पश्चिम बंगाल: ममता दीदी को उनके हथियार से ही मात देने की तैयारी में भाजपा

  • 6 मई 2018
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पश्चिम बंगाल में इस महीने होने वाले पंचायत चुनावों से पहले बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा और इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई के शोर के बीच भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए दीदी यानी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हथियार से ही उनको मात देने की तैयारी कर ली है.

यह रणनीति है अल्पसंख्यकों का समर्थन जुटाने की. इसके तहत पार्टी ने साढ़े आठ सौ से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जो एक नया रिकॉर्ड है. भाजपा ने अब तक राज्य में किसी भी चुनाव में अल्पसंख्यकों को इतने बड़े पैमाने पर टिकट नहीं दिए थे.

राज्य में किसी भी चुनाव में अल्पसंख्यकों का समर्थन निर्णायक होता रहा है. बंगाल में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 30 फ़ीसदी है. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इसी ब्रह्मास्त्र के जरिए 34 साल तक सत्ता में रहे वाममोर्चा को मात दी थी.

अब माकपा और कांग्रेस को पछाड़ कर तेजी से नंबर दो की कुर्सी की ओर से बढ़ती भाजपा ने भी यही रणनीति अपनाई है. वैसे, पार्टी के रणनीति में बदलाव का संकेत तो कुछ महीने पहले से ही मिलने लगा था. भाजपा ने यहां पहली बार अल्पसंख्यकों के एक सम्मेलन का आयोजन इसका संकेत दे दिया था.

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भाजपा को मलाल

वैसे, इतनी बड़ी तादाद में अल्पसंख्यकों को उम्मीदवार बनाने के बावजूद भाजपा के प्रदेश नेतृत्व को इस बात का मलाल है कि वह और ज्यादा मुस्लिमों को मैदान में नहीं उतार सकी.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "अगर नामांकन की प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं होती तो हमने दो हजार से ज्यादा अल्पसंख्यकों को मैदान में उतारा होता."

यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि वर्ष 2013 के बीते पंचायत चुनावों में पार्टी ने सौ से भी कम अल्पसंख्यकों को टिकट दिया था. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी ने महज छह अल्पसंख्यकों को ही मैदान में उतारा था.

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पार्टी के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि राजनीतिक रणनीति में बदलाव के चलते ही पार्टी ने अबकी इतनी बड़ी तादाद में अल्पसंख्यकों को मैदान में उतारा है. अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले आखिरी बड़ा चुनाव होने के नाते पंचायत चुनावों की अहमियत काफी बढ़ गई है.

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पूर्वोत्तर फतह के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अब बंगाल पर ध्यान केंद्रित किया है. पार्टी की निगाहें लोकसभा चुनावों पर हैं. उससे पहले वह ग्रामीण इलाकों में अपने पांव मजबूती से जमाना चाहती है. रणनीति में यह बदलाव पार्टी की उसी दीर्घकालीन रणनीति का नतीजा है.

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भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष अली हुसैन कहते हैं, "बंगाल में मुस्लिमों की खासी आबादी है. ऐसे में उनका समर्थन जुटाना अहम है."

उनका दावा है कि अब अल्पसंख्यक तबका समझ गया है कि भाजपा उसका दुश्मन नहीं है. प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष भी दावा करते हैं कि पार्टी की विकासमूलक नीतियों के प्रति अल्पसंख्यकों में भरोसा बढ़ा है. वह कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों के चयन में पार्टी यही रणनीति अपनाएगी. घोष के मुताबिक, पार्टी जाति और धर्म के आधार पर नहीं बल्कि जीत सकने लायक उम्मीदवारों को टिकट देगी.

भाजपा ने अल्पसंख्यकबहुल मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दक्षिण 24-परगना बीरभूम और मालदा में सबसे ज्यादा अल्पसंख्यकों को मैदान में उतारा है.

नीति में बदलाव

भाजपा सूत्रों का कहना है कि बीते साल तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद मुकुल राय के पार्टी में शामिल होने के बाद ही रणनीति में यह बदलाव आया है. मुकुल को तृणमूल कांग्रेस की कामयाबी का वास्तुकार माना जाता है.

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Image caption कांग्रेस के पूर्व सांसद मुकुल राय

पंचायत चुनाव तमाम दलों के लिए अपनी ताकत मापने का पैमाना साबित होगा. यही वजह है कि तमाम दलों ने अगले आम चुनावों से पहले होने वाले इन चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. इन चुनावों के लिए मतदान 14 मई को होंगे. उम्मीदवारों की तादाद के मामले में भाजपा ने कांग्रेस और माकपा को काफी पीछे छोड़ दिया है.

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने दावा किया है कि राज्य के मुसलमान ममता के साथ हैं.

पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "अल्पसंख्यकों को टिकट देकर भाजपा राज्य में दंगे भड़काने का प्रयास कर रही है. लेकिन मुस्लिम दीदी के साथ हैं."

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