ग्राउंड रिपोर्ट: पेशाब पिलाई, मूंछ उखाड़ी, मारपीट की' आख़िर हुआ क्या था?

  • 5 मई 2018
सीताराम
Image caption सीताराम

"हमने उनके गेहूं काटने से मना कर दिया क्योंकि हम अपना गेहूं काट रहे थे. उसी टाइम आए और बस निकाल के जूता मारने लगे. मारपीट कर घसीटते हुए गांव तक ले गए. चौपाल पर जाकर साहब रस्सी से नीम के पेड़ से बांध दिए. फिर हमारी मूंछ उखाड़ी और जूते में भर कर पेशाब पिलाई."

बदायूं ज़िले में आजमपुर गांव के रहने वाले दलित किसान पिछले महीने की 23 तारीख को अपने साथ हुई घटना की कहानी कुछ इसी तरह बताते हैं. हालांकि उनसे ये जानकारी लेने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि वो 'लोगों को यही बात बताते-बताते परेशान हो गए थे.'

दलित किसान का आरोप है कि गांव के ही ठाकुर जाति के लोगों ने उनके साथ ये बर्ताव किया. वो उस समय खेत पर अपने छोटे भाई के साथ थे. छोटे भाई ने मार-पीट की जानकारी आकर घर पर दी और फिर दलित किसान की पत्नी ने पुलिस को फ़ोन करके सूचना दी.

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मारने-पीटने, पेशाब पिलाने और मूंछ उखाड़ने की रिपोर्ट

बदायूं के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार कहते हैं कि उस दिन सौ नंबर पर दो बार फ़ोन किया गया और दोनों बार पुलिस पहुंची.

वो कहते हैं, "दोनों बार मार-पीट की शिकायत की गई थी. थानाध्यक्ष ने दोनों पक्षों को थाने पर बुलाकर कार्रवाई की. लेकिन एक हफ़्ते बाद दलित किसान ये शिकायत लेकर थाने पर पहुंचे कि उन्हें मारने-पीटने के अलावा पेशाब पिलाई गई और मूंछ उखाड़ी गई."

एसएसपी के मुताबिक दलित किसान की ओर से गांव के चार लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी और अगले ही दिन पुलिस ने चारों लोगों को गिरफ़्तार कर लिया. पुलिस ने चारों अभियुक्तों के ख़िलाफ़ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है और क्षेत्राधिकारी के नेतृत्व में जांच की कार्रवाई चल रही है.

लेकिन गांव के ही लोग कुछ और कहते हैं

लेकिन दूसरी ओर अभियुक्तों के परिवार में इस बात को लेकर नाराज़गी है कि उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. महज़ दो सौ मीटर की दूरी पर स्थित सोमपाल सिंह के घर के आस-पास कई लोग जमा हो जाते हैं और उस चबूतरे यानी चौपाल को दिखाने लगते हैं जहां 'पेड़ पर बांधकर अमानवीय तरीक़े से पीटने' का दलित किसान आरोप लगाते हैं.

गांव के ही रहने वाले सोनपाल सिंह कहते हैं, "मार-पीट की घटना हुई थी, इसे सबने देखा था. एक बार मार खाने के बाद दलित किसान भी लाठी लेकर मारने पहुंचा था इसीलिए फिर दोबारा लड़ाई हुई. लेकिन ये पेशाब पिलाने, मूंछ उखाड़ने, पेड़ से बांधने के आरोप पूरी तरह से झूठे हैं."

पास में ही खड़े सोमपाल सिंह के भाई महावीर सिंह बेहद ग़ुस्से में कहते हैं कि उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है, वो कहते हैं, "हमारी बात इसलिए नहीं सुनी जा रही है कि वो दलित हो गया. भले ही वो ग़लत आरोप लगा दे. हमारे घर के चार बच्चे बिलावजह जेल भेज दिए गए हैं और वो हमें रोज़ देख लेने की धमकी दे रहा है."

दलित किसान के साथ मारपीट के आरोप में जो चार लोग जेल गए हैं उनमें एक महावीर सिंह का भी बेटा है. सोमपाल सिंह सीआईएसएफ़ से रिटायर हैं और गांव में लोग उन्हें फ़ौजी के नाम से बुलाते हैं. महावीर सिंह रोते हुए कहते हैं कि उनके घर के बच्चों के ख़िलाफ़ आज तक न तो कोई केस है और न ही कोई कभी थाने गया है.

Image caption महावीर सिंह

एससी-एसटी एक्ट के तहत केस

गांव के भीतर जाने पर कुछ और बातें पता चलती हैं. दिनेश नाम के एक व्यक्ति कहते हैं, "जिस दिन मार-पीट हुई उस दिन थाने पर सबको समझा दिया गया और मामला सुलझ गया. लेकिन दलित किसान अगले दिन बरेली अपने एक रिश्तेदार के यहां गया और उन्हीं लोगों ने उसे एससी-एसटी एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज कराने और मूंछ उखाड़ने जैसी शिकायत करने के लिए भड़काया."

पेशाब पिलाने, मूंछ काटने या फिर पेड़ से बांधने का गवाह नहीं

बदायूं के एसएसपी अशोक कुमार भी कहते हैं कि 23 तारीख की घटना के बाद मामला शांत हो गया था लेकिन क़रीब एक हफ़्ते बाद यानी 29 अप्रैल को पीड़ित व्यक्ति की ओर से दोबारा मुक़दमा लिखवाया गया और उसी में अमानवीय व्यवहार की शिकायत की गई.

गांव के दूसरे लोगों का भी कहना है कि मार-पीट की घटना को लोगों ने ज़रूर देखा था लेकिन पेशाब पिलाने, मूंछ काटने या फिर पेड़ से बांधने जैसी घटना का कोई चश्मदीद नहीं है.

गांव के कुछ लोगों के मुताबिक सीताराम की गांव के और लोगों से पहले भी लड़ाई हो चुकी है. हालांकि सीताराम और अभियुक्तों की इससे पहले कभी लड़ाई नहीं हुई थी.

इस घटना को शुरू से कवर रहे बदायूं के पत्रकार चितरंजन सिंह कहते हैं, "इसमें ये तो तय है कि सीताराम को कोई पीछे से सपोर्ट कर रहा है क्योंकि यदि ये सब बातें उसके साथ हुई होतीं तो पहले दिन की शिकायत में ये आतीं. लेकिन न तो पुलिस की एफ़आईआर में और न ही सौ नंबर पर ऐसी कोई शिकायत आई है."

दलित पहले भी इन लोगों का खेत काटते आए हैं

स्थानीय लोगों के मुताबिक आज़मपुर गांव में आमतौर पर इस तरह की घटनाएं नहीं होतीं, छोटे-मोटे झगड़े भले ही होते हों. गांव के प्रधान के मुताबिक यहां क़रीब 15 सौ की आबादी है जिनमें चार सौ ठाकुर, तीन सौ यादव, तीन सौ वाल्मीकि और अन्य जातियां हैं. पीड़ित दलित किसान भी वाल्मीकि जाति के हैं.

ख़ुद पीड़ित दलित किसान भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि खेत काटने को लेकर झगड़ा भले ही हुआ हो लेकिन वो इससे पहले भी इन लोगों का खेत काटते आए हैं और ऐसा गांव में आमतौर पर होता है कि लोगों के पास यदि समय होता है तो कटाई में सहयोग देते हैं और उसके बदले उन्हें अनाज या फिर पैसा मिलता है.

सोमपाल सिंह के घर की एक महिला के मुताबिक पीड़ित दलित किसान ने गेहूं काटने के लिए उन लोगों से एडवांस में ढाई हज़ार रुपये ले रखे थे, इसीलिए उनसे खेत काटने के लिए कहा जा रहा था.

दलित किसान पर एडवांस लेने के बाद इंकार करने का आरोप

लेकिन दलित किसान एडवांस पैसे लेने से इनकार कर रहे हैं. महिला को इस बात पर भी आपत्ति है कि दलित किसान के घर वालों को सुरक्षा दी गई है जबकि उनके परिवार के चार युवक जेल में हैं, घर में सिर्फ़ महिलाएं ही हैं, फिर भी उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिली है.

बहरहाल पुलिस ने पीड़ित परिवार की सुरक्षा के लिए तीन पुलिस वालों को हर वक़्त ड्यूटी पर लगा रखा है और गांव में फ़िलहाल शांति दिखाई पड़ रही है. पीड़ित परिवार पुलिस कार्रवाई से संतुष्ट है लेकिन अभियुक्तों और उनके परिवार वालों को इस बात की शिकायत है कि उन्हें उस अपराध की सज़ा दिलाने की कोशिश हो रही है जो उन्होंने किया ही नहीं है.

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