पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में क्यों भटक रहे हैं 1194 परिवार?

  • 4 मई 2018
वाराणसी के किसान

दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ पुरुष और महिलाएं ठेठ गर्मी में सिर पर लाल कपड़ा बांधे बैठे नजर आए तो मेरे मन में पहला ख्याल यही आया कि शायद गर्मी से बचने के लिए ये कपड़ा काम आ रहा हो.

लेकिन इनमें से एक बुजुर्ग ने बताया, "ये लाल कपड़ा है यानी कफ़न है, हमारी ज़मीन हमें नहीं मिली तो हमारी लिए यही एक रास्ता बचा है."

किसान संघर्ष समिति, बैरवन के बैनर तले धरना पर बैठे कृष्णा प्रसाद बताते हैं, "सरकार ने हमारी ज़मीन पर ज़बरन अधिग्रहण कर लिया, हमने अब तक एक पैसा मुआवज़ा नहीं लिया है. मोदी जी ने कहा था कि किसानों की मदद करेंगे, हमारी मांग है कि हमारी ज़मीन हमें वापस लौटा दी जाए."

दरअसल ये लोग वाराणसी के उन 1194 परिवारों में शामिल हैं, जो बीते कई सालों से अपनी ज़मीन का मालिकाना हक वापस मांग रहे हैं.

दरअसल, वाराणसी के राजा तलाब जनपद के बैरवन, सरायमोहन, कन्कनाडाडी एवं मिल्किचक गांव के 1194 किसानों की 214 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण 17 अप्रैल, 2003 को किया गया था. राज्य सरकार की ओर से अधिग्रहित की गई इस ज़मीन पर मोहनसराय ट्रांसपोर्ट नगर बनाने का प्रस्ताव था.

ज़मीन का अधिग्रहण किए जाने के बाद सरकारी कागज़ों पर ज़मीन का मालिकाना हक वाराणसी विकास प्राधिकरण के पास चला गया और 1194 किसानों का ज़मीन पर से नाम कट गया.

लेकिन 15 साल बीतने के बाद भी वाराणसी विकास प्राधिकरण अब तक इस ज़मीन पर प्रस्तावित योजना को विकसित नहीं कर पाया है.

योजना लटकी

वाराणसी विकास प्राधिकरण के सचिव विशाल सिंह ने बीबीसी को बताया, "इस योजना पर काम शुरू नहीं हो पाया क्योंकि अधिग्रहित ज़मीन पर जिला प्रशासन कब्ज़ा नहीं कर सकी है. हमें ज़मीन नहीं मिला है, इसलिए योजना अटकी हुई है."

इलाक़े के किसान अपनी ज़मीन पर सरकारी योजनाओं का फ़ायदा नहीं ले पा रहे हों या उन्हें बैंक लोन नहीं मिल रहा हो या फिर वे इसे बेच नहीं सकते हों लेकिन सालों साल से वे अपनी ज़मीन को जोत रहे हैं, लेकिन उनकी समस्या केवल इतने भर से पूरी नहीं हो रही है.

जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी मंजू देवी बताती हैं, "हमारी सारी ज़मीन अधिग्रहण में चली गई, ना तो बैंक से लोन मिलता है और ना ही हम उसे बेच सकते हैं. बेटी की शादी के लिए हमें बाज़ार में महाजन से कर्ज़ लेना पड़ा है. ज़मीन पर कब्ज़ा मिलेगा तो उसे बेचकर ही चुका पाएंगे."

ये मामला इसलिए भी थोड़ा पेचीदा हो गया है क्योंकि इस योजना में अब तक कई किसानों ने कोई मुआवजा नहीं लिया था. किसान संघर्ष समिति के अलावा किसान खेत मजदूर कांग्रेस के उत्तर प्रदेश संयोजक विनय शंकर राय दावा करते हैं कि अभी तक इस योजना में केवल 48 फ़ीसदी किसानों ने मुआवजा लिया है और 50 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों ने मुआवजा नहीं लिया है.

हालांकि वाराणसी विकास प्राधिकरण के सचिव के मुताबिक इस योजना में 80 फ़ीसदी किसानों ने अपना मुआवजा लिया हुआ है.

ज़मीन चाहते हैं किसान

लेकिन अब ऐसे किसान भी अपनी ज़मीन का मालिकाना हक वापस चाहते हैं जिन्होंने मुआवजा लिया हुआ है. ऐसे एक किसान हैं दिनेश तिवारी.

उन्होंने बताया, "घर में तीन तीन बेटियां शादी करने को थीं, ज़मीन बेच नहीं सकते थे, तो आस पड़ोस के लोगों ने कहा कि मुआवजा ले लो. पैसा लिया तो बेटियों की शादी कर दी. हमारी ज़मीन वापस मिल जाए तो हम मुआवजा भी वापस लौटा देंगे."

वैसे वाराणसी के ट्रांसपोर्ट नगर योजना के खटाई में पड़ने की सबसे बड़ी वजह 2013 में लागू हुआ भूमि अधिग्रहण का नया क़ानून है. इस क़ानून के सेक्शन 24 धारा 5(1) में कहा गया है कि अगर कोई परियोजना पांच साल लागू होकर चालू नहीं होती है तो योजना स्वत निरस्त मानी जाएगी और ज़मीन किसानों को वैधानिक रूप से लौटा दी जाएगी.

वाराणसी के इन चार गांवों के किसान अब इसी क़ानून का हवाला दे रहे हैं, इसके लिए वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय से लेकर उनके दिल्ली कार्यालय तक के चक्कर काट रहे हैं और ना ही ज़िला प्रशासन को ज़मीन कब्ज़ा करने दे रहे हैं.

इतना ही नहीं नए क़ानून के तहत इन किसानों को सर्कल रेट से चार गुना ज़्यादा मुआवज़ा मिलना चाहिए. इससे पूरे प्रोजेक्ट पर क्या अंतर पड़ सकता है, इसको वाराणसी विकास प्राधिकरण के सचिव की उस बात से समझा जा सकता है जिसमें वो कहते हैं कि इस योजना में अब तक किसानों को 35 करोड़ रुपये मुआवज़ा दिया जा चुका है, लेकिन नए क़ानून के बाद इस प्रोजेक्ट का खर्च 800 करोड़ रुपये के पार जा पहुंचेगा.

ऐसे में एक बड़ा सवाल ये भी है कि क्या ये योजना आर्थिक तौर पर फ़ायदे का सौदा बन पाएगी या फिर इसको आगे बढ़ाया जाना उचित होगा.

वाराणसी विकास प्राधिकरण के सचिव इस मुद्दे पर किसानों के साथ बातचीत करके रास्ता निकालना ही अंतिम हल बताते हैं लेकिन जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी बिटना देवी कहती हैं, हमें अपनी ज़मीन सरकार को नहीं देनी है, हमें कोई पैसा भी नहीं चाहिए. हमें हमारी ज़मीन वापस चाहिए.

इन किसानों का ये भी कहना है कि ये ज़मीन उनकी आजीविका का इकलौता साधन है और वो इससे समझौता नहीं कर सकते हैं.

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धरना-प्रदर्शन की चर्चा नहीं

ये बात ठीक है कि ना तो हैदराबाद के किसानों की तरह दिल्ली में इनके धरना प्रदर्शन की चर्चा देखने को मिली और ना ही जंतर मंतर पर उनके समर्थन में मुंबई में किसानों के मार्च की तरह, हज़ारों की भीड़ दिखी.

बावजूद इन सबके ये किसान अपनी ज़मीन को वापस पाने की लड़ाई को मंजिल तक पहुंचाने को व्याकुल नज़र आए. इन लोगों ने ये भी कहा कि अगर मोदी जी उनकी समस्या नहीं सुनते हैं तो फिर वे लोग उन्हें इलाक़े में घुसने नहीं देंगे.

इन लोगों की मुश्किल ये है कि जबसे इनकी ज़मीन का विवाद शुरू हुआ है तब से उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकार बन चुकी है और उन सरकारों के दौर में भी इनकी समस्या पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

ऐसे में इस बार इन लोगों की उम्मीद की सबसे बड़ी वजह नरेंद्र मोदी ही हैं क्योंकि वे इनके इलाक़े के सांसद भी हैं. इतना ही नहीं इन लोगों के मुताबिक बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान इन लोगों को भरोसा दिलाया था कि उनकी ज़मीनें वापस कर दी जाएंगी.

ये दूसरी बात है कि उनकी व्याकुलता पर ना इलाके के सांसद और प्रधानमंत्री की नज़र है और ना ही योगी आदित्यनाथ की सरकार की.

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