ब्लॉग: इस राजनीति को समझिए वरना भगवत् भजन कीजिए

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर हटाने पर बवाल है. गुड़गाँव में कम से कम दस जगहों पर जुमे की नमाज़ में ख़लल डाला गया.

दिल्ली के सफ़दरजंग एनक्लेव में तुग़लक़ काल की एक क़ब्र की गुमटी पर भगवा रंग पोत कर उसे 'मंदिर' में बदल डाला गया.

दिल्ली के ही सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज के चर्च की दीवारों पर नारा लिखा पाया गया - मंदिर यहीं बनेगा.

अलग-अलग वक़्त पर और अलग-अलग जगहों पर हुई इन घटनाओं में अगर हमें कोई आपसी संबंध नज़र नहीं आ रहा हो तो हम और आप जैसे असहाय मतदाताओं को भारत में लोकतंत्र के भविष्य की चिंता छोड़कर भगवत् भजन में लीन हो जाना चाहिए.

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बहुत नहीं थोड़ा और पीछे चलिए...

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले आपको बताया गया कि दबंग और अपराधी क़िस्म के मुसलमानों के डर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना इलाक़े के हिंदुओं को अपने घर छोड़कर भागना पड़ रहा है.

कुछ टीवी रिपोर्टरों ने हमें बताया था कि कैराना दूसरा कश्मीर हो गया है जहाँ हिंदू एक बार फिर पलायन करने पर मजबूर हुए हैं.

पर ऐसा लगता है कि आजकल वहाँ के हिंदुओं को दबंग मुसलमानों का कोई डर नहीं है. फ़िलहाल हिंदुओं को पलायन की बात कोई नहीं कर रहा है.

चार साल पहले केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आते ही आगरा से लेकर कई छोटे-छोटे क़स्बों में ईसाईयों और मुसलमानों की 'घर-वापसी' के नाम पर उनसे हवन-पूजन करवाया गया.

फिर ऐसा लगा कि मुसलमानों ने हिंदुओं की नस्ल ख़त्म करने के लिए 'लव-जिहाद' नाम की सबसे बड़ी साज़िश रच डाली है.

इसी बीच कभी गोमांस रखने, कभी गोवंश की तस्करी करने, कभी लव-जिहाद के शक में कई जगहों पर मुसलमानों को मारा पीटा जाता रहा है या उनकी हत्या तक की गई है.

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आसनसोल से लेकर औरंगाबाद तक

वो वीडियो आपने भी देखा होगा जिसमें दाढ़ी और टोपी वाले एक निरीह, अकेले और लाचार से दिखने वाले एक दुबले-पतले ग़रीब आदमी को महँगी कार में बैठा एक मोटा नौजवान गालियाँ देते हुए ज़बरदस्ती जय श्रीराम का नारा लगवा रहा है.

ये सब काम दबे-छिपे ढंग से नहीं बल्कि हाथ में हिंदुत्व का भगवा झंडा - और कभी कभी तिरंगा भी - उठाकर खुलेआम किए जाते हैं.

नवरात्रि और रामनवमी के त्योहार कभी भक्ति का पुट लिए हुए होते होंगे पर अब वो नंगी तलवारों और त्रिशूलों के डरावने प्रदर्शन का बहाना बन कर रह गए हैं.

ऐसे त्योहारों में मोटरसाइकिल सवार 'राष्ट्रभक्तों' की टोली मुसलमानों के मोहल्ले में जाकर जय श्रीराम, पाकिस्तान मुर्दाबाद, भारत माता की जय जैसे नितांत संवैधानिक नारों के साथ साथ 'भारत में रहना है तो वंदेमातरम कहना होगा' जैसे नितांत असंवैधानिक नारे लगाती है.

यही नहीं ये टोलियाँ मुसलमानों को भी ऐसे नारे लगाने के लिए मजबूर करती हैं.

पश्चिम बंगाल के आसनसोल से लेकर बिहार के औरंगाबाद तक में रामनवमी के उग्र जुलूसों के बीच देखते ही देखते पथराव और आगज़नी शुरू की गई. लोग मारे गए. करोड़ों की संपत्ति भस्म कर दी गई.

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ये सब कौन करता है?

कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को देखकर आप कल्पना भी कर सकते हैं कि वो अपने स्वयंसेवकों को ऐसी हिंसा के लिए उकसाते होंगे?

वो हर विजयदशमी को प्राचीन परंपराओं का हवाला देते हुए हिंदू दार्शनिकता से लबालब भरे विभिन्न तरह के सुभाषित वाक्य ही तो कहते हैं.

हिंदू समाज को एक करने, उसे अपनी प्राचीन परंपराओं से जुड़े रहने को प्रेरित करने, अपने तीज-त्योहार मनाने, अपने देवी-देवताओं की आराधना करने के लिए कहने में आख़िर बुराई ही क्या है?

संघ एक सांस्कृतिक संगठन है और इसका राजनीति से कुछ लेना देना नहीं है. संघ के बड़े बड़े अधिकारी बरसों से ये बात कहते चले आ रहे हैं.

वो कहते हैं कि संघ किसी भी संगठन को कुछ करने का निर्देश नहीं देता. वो सिर्फ़ प्रेरणा देता है. लेकिन इसी तरह प्रेरणा देने का काम अपने टीवी शोज़ ज़ाकिर नाइक भी करते थे, लेकिन उन्हें मुल्क में घुसने की इजाज़त नहीं है.

राम जन्मभूमि आंदोलन में आरएसएस सीधे शरीक नहीं हुआ. उसने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) को ये काम सौंपा.

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हिंदू उद्देश्य के लिए...

विहिप कहता है कि हमारा काम धर्म का काम है. हम साधु-संतों के आशीर्वाद से हिंदू उद्देश्य के लिए काम करते हैं और हिंसा से हमारा कोई संबंध नहीं है.

'सुरक्षा आदि' के काम के लिए 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने बजरंग दल का गठन किया.

बजरंग दल अपने स्वयंसेवकों को 'आत्मरक्षा' में लाठी, छुरा, त्रिशूल और बंदूक़ चलाने की ट्रेनिंग देता है - और इन ट्रेनिंग कैंपों में दुश्मन का रोल कर रहे स्वयंसेवकों को मुसलमानों जैसी दाढ़ी और टोपी में दिखाया जाता है.

इसी बजरंग दल के बाबू बजरंगी जैसे नेता अहमदाबाद के पास मुसलमानों की बस्ती नरोदा पाटिया में पुलिस की मौजूदगी में संगठित तौर पर हत्या और आगज़नी का खेल बेखटके खेलते हैं. अदालत से उनको सज़ा भी होती है.

मगर इन हत्याओं का कलंक बाबू बजरंगी पर तो लगता है, बजरंग दल पर क्यों नहीं और बजरंग दल को प्रेरणा देने वाले विश्व हिंदू परिषद और उसे प्रेरणा देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर क्यों नहीं?

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बाबरी मस्जिद विध्वंस

संघ को हिंसा से वैसा गुरेज कभी नहीं रहा जैसा महात्मा गाँधी को था.

महात्मा गाँधी ने अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ देश भर में फैल चुके असहयोग आंदोलन को चौरी-चौरा की हिंसा के बाद बिना सोचे तुरंत वापिस ले लिया.

लेकिन संघ को कभी इस बात का अफ़सोस तक नहीं हुआ कि उसकी प्रेरणा से चल रही बीजेपी की सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट को बाबरी मस्जिद की सुरक्षा का वचन दिया था, फिर भी स्वयंसेवकों ने ही बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर डाला.

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अटल बिहारी वाजपेयी ने तो कारसेवकों को वैसी ही मीठी झिड़की दी थी जैसी घर के लाडले पर शैतान बच्चे को दी जाती है.

बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद वाजपेयी ने कारसेवकों से कहा - अरे बंदरो, तुमने तो मंदिर ही तोड़ डाला !

हिंसा के प्रति संघ की संस्तुति का उदाहरण जब जब दिया जाता है तब तब संघ अपने सेवा प्रकल्पों का ज़िक्र करना नहीं भूलता.

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Image caption हैदराबाद की एक निचली अदालत ने 11 साल पहले हुए मक्का मस्जिद धमाके के सभी अभियुक्तों को 16 मई को बरी कर दिया था

परवाह ही नहीं करते...

ये सच भी है कि जहाँ बजरंग दल अपने कार्यकर्ताओं को बंदूक़ चलाने और छुरेबाज़ी का प्रशिक्षण देता है, वहीं वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संघ से प्रेरणा पाने वाले संगठनों में काम करने वाले स्वयंसेवक वन-प्रांतरों और दूर दराज़ के गाँवों में सेवा प्रकल्प करते हैं.

इनमें गहरी प्रतिबद्धता वाले ऐसे प्रचारकों और स्वयंसेवकों की कमी नहीं होती जो इस बात की परवाह ही नहीं करते कि दिल्ली में किसकी सरकार है.

ऐसे ही सेवा प्रकल्पों से स्वामी असीमानंद जैसे लोग भी निकले हैं जिनपर समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ़ और मक्का मस्जिद में बम विस्फोट करने के आरोप लगे और अब कई मामलों में उन्हें बरी भी कर दिया गया है.

इस तरफ़ अदालत का फ़ैसला आया और उधर दूसरी तरफ़ कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी पर हिंदू संस्कृति का विरोध करने का आरोप जड़ा और उनसे हिंदू समाज से माफ़ी माँगने को कहा.

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लोकतंत्र के भविष्य की चिंता

पर स्वामी असीमानंद और अमित शाह या नरेंद्र मोदी का गुड़गाँव के भगवा पटकेधारी उदंड लड़कों से क्या संबंध जो जुमे की नमाज़ पढ़ रहे मुसलमानों की क़तारों में पहुँचकर वंदेमातरम् और जय श्रीराम के नारे लगाने लगते हैं और नमाज़ में व्यवधान डालते हैं?

ज़ाहिर है वो नरेंद्र मोदी, अमित शाह या मोहन भागवत से आदेश लेकर तो नमाज़ पढ़ रहे लोगों को डराने नहीं जाते.

ये तो हिंदू संयुक्त संघर्ष समिति का फ़ैसला था जिसमें बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और हिंदू जागरण मंच के लोग शामिल हैं.

प्रिय पाठकों, मैं यहीं पर अपनी बात समाप्त करता हूँ और अगर अब भी आपको ऊपर गिनाई गई अनगिनत घटनाओं और पात्रों के बीच कोई संबंध नहीं दिखता तो भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की चिंता छोड़कर वाक़ई भगवत् भजन में लीन होने का समय आ गया है.

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