कह रहे हैं कि उन्होंने अपनी जाति के लोगों का ज़्यादा ध्यान रखा है. बाक़ी जातियों को नज़र अंदाज़ किया है.

पुराने मैसूर क्षेत्र में बीजेपी का असर दिखाई नहीं देता. चेंगापट्टना नाम की एक सीट है वहां पर पार्टी संघर्ष में है और वो भी उम्मीदवार की वजह से ही मुक़ाबले में दिखती है.

अभी मैं तुमकुर इलाके में घूम रही हूं और मध्य कर्नाटक में चित्रदुर्ग की तरफ जा रही हूं. तुमकुर में भी 11 सीटें हैं और जेडीएस हर जगह संघर्ष में है. कहीं कांग्रेस तो कहीं बीजेपी के साथ और कहीं मुक़ाबला त्रिकोणीय है. बीजेपी दो-तीन सीट पर ही संघर्ष में है. जेडीएस अपने गढ़ में अच्छी तरह से चुनाव लड़ रही है लेकिन अभी मैं जा रही हूं चित्रदुर्ग की ओर जहां जेडीएस का प्रभाव कम ही होगा.

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क्या चुनाव प्रचार में असल मुद्दे ग़ायब हैं?

आम लोगों से जुड़े मुद्दे जैसे बिजली, पानी, सड़कों की स्थिति की बात करें तो ये सीमित क्षेत्रों में प्रभावी हैं.

बेंगलूरू में एक बड़ा सा तालाब है, उसमें बार-बार आग लग जाती है. यहां ये मुद्दे हावी हैं और बीजेपी इनका फायदा उठाने की कोशिश कर रही है लेकिन बेंगलुरू के ग्रामीण क्षेत्रों में जातिवादी मुद्दे हावी हैं.

शहरों में ये मुद्दे दिखते हैं लेकिन जैसे ही छोटे शहरों में या गांवों में जाएंगे, लोग जाति के आधार पर बंटते दिखाई देते हैं.

लिंगायत बीजेपी की तरफ, वोक्कालिगा एचडी देवगौड़ा की पार्टी (जेडीएस) की तरफ, कुरुबा और मुसलमान कांग्रेस की तरफ. गांवों में एक तरह से चुनाव जातिवाद में बंटा हुआ है.

गांवों में किसानों के मुद्दे भी हैं. मैसूर के आसपास जहां रेशम की साड़ी बुनी जाती हैं वहां लोगों का कहना है कि जब से चीन का रेशम बाज़ार में आ गया है, तब से बुनकरों और उत्पादकों पर काफी असर पड़ रहा है. ये एक बड़ा मुद्दा है.

लेकिन बुनियादी तौर पर मुझे लगता है कि कर्नाटक का चुनाव जातिवाद पर ही लड़ा जा रहा है.

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नेताओं को मठ जाने का कितना फायदा मिलेगा?

तमाम नेता जब मंदिर मठ जाते हैं तो ये संदेश तो जाता है कि वो उस जाति के वोटों को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन इसका बहुत प्रभाव नहीं हुआ है.

मैं आज ही तुमकूर में एक लिंगायत मठ सिद्धगंगा में गई थी. वहां के स्वामी कह रहे थे कि हम चुनाव में तटस्थ रहने वाले हैं.

सिद्धारमैया की सरकार ने जो कहा है, उसका बहुत बड़ा प्रभाव हमारे ऊपर नहीं पड़ा है. उन्होंने कहा कि जितने प्रमुख मठ हैं, उनमे से दो को छोड़कर बाकी सभी तटस्थ हैं.

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प्रधानमंत्री की रैली से प्रचार की रंगत कितनी बदलेगी?

बीजेपी की पूरी उम्मीद नरेंद्र मोदी पर ही टिकी हुई है. वो कह रहे हैं कि अगले 10 दिनों में माहौल एकदम बदलने वाला है.

अभी तक हमें नहीं लगता कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं में वो उत्साह है जो होना चाहिए. कर्नाटक के पार्टी नेताओं का आपस में कोई तालमेल नहीं है.

बीजेपी की उम्मीद है कि प्रधानमंत्री आएंगे तो हवा बनाएंगे जो बहुत अहम है.

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क्या बीजेपी- जेडीएस में कोई सांठगांठ दिखती है?

ज़मीन पर मुसलमानों के बीच ये संदेश ज़रूर गया है कि अगर किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है तो जेडीएस और बीजेपी की सरकार बनने की अधिक संभावना हैं.

कांग्रेस और जेडीएस के साथ आने की कम संभावना है. जेडीएस ये बताने की कोशिश कर रही है कि ऐसा कुछ नहीं है. अब जेडीएस ने ये प्रचार भी शुरू कर दिया है कि येदियुरप्पा के बेटे सिद्धारमैया के बेटे के ख़िलाफ चुनाव लड़ने वाले थे, उन्होंने जान बूझकर नाम वापस ले लिया जिससे सिद्धारमैया के बेटे को लाभ मिल सके. जेडीएस की तरफ से पलटवार किया जा रहा है.

सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ जो सत्ता विरोधी रुझान है वो धीमे-धीमे ऊपर आ रहा है.

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कर्नाटक चुनाव राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेगा?

अगर कांग्रेस की सत्ता में वापसी होती है तो भारतीय जनता पार्टी का हमेशा से यह प्रचार करना कि 'कांग्रेस की कहीं भी दोबारा सरकार नहीं बनती है', इस बात को एक झटका लगेगा. कांग्रेस के लिए यह बड़ी उपलब्धि होगी.

अगर कांग्रेस हारती है तो उनके लिए बहुत हताश करने वाली स्थिति होगी. राहुल गांधी कांग्रेस को दोबारा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए ये एक बड़ा झटका होगा.

वहीं बीजेपी अगर चुनाव जीत जाती है तो उसके लिए भी बड़ी उपलब्धि होगी. बीजेपी के अंदर कर्नाटक में बहुत समस्याएं हैं. इसका श्रेय नरेंद्र मोदी और अमित शाह को ही देना पड़ेगा. इस जोड़ी का नेतृत्व और बड़े पैमाने पर स्थापित होगा.

एक तरह से ये चुनाव केंद्र सरकार पर जनमत संग्रह होगा. चुनाव प्रचार में बीजेपी केंद्र सरकार की उपलब्धियां भी गिना रही है.

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