इस वजह से आसमानी बिजली को हल्के में लेना है ख़तरनाक

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आसमान से अचानक गिरने वाली बिजली और धूल भरी आंधियों से भारत कितना सुरक्षित है?

बहुत ज़्यादा नहीं, इस सवाल पर मौसम-वैज्ञानिक एक सुर में यही कहते हैं. ये सवाल तब उठा जब अभी हाल ही में उत्तर भारत में आंधी चलने और बिजली गिरने की वजह से कम से कम 125 लोग मारे गए.

भारतीय मौसम विभाग में मौसम-विज्ञानी के सतीदेवी चेतावनी देती हैं कि आने वाले दिनों में मौसम और खराब रूप दिखा सकता है. उनका कहना है कि अगले चार दिन बेहद अहम हैं और उनका विभाग बदलते मौसम पर 24 घंटे नज़र रख रहा है.

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जलवायु परिवर्तन

जानकारों का कहना है कि हाल-फिलहाल की घटनाएं वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (पश्चिमी विक्षोभ) और गर्म हवाओं के टकराने की वजह से हुईं. लेकिन ये फौरी व्याख्या है.

असल वजह है जलवायु परिवर्तन. विशेषज्ञ कहते हैं कि हालिया आंधी-तूफान बीते 20 सालों में सबसे भीषण था.

भारत में कुछ हिस्से ऐसे हैं, जहां बिजली गिरने की घटनाएं ज़्यादा होती हैं.

ऐसे ही इलाकों में काम कर चुके झारखंड राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के विशेषज्ञ संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि मॉनसून आने से पहले कुछ तैयारियों पर ध्यान नहीं दिया जाता. इसकी वजह से आंधी-तूफ़ान और बिजली गिरने की घटनाओं में बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान हो जाता है.

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विशेषज्ञ संजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''पहले होता ये था कि मॉनसून के आने से पहले घरों की मरम्मत की जाती थी, बेतरतीब पेड़ों की काट-छांट कर दी जाती थी और बिजली के झूलते तारों को भी दुरुस्त कर दिया जाता था.''

वे कहते हैं कि ख़राब मौसम में ख़ुद को कैसे बचाना है, इस बारे में लोगों में जागरुकता की भी कमी है. बिजली गिरने वाले इलाकों में ऊंची इमारतों पर तड़ितचालक (एंटीना) नहीं लगे होते हैं.

संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि साल 2017 में बिजली गिरने की घटनाओं में 3500 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, जबकि इसी दौरान अमरीका में सिर्फ 16 लोग मारे गए थे.

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डॉप्लर रडार की ज़रूरत

अन्य विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि जल्द ही ज़रूरी उपाए नहीं किए गए तो और ज़्यादा नुकसान होगा. विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि जिन इलाकों में बिजली अधिक ज़्यादा है या तूफान अधिक आते हैं, वहां डॉप्लर रडार लगाने की ज़रूरत है. इससे तूफ़ान की दिशा और हवा की रफ्तार का पूर्वानुमान लगाने में मदद मिलती है. भारत में ऐसे रडार केवल 27 हैं.

आंध्रप्रदेश, केरल, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में रिस्क मैपिंग की गई है और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तंत्र प्रणाली विकसित की गई है.

स्कूलों, अस्पतालों और इमारतों में तड़ितचालक लगाए गए हैं जिसकी वजह से बिजली गिरने से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सका है. कुछ राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रमों में प्राकृतिक आपदा के अध्याय शामिल किए गए हैं ताकि लोगों में जागरुकता पैदा की जा सके.

किसानों को जागरुक करने के लिए स्थानीय रेडियो और अख़बारों की मदद ली जा रही है. झारखंड ने इमारत बनाने के लिए नियम बना दिया है कि तड़ितचालक लगाना अनिवार्य है.

आंध्रप्रदेश में भी कम तीव्रता की आसमानी बिजली से होने वाले नुकसान से बचने के लिए लाइटनिंग ट्रैकिंग सिस्टम लगाए गए हैं.

इसी तरह केरल में राज्य आपदा प्रबंधन संस्थान की इमारत में पिंजरानुमा एक ख़ास तरह का यंत्र लगाया गया है जो आसमानी बिजली से इमारत की रक्षा करता है. हवाई अड्डों पर हवाई जहाज़ों की सुरक्षा के लिए भी इसी प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है.

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प्राकृतिक आपदा

राष्ट्रीय स्तर पर, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो एक ऐसी प्रणाली विकसित कर रहा है जो बिजली गिरने और आंधी-तूफान के बारे में पहले से बता देगा.

पांच शहरों नागपुर, रांची, कोलकाता, भुवनेश्वर और रायपुर में पहला पायलट प्रोजेक्ट पिछले साल पूरा कर लिया गया है. अब इसका विस्तार 18 अन्य शहरों में किया जा रहा है.

लेकिन संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि जानमाल की सुरक्षा के लिए इससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से काम करने की ज़रूरत है.

वे कहते हैं, ''शुरुआत तो यहां से होनी चाहिए कि आसमानी बिजली गिरने को राष्ट्रीय आपदा के तौर पर माना जाए क्योंकि भारत में तमाम तरह की प्राकृतिक आपदाओं में सबसे ज़्यादा लोग इसकी वजह से मारे जाते हैं.''

भारत में आधिकारिक तौर पर 12 आपदाओं को प्राकृतिक आपदा माना गया है, लेकिन आसमानी बिजली गिरना उनमें शामिल नहीं है.

आंधी-तूफानः 125 से ज़्यादा की मौत और तूफ़ान आने का अंदेशा

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