पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में ममता का 'ख़ौफ़' या विपक्ष की लाचारी

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इसकी तुलना किसी ऐसे क्रिकेट मैच से की जा सकती है जिसमें एक भी गेंद फेंके बिना विजेता का फ़ैसला हो जाए. क्रिकेट के मैदान में ऐसा भले संभव नहीं हो, राजनीति की पिच पर यह असंभव नहीं है.

मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के लिए वोट तो इस महीने की 14 तारीख़ को पड़ेंगे, लेकिन उससे पहले ही एक तिहाई से ज़्यादा सीटों पर विजेता का फ़ैसला हो चुका है.

यह महज़ संयोग नहीं है कि 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' के तर्ज पर विजेता सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस के ही उम्मीदवार हैं. पंचायतों की 58,692 में से 20,076 सीटों पर बिना एक भी वोट पड़े विजेता तय हो गया है. नामांकन के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और अदालती लड़ाई की वजह से यह चुनाव शुरुआत से ही सुर्खियों में रहा है.

विपक्षी बीजेपी, सीपीएम और कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस पर बड़े पैमाने पर आतंक फैलाने और विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन पत्र दाखिल करने से रोकने का आरोप लगाया है. इसके ख़िलाफ़ विपक्षी दल अदालत का दरवाज़ा खटखटाने के अलावा सड़कों पर उतर चुके हैं. वाममोर्चा ने तो बीते महीने इसके ख़िलाफ़ छह घंटे बंगाल बंद भी बुलाया था.

एक तिहाई सीटों पर जीत

राज्य चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, 34 फ़ीसदी से ज़्यादा सीटों पर उम्मीदवारों को निर्विरोध चुना जा चुका है. वैसे, राज्य के पंचायत चुनावों में सत्तारुढ़ पार्टी के उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अबकी इसने पिछले तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.

तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद वर्ष 2013 में हुए इन चुनावों में 10 फ़ीसदी से ज़्यादा सीटें निर्विरोध जीती थीं. उसके 10 साल पहले वर्ष 2003 में सत्ता में रहे वाममोर्चा ने 11 फ़ीसदी सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार यह तमाम रिकॉर्ड बहुत पीछे छूट गए हैं.

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एक आंकड़े से स्थिति और साफ़ हो जाती है. बंगाल में पंचायत व्यवस्था 1978 में शुरू हुई थी. तब से वर्ष 2013 तक के तमाम चुनाव नतीजों को जोड़ कर देखें तो 23 फ़ीसदी से कुछ ज़्यादा उम्मीदवार ही निर्विरोध चुने गए थे, लेकिन अकेले इस बार यह आंकड़ा 34 फ़ीसदी के पार चला गया है.

राज्य में पहले एक, तीन व पांच मई को तीन चरणों में चुनाव होने थे, लेकिन नामांकन प्रक्रिया के दौरान तृणमूल कार्यकर्ताओं की ओर से कथित रूप से बड़े पैमाने पर हिंसा के आरोप में विपक्ष ने कलकत्ता हाईकोर्ट की शरण ली.

सुनवाई लंबी खिंचने के बाद अदालत ने राज्य चुनाव आयोग को नामांकन का समय एक दिन बढ़ाने और मतदान की नई तारीखों का एलान करने का निर्देश दिया. उसके बाद ही आयोग ने ममता बनर्जी सरकार की सलाह पर 14 मई को एक ही दिन मतदान कराने का फ़ैसला किया. विपक्षी दलों ने इसका विरोध करते हुए चुनावों के दौरान सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं.

विपक्ष का आरोप

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विपक्षी राजनीतिक दल शुरू से ही तृणमूल कांग्रेस पर बड़े पैमाने पर हिंसा और आतंक फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं. उनका आरोप है कि तृणमूल के कथित बाहुबलियों ने विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन पत्र ही दायर नहीं करने दिया.

बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, ''बंगाल में सीपीएम ने बिना चुनाव लड़े जीतने की परंपरा शुरू की थी. अबकी ममता ने इसका रिकॉर्ड बनाया है.''

उनका सवाल है कि अगर तृणमूल कांग्रेस ने अपने दावों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में सचमुच बड़े पैमाने पर विकास किया है तो उसमें बिना चुनाव लड़े जीतने की मानसिकता क्यों है? सिन्हा का आरोप है, ''तृणमूल के बाहुबली, पुलिस व राज्य चुनाव आयोग मिलकर यहां लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं. 34 फ़ीसदी से ज़्यादा सीटों पर निर्विरोध जीत बंगाल के चुनावी इतिहास में एक कलंकित अध्याय के तौर पर दर्ज होगी.''

बीजेपी नेता का दावा है कि तृणमूल की हिंसा में पार्टी के छह लोग मारे जा चुके हैं. वह कहते हैं कि 'लोगों ने जिस तरह पहले सीपीएम को माकूल जवाब दिया है उसी तरह समय आने पर तृणमूल कांग्रेस को भी उसकी हरकतों का जवाब देंगे.'

वजह क्या

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लेकिन आखिर तृणमूल कांग्रेस के इस कथित आतंक की वजह क्या है? इस सवाल पर सिन्हा कहते हैं, ''राज्य में बीजेपी के तेज़ी से उभरने और पार्टी की अंदरूनी गुटबाज़ी से परेशान होकर ही तृणमूल कांग्रेस ऐसा कर रही है. तृणमूल की आपसी गुटबाज़ी में 18 लोग मारे जा चुके हैं.''

उनका दावा है कि त्रिपुरा के चुनावी नतीजों से ममता बनर्जी डर गई हैं. उनको (ममता को) लगता है कि अब कहीं अगला नंबर बंगाल का न हो. इसी वजह से वह बीजेपी के उभार को येन-केन-प्रकारेण कुचलने का प्रयास कर रही हैं.

कांग्रेस ने बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, ''राष्ट्रपति शासन लागू किए बिना यहां पंचायत चुनावों में कोई भी व्यक्ति अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता. तृणमूल कांग्रेस यहां लोकतंत्र का गला घोंटने का प्रयास कर रही है.''

सीपीएम नेता विकास रंजन भट्टाचार्य कहते हैं, ''नामांकन दायर करने के दौरान हुई हिंसा राज्य के चुनावी इतिहास में एक नया रिकार्ड है. तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में मुक्त व निष्पक्ष चुनाव संभव ही नहीं हैं.''

इस बीच पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी राज्य में पंचायत चुनावों की प्रक्रिया के दौरान जारी हिंसा पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि यहां अब लोकतंत्र पर सवाल उठने लगे हैं.

चटर्जी का कहना है कि ममता को अब भी राज्य में काफ़ी समर्थन हासिल है. ऐसे में उनको यह सब करने की क्या ज़रूरत है? इससे किसी भी कीमत पर सत्ता से चिपके रहने की मानसिकता का संकेत मिलता है.

वह कहते हैं, ''लोकतंत्र में चुनाव एक उत्सव की तरह होता है. लेकिन इस समय ख़ून का उत्सव देखने को मिल रहा है.'' सोमनाथ चटर्जी ने राज्य चुनाव आयोग और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं.

तृणमूल कांग्रेस की सफ़ाई

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दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने विपक्ष के तमाम आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है. पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी सवाल करती हैं कि अगर विपक्ष के आरोप सही हैं तो उनके हज़ारों उम्मीदवारों ने नामांकन कैसे दाखिल किया है. वह कहती हैं कि विपक्ष तरह-तरह के बहाने बना कर इन चुनावों में बाधा पहुंचाने का प्रयास कर रहा है.

पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, '''राज्य के लोगों का ममता बनर्जी के प्रति पूरा भरोसा है. विपक्षी दलों का कोई जनाधार नहीं होने की वजह से ही वे बार-बार चुनाव प्रक्रिया को रोकने के लिए अदालतों की शरण में जा रहे हैं.''

पार्थ चटर्जी सोमनाथ बनर्जी के बयान का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, ''उम्रदराज लोग अक्सर ऐसे ही अपनी हताशा व्यक्त करते हैं. बंगाल में अगर लोकतंत्र नहीं है तो हर व्यक्ति अपना विचार कैसे प्रकट कर रहा है?' पार्थ ने इस बात पर खेद जताया है कि सोमनाथ चटर्जी जैसा व्यक्ति भी भाजपा की भाषा बोल रहा है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले बंगाल में आखिरी बड़ा चुनाव होने की वजह से पंचायत चुनावों की अहमियत काफ़ी बढ़ गई है. ऐसे में ख़ासकर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और तेज़ी से नंबर दो की कुर्सी की ओर बढ़ती बीजेपी के बीच टकराव बढ़ना तय है.

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