नज़रियाः टीवी पर हिंदू-मुस्लिम डिबेट से 'कंडीशनिंग' का खेल

  • 7 मई 2018
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देश की राजधानी में तुग़लक काल के एक मक़बरे को कुछ लोगों ने रंग पोत कर रातोंरात मन्दिर में बदल दिया; राजधानी से सटे देश के आधुनिकतम औद्योगिक शहर गुरुग्राम में इसी शुक्रवार को कुछ हिन्दुत्ववादियों ने कई प्रमुख इलाक़ों में सड़कों पर अदा की जा रही जुमे की नमाज़ नहीं होने दी. ये देश की ये दो ताज़ा तस्वीरें हैं हमें आज़ादी के बाद पहली बार देखने को मिल रही हैं.

मगर ये तस्वीरें न तो आख़िरी हैं और न पहली. चार साल पहले यह सिलसिला शुरू हुआ था, जो नित नए रूपों-प्रतिरूपों में अनवरत और बेधड़क जारी है. न कहीं क़ानून है और न क़ानून का डर. और डर हो भी क्यों? बड़ी पुरानी कहावत है- जब सैंया भये कोतवाल. आगे का मतलब आप समझ ही गए होंगे.

यक़ीनन देश एक बेहद नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है या सच कहें तो ऐसे हालात जानबूझकर, सोच-समझकर बनाए जा रहे हैं. मैं नहीं मानता कि यह सब कुछ संयोग से कहीं-कहीं हो जा रहा है. नहीं, कुछ भी अचानक नहीं हो रहा है.

आपको याद होगा कि केन्द्र में मोदी सरकार बनते ही अचानक गिरजाघरों पर हमलों की घटनाएँ एक-एक कर सामने आई थीं. दुनिया भर में जब इसका शोर उठा तो ये हमले एक दिन अचानक बन्द हो गए. ठीक वैसे ही, जैसे किसी ने बिजली का स्विच 'ऑफ़' कर दिया हो. यह 'स्विच' किसने 'ऑफ़' किया?

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Image caption 2 दिसंबर 2014 को दिल्ली के सैंट सेबैस्टियन्स चर्च में आग लगने के बाद जांच करते पुलिस अधिकारी

हम फॉर्मूला

गिरजाघर अब निशाने पर नहीं हैं, बल्कि अब बड़ी गम्भीरता से 'हम' फ़ॉर्मूले पर काम हो रहा है. 'हम' यानी से हिन्दू, से मुसलमान. लेकिन यह ह+म (ह धन म) का फ़ॉर्मूला नहीं है. यह ह-म (ह ऋण म) का फ़ॉर्मूला है. अंग्रेज़ों के 'हम' फ़ॉर्मूले को नागपुरी खरल में घोट-निचोड़ कर निकाला गया यह नया संस्करण है.

अंग्रेज़ों का तो स्वार्थ सीमित था. इसलिए उनके 'हम' का मतलब था ह=म यानी हिन्दुओं-मुसलमानों को आपस में लड़ाते रहो और राज करते रहो. लेकिन यहां लक्ष्य बहुत बड़ा है, लक्ष्य 'परम वैभव' का है. 'परम वैभव' यानी हिन्दू राष्ट्र. तो इस 'परम वैभव' में भला 'मलेच्छों' की क्या जगह? यानी रहे, न रहे और उसी में समाहित हो जाए.

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छवि ख़राब करने की कोशिश

अब यह ऋण आख़िर होगा कैसे? सांस्कृतिक बीजगणित का प्रश्न है. देखने में बड़ा कठिन लगता है, लेकिन इसका आसान-सा हल है. किसी न किसी बहाने हिन्दू-मुसलमान के सवाल को लगातार उछाले रखो. जो हिन्दुत्व समर्थक हैं, वे तो मुसलमानों को 'शत्रु' मानते ही हैं.

लेकिन हिन्दुओं की विशाल आबादी हिन्दुत्व समर्थक नहीं है. उसके लिए रणनीति यह है कि उनके मन में धीरे-धीरे यह बात बैठा दो कि मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं. इक्का-दुक्का अपवाद हो सकते हैं तो हों, लेकिन आम हिन्दुओं की अगर यह 'कंडीशनिंग' कर दी जाए कि आमतौर पर मुसलमानों में कुछ भी अच्छा नहीं, न आज और न कभी इतिहास में, तो वे मुसलमानों से दूर होते जाएंगे. इस तरह से ऋण का लक्ष्य पाना आसान हो जायगा. लेकिन यह काम कैसे होगा?

आसान तरीक़ा है. कुछ मुद्दे उछाल कर, कुछ एजेंडे लहरा कर, कुछ सवाल फेंक कर माहौल गरमाइए. सोशल मीडिया पर, मुख्यधारा के मीडिया में और टीवी न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो में गरमागरम बहसें हों तो धीरे-धीरे माहौल बनता जाएगा.

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डिबेट से कंडीशनिंग का खेल

इसीलिए, आज जब क़रीब-क़रीब हर दिन टीवी न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो में कुछ तिलक-त्रिपुंडधारी और कुछ दाढ़ी और जालीदार गोल टोपीवाले मौलानाओं के साथ भारी-भरकम पैनल दिखता है, तो हैरानी नहीं होती. आज देश के सारे अहम मसलों को छोड़ कर टीवी चैनलों की सबसे ज़्यादा चिन्ता मुस्लिम मामलों या हिन्दू-मुस्लिम मामलों पर डिबेट कराने की क्यों हो गई है, इसकी वजह का पता तो ऊपर आपको चल ही गया होगा.

और इन बहसों को देख कर अगर आप सोचते हों कि यह सारे के सारे मौलाना, जो अपने को 'आलिम' कहते हैं, वे अक्सर ऐसी बेतुकी और बेहूदा बातें क्यों करते हैं, तो हो गयी आपकी 'कंडीशनिंग' और हो गया मक़सद पूरा. लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि टीवी चैनलों की बहसों में कोई ऐसा मुसलमान क्यों नहीं दिखता या बमुश्किल दिखता है, जो समझदारी की बात करता हो? यानी कि क्या सारे मुसलमान घोंघाबसन्त होते हैं? यानी कि क्या समूची मुस्लिम क़ौम ही ऐसी होती है?

इसे कहते हैं साधारणीकरण यानी एक ऐसा है तो सभी वैसे ही होंगे. एक अगर आतंकवादी है तो सब अगर आतंकवादी न भी हुए तो आतंकवाद के समर्थक तो ज़रूर होंगे. यही है 'कंडीशनिंग' यानी लोगों के मन में एक नक़ली धारणा को उपजा देना, जो बाद में उनका विश्वास बन जाए.

यह सामाजिक मनोविज्ञान की बड़ी जटिल और बहुत धीमी चलनेवाली प्रक्रिया है, लेकिन इससे ऐसी पुख़्ता धारणाएं बनती हैं, जो सदियों तक बनी रह सकती हैं. जैसे गोरा रंग अच्छा होता, अमुक जाति सर्वोत्तम है और अमुक निकृष्ट.

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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

विद्वान मुस्लिम बहस से दूर क्यों?

मुसलमानों की छवि बिगाड़ने में ओवैसी जैसे मुसलमानों के कट्टरपंथी नेताओं के साथ-साथ जड़ मूढ़ तथाकथित 'आलिमों' (आलिम जिसका बहुवचन उलेमा होता है, जिसका अर्थ होता है विद्वान, ज्ञानी) और उनके संगठित जमावड़े मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का तो बड़ा हाथ है ही, लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा बड़ा हाथ है टीवी डिबेट के छोटे-छोटे चौखटों में सायास गढ़ी और जड़ी जा रही मुसलमानों की उस छवि का, जो यह साबित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती कि मुस्लिम समाज आज भी पुरातन कंदराओं में जी रहा है और उसी में बसे रहना चाहता है.

मुसलमानों में बहुत-से सुधारवादी चेहरे हैं, बहुत-से नई सोच के उलेमा हैं, बहुत-से मुसलमान ऐसे हैं जो मुस्लिम समाज को आधुनिक और प्रगतिशील देखना चाहते हैं, जो कठमुल्लेपन के ख़िलाफ़ हैं, लेकिन ऐसे मुसलमान टीवी चैनलों की डिबेट में जगह क्यों नहीं पा पाते? ढूँढ कर ऐसे मुसलमानों को क्यों आगे नहीं लाया जाता?

दूसरी बात यह कि मुसलमानों के विभिन्न समुदायों में बहुत-से धार्मिक-सामाजिक मामलों में बहुत मतभेद हैं. ईमानदारी की बात तो यह है कि ऐसे मुद्दों पर इन मतभेदों को साफ़-साफ़ सामने रखा जाए, ताकि यह बात साफ़ हो सके कि समूची मुस्लिम आबादी वैसा नहीं मानती जैसा कि कोई एक मौलाना किसी टीवी चैनल पर कह रहा था.

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मामला किसी हिन्दू-मुस्लिम मसले से जुड़ा हो, तब भी हम यही देखते हैं कि बहस में वही हिन्दू और मुस्लिम धर्मगुरु शामिल होते हैं, जो विषवचन में प्रवीण होते हैं. आख़िर डिबेट का उद्देश्य स्टूडियो में आग और ज़हर पैदा करना क्यों होता है?

क्या वाक़ई ऐसी बहसों से समाज में किसी स्वस्थ विमर्श की शुरुआत होती है या हो सकती है? क्या टीवी चैनलों के सम्पादकों को नहीं मालूम कि स्टूडियो से निकल कर यह आग और ज़हर समाज में भी फैलते हैं? क्या वे नहीं जानते कि तथ्यहीन और बेहूदा तर्कों, गाली-गलौज से उपजी झूठी धारणाएँ किसी सामाजिक सुधार के बजाय समाज में एक-दूसरे के प्रति सिर्फ़ वैमनस्य ही बढ़ाती हैं?

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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

किसी मुद्दे पर हिन्दू-मुस्लिम दृष्टिकोण में बहुत विवाद अगर हो भी तो क्या दोनों पक्षों के सौम्य धर्माचार्यों, जानेमाने विद्वान विशेषज्ञों, अध्येताओं, इतिहासविदों, प्रोफ़ेसरों, डॉक्टरों, वकीलों को बुलाकर शालीन और गम्भीर विमर्श नहीं किया जा सकता?

लेकिन टीवी चैनलों पर जो बहस की नौटंकी है, वह सिर्फ़ भावनाएँ भड़कानेवाली है. उससे समाज का कोई भला नहीं हो रहा है, बल्कि वह सिर्फ़ सामाजिक रिश्तों में ज़हर घोल रही है. जाने-अनजाने वह एक ख़तरनाक कंडीशनिंग कर रही है, जो ऋण के लिए सुभीते की बात है.

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