ग्राउंड रिपोर्ट: गुड़गाँव में जुमे की नमाज़ के विवाद की असलियत

  • 11 मई 2018
मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जा रही है इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Presentational grey line
  • गुड़गाँव की कुल आबादी 15 लाख, इसमें करीब 3 लाख मुसलमान हैं
  • गुड़गाँव में कुल 13 छोटी-बड़ी मस्जिदें, यानी करीब 23 हज़ार मुसलमानों के लिए एक मस्जिद
  • हरियाणा वक़्फ़ बोर्ड के मुताबिक़ 9 मस्जिदों पर अवैध कब्जा
  • मस्जिद के लिए ज़मीन मिलना मुश्किल
  • कई मस्जिदें मुकदमेबाज़ी में फंसी हैं
Presentational grey line
गुरुग्राम इमेज कॉपीरइट AFP/Getty images

दो दशकों में हरियाणा के गुड़गाँव में जिस तेज़ी से दफ़्तर और अपार्टमेंट उग आए हैं उन्हें बनाने और चलाने में लाखों लोग लगे हैं, इनमें बड़ी आबादी कारीगरों-कामगारों की है.

इन मेहनतकश लोगों में पड़ोस के मेवात क्षेत्र से आने वाले मुसलमानों की तादाद अच्छी-ख़ासी है, गुड़गाँव की पंद्रह लाख की आबादी में अंदाज़न तीन लाख मुसलमान हैं. मुसलमानों में एक बड़ी तादाद वैसे लोगों की भी है जो कामकाज के सिलसिले में रोज़ यहां आते-जाते हैं.

तीन लाख की इस आबादी के लिए गुड़गाँव में कुल 13 छोटी-बड़ी मस्जिदें हैं, इनमें से कोई मस्जिद इतनी बड़ी नहीं है कि उनमें हज़ारों लोग नमाज़ पढ़ सकें.

गुरुग्राम इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

नमाज़ में बाधा का मामला

पिछले कई महीनों से मुसलमानों को लगातार धमकियाँ मिल रही थीं कि वे जुमे की नमाज़ ख़ाली सरकारी ज़मीनों पर न पढ़ें, मुस्लिम संगठन इमामों को धमकाये जाने की बात भी कहते हैं.

मामला तब बढ़ गया जब 20 अप्रैल को हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े लोगों ने जुमे की नमाज़ के "बीच जाकर हंगामा मचाया, जय श्रीराम के नारे लगाए और नमाज़ियों को वहां से जाने को मजबूर किया."

पुलिस ने शहज़ाद ख़ान की शिकायत पर छह लोगों को गिरफ्तार किया जो अब ज़मानत पर रिहा हैं.

लेकिन सिलसिला थमा नहीं है, पिछले शुक्रवार फिर ऐसी घटना नमाज़ियों के एक दूसरे समूह के साथ हुई और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ ऐसा पुलिस की मौजूदगी में हुआ.

गुड़गाँव के पुलिस कमिश्नर संदीप खिरवार कहते हैं, "किसी को भी क़ानून हाथ में लेने की इज़ाज़त नहीं है. हमने पहले भी इस मामले में कार्रवाई की है और अभी भी तफ़्तीश जारी है और जो ज़रूरी होगा उस हिसाब से क़दम उठाए जाएंगे".

गुड़गाँव पुलिस इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Image caption गुड़गाँव पुलिस [सांकेतिक तस्वीर]

लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और राज्य के एक अन्य मंत्री अनिल विज के बयानों के बाद मामला साफ़ तौर पर राजनीतिक रंग ले चुका है. खट्टर ने सलाह दी थी कि मुसलमान सार्वजनिक स्थानों पर नमाज़ न पढ़ें जबकि विज ने संकेत दिया था कि ऐसा ज़मीन पर कब्ज़ा करने की नीयत से किया जा रहा है.

हालांकि मुख्यमंत्री ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान का मतलब किसी को नमाज़ पढ़ने से रोकने का नहीं था.

गुड़गाँव में रहने वाले फ़िल्म निर्माता राहुल रॉय कहते हैं, "संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ये समझना चाहिए कि उनके बयान से लोग तरह-तरह के निष्कर्ष निकालते हैं. साथ ही प्रशासन भी राजनीतिक नेतृत्व के बयानों में संकेत देखता है".

राजनीति दल स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनुपम पूरे विवाद और बयानों में सोची समझी राजनीतिक चाल की तरह देखते हैं.

वे कहते हैं, "एक मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है, एक ऐसी कहानी गढ़ने की कोशिश हो रही है जिसके आधार पर लोगों में सांप्रदायिक विभाजन पैदा किया जा सके." वो कहते हैं कि सब जानते हैं कि इस तरह के विभाजन का फ़ायदा किसे होता है.

अभिषेक गौड़, राजीव मित्तल
Image caption अभिषेक गौड़ (बाएँ) बजरंग दल से जुड़े हैं जबकि राजीव मित्तल अखिल भारतीय हिंदू क्रांति दल के ज़िला अध्यक्ष हैं

'जुमे का जमावड़ा शक्ति प्रदर्शन है'

अखिल भारतीय हिंदू क्रांति दल के राष्ट्रीय प्रभारी राजीव मित्तल कहते हैं, "वज़ीराबाद में नमाज़ पढ़ रहे लोगों के बीच से किसी ने 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद, हिंदुस्तान मुर्दाबाद' के नारे लगाए, जिस पर स्थानीय लोगों ने ऐतराज़ किया और बात अल्लाह-हो-अकबर और जय श्रीराम तक पहुंच गई, विवाद और बढ़ा, वो लोग नमाज़ छोड़कर चले गए."

मित्तल कहते हैं, "ये कहकर इसका प्रचार किया जा रहा है कि नमाज़ रोक दी गई, लेकिन नमाज़ रोकना विषय है ही नहीं". मित्तल इसके बाद क़ानून का मुद्दा उठाते हैं, वे कहते हैं कि सरकारी ज़मीन पर बिना अनुमति के नमाज़ पढ़ना ग़ैर-क़ानूनी है.

गुड़गाँव रेलवे स्टेशन के पास मौजूद सूरत नगर में राजीव मित्तल के घर पर ही अभिषेक गौड़ मौजूद हैं. वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन बजरंग दल के ज़िला संयोजक हैं.

अभिषेक गौड़ कहते हैं कि मुसलमानों के बीच "कुछ ऐसे लोग हैं जो ख़ाली सरकारी ज़मीनों की तलाश करते हैं और दूसरी जगहों से वहाँ लोगों को नमाज़ पढ़ने के लिए भेजा जाता है."

गुड़गाँव में रहने वाले राजकरण यादव मानते हैं कि "ये ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने का खेल है" लेकिन लेकिन साथ ही वो मुसलमानों के जुमे की नमाज़ को "शक्ति प्रदर्शन" के तौर पर देखते हैं.

हरियाणा वक्फ़ बोर्ड का पत्र
Image caption हरियाणा वक्फ़ बोर्ड ने मस्जिदों पर अवैध कब्ज़े के बारे में जिलाधिकारियों को सूचित किया है और इन्हें खाली कराने की गुज़ारिश की है

असल में मस्जिदों पर है अवैध क़ब्ज़ा

जिस वज़ीराबाद में सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करने की नीयत से नमाज़ पढ़ने का मामला उठ रहा है, दरअसल, वहीं एक मस्जिद लंबे वक़्त से स्थानीय लोगों के अवैध क़ब्ज़े में है जहाँ मुसलमान नमाज़ नहीं पढ़ सकते.

हरियाणा वक़्फ़ बोर्ड के मुताबिक़, शहर की परिधि में कम से कम नौ ऐसी मस्जिदें हैं जिन पर लोगों ने अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है और वहाँ नमाज़ पढ़ना संभव नहीं है.

मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक हिंदू संघर्ष समिति ने मांग की है कि प्रशासन की आज्ञा के बिना शहर के किसी हिस्से में नमाज़ पढ़ने की इजाज़त न हो. उनका ये भी कहना है कि नमाज़ की आज्ञा वैसे क्षेत्रों के लिए न दिए जाएँ जो हिंदू-बहुल हों.

दूसरी ओर, गुड़गाँव में रहने वाले सौ से अधिक नामी-गिरामी लोगों ने ज़िले के आयुक्त डी सुरेश को एक ज्ञापन दिया है जिसमें कहा गया है कि हिंदू संघर्ष समिति की माँग "संविधान से मिले मौलिक अधिकारों, ख़ास तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन है".

अलग-अलग धर्म और समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाले इन नागरिकों ने उम्मीद जताई है कि सरकारी ज़मीन के इस्तेमाल के मामले में प्रशासन सभी धर्मों को मानने वाले लोगों से एक जैसा व्यवहार करेगा जैसा संविधान में बताया गया है.

इंडियन इस्लामिक रिसर्च सेंटर, अल हिंद ट्रंट और मुस्लिम माइनोरिटी ट्रस्ट की रिपोर्ट
Image caption मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन मिलना मुश्किल है

बढ़ती आबादी और जगह की कमी

कभी 50 हज़ार की आबादी वाला गुड़गाँव अब 15 लाख से अधिक लोगों का बसेरा बन चुका है जिनमें तीन लाख मुसलमान हैं.

जुमे की नमाज़ सामूहिक रूप से पढ़ने की परंपरा है, शहर की 13 मस्जिदें कम पड़ती हैं जिसमें कइयों में कई खेप में नमाज़ के इंतज़ाम के बावजूद 18-20 हज़ार से अधिक लोग नमाज़ नहीं पढ़ सकते.

जैसे गुड़गाँव के सेक्टर-57 की अंजुमन जामा मस्जिद में ही कई खेप में नमाज़ होती है लेकिन चार मंज़िला मस्जिद दशकों से अधूरी पड़ी है.

अंजुमन जामा मस्जिद इमेज कॉपीरइट Anjuman Jama Masjid
Image caption अंजुमन जामा मस्जिद का मॉडल, ये मस्जिद अधूरी पड़ी है

इस मस्जिद के लिए ज़मीन हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) से आधिकारिक तौर पर ख़रीदी गई है लेकिन मस्जिद एक क़ानूनी विवाद में उलझ गई है और मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

अंजुमन के प्रबंधन से जुड़े एक व्यक्ति का कहना है कि इन मामलों में अदालतें मस्जिद के पक्ष में फ़ैसले देती रही हैं लेकिन फिर कोई नया व्यक्ति नए केस के साथ खड़ा होता जाता है.

केस करने वाले और मस्जिद निर्माण के ख़िलाफ़ स्टे लाने वाले लोगों में से काफ़ी तो प्रॉपर्टी डीलर्स बताए जाते हैं.

सामाजिक और धार्मिक कार्यकर्ता इस्लामुद्दीन के मुताबिक़ "कुछ लोगों को लगता है कि मस्जिद जैसे पूजा स्थल के बनने से इलाक़े की प्रॉपर्टी के रेट कम हो जाएँगे."

ग़ौरतलब है कि गुड़गाँव में ऐसे सैकड़ों अपार्टमेंट हैं जिनके भीतर मंदिर हैं लेकिन उनके भीतर किसी मस्जिद के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

नमाज़ पढ़ता व्यक्ति इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

हुडा भी कटरे में

हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) समय-समय पर पूजास्थलों और दूसरे धार्मिक कामों के लिए ज़मीन देता है. ऐसे आवंटन कुछ नियमों और शर्तों के साथ रियायती दरों पर किए जाते हैं.

लेकिन हुडा ख़ुद भी कई बार जाने-अनजाने वक्फ़ की संपत्ति पर ग़लत फ़ैसले ले बैठता है या ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है जो वक़्फ़ के लिए नुक़सानदेह साबित हुआ है.

मिसाल के तौर पर हंस एन्क्लेव कॉलोनी में मस्जिद के लिए हरियाणा वक़्फ़ बोर्ड के ज़रिए ख़रीदी गई ज़मीन चार दशकों से फंसी पड़ी है और उस पर कुछ भी निर्माण संभव नहीं हो पाया है क्योंकि उसे हुडा ने अपने कब्ज़े में ले लिया है.

हुडा के इस अधिग्रहण के खिलाफ़ कुछ लोग अदालत चले गए, इस दौरान वहां अनाधिकृत कॉलोनी बस गई. अब सरकार ने हंस एन्क्लेव को नियमित करने का मन बनाया है. वक़्फ़ को उम्मीद है कि ऐसा हो जाने का बाद मस्जिद बनने का काम शुरु हो सकेगा लेकिन उसमें बरसों लग सकते हैं.

मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जा रही है
Image caption कोई मस्जिद इतनी बड़ी नहीं है जहाँ हज़ारों लोग नमाज़ पढ़ सकें

उसी तरह, चोमा गांव में मस्जिद की ज़मीन को किसी दूसरे काम के लिए लेने के हुडा के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हरियाणा-पंजाब हाईकोर्ट ने हाल में ही फ़ैसला दिया है, अदालत ने कहा है कि इसके बदले हुडा वक़्फ़ को दूसरी जगह ज़मीन दे.

चोमा मस्जिद मामले के बारे में हरियाणा वक़्फ़ बोर्ड के गुड़गाँव संपदा अधिकारी जमालुद्दीन कहते हैं, "हम हुडा के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं."

संपदा अधिकारी ने चंद दिनों पहले 19 मजिदों की लिस्ट जारी की है और प्रशासन से कहा है, "अगर इन मस्जिदों को प्रशासन अवैध क़ब्ज़ों से मुक्त करा देता है और पुलिस संरक्षण देता है तो वक्फ़ बोर्ड इनकी मरम्मत करवाकर अपने ख़र्च से इमामों की तैनाती करने को तैयार है ताकि वहाँ नमाज़ हो सके".

जमालुद्दीन कहते हैं ऐसा हो जाने पर लोगों के सार्वजनिक स्थलों पर नमाज़ पढ़ने की समस्या काफ़ी हद तक हल हो जाएगी.

मुसलमानों के लिए क्यों ख़ास है जुमे की नमाज़

नमाज़ियों पर हरियाणा के मुख्यमंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया

मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जा रही है
Image caption गुड़गाँव के मुसलमानों में बड़ी आबादी मेवात से आए लोगों की है

'कौन खुले में नमाज़ पढ़ना चाहता है?'

पेशे से अकाउंटेंट और मुस्लिम संगठन इंडिया इस्लामिक रिसर्च सेंटर के सदस्य मोहम्मद अरशान कहते हैं, "किसको लगता है कि हम जानबूझ कर खुले में नमाज़ पढ़ना चाहते हैं?"

"आप जून-जुलाई में आकर देखें कि तेज़ गर्मी में जुमे की नमाज़ अदा करने में लोगों की क्या हालत होती है, और अब तो चंद दिनों में रमज़ान शुरु होने वाले हैं और गर्मी ज़ोर पर है."

अरशान कहते हैं कि मस्जिदों के लिए ज़मीन मिलना इतना आसान नहीं है. दो मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं-- इंडिया इस्लामिक रिसर्च सेंटर और मुस्लिम माइनॉरिटी ट्रस्ट-- ने दो साल पहले हुडा के विज्ञापन के बाद मस्जिद की ज़मीन के लिए आवेदन किया था लेकिन वो रिजेक्ट हो गया.

गुड़गाँव के आयुक्त डी सुरेश कहते हैं कि कई आवेदन इसलिए भी रद्द हो जाते हैं क्योंकि वो कुछ शर्तें पूरी नहीं कर पाते, जैसे पूजास्थलों के लिए ज़मीन पाने वाली संस्था का धार्मिक संगठन होना ज़रूरी है, साथ ही उनके पास पर्याप्त फंड हो और साथ ही उनका पिछला रिकॉर्ड भी ध्यान में रखा जाता है.

डी सुरेश कमिश्नर होने के नाते हुडा की उस समिति में हैं जो पूजा स्थलों के लिए ज़मीन आवंटित करती है.

वो कहते हैं, "इस साल भी हमने ऐसी जगहों के लिए इश्तिहार दिया है लेकिन मुस्लिमों की तरफ़ से किसी ने आवेदन नहीं दिया है".

मस्जिद पर फ़ैसला लेने के लिए बैठक
Image caption प्रशासन इस समस्या का हल निकालने की कोशिश में है

क्या है रास्ता?

प्रशासन ने मुस्लिम समूहों से वैसी जगहों की लिस्ट मांगी है जहां वो नमाज़ अदा करना चाहते हैं और इस सिलसिले में वो अलग-अलग विभागों से बात करने के अलावा हिंदू समूहों से भी बात कर रहा है.

इस्लामुद्दीन कहते हैं, "मुसलमानों ने ऐसी 70 छोटी-बड़ी जगहों की लिस्ट तैयार की है जहां किसी को किसी तरह की असुविधा के बिना जुमे की नमाज़ सार्वजनिक स्थान पर अदा हो सकती है".

रमज़ान को बस चंद दिन हैं, जिस दौरान नमाज़ियों की तादाद आम दिनों से अधिक हो जाती है.

कुछ लोग मामले के निपटारे के लिए कार्पोरेट सोशल रिस्पॉंसबिलिटी की बात भी कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि गुड़गांव में इस तरह के विवाद से दुनिया भर में बहुत ख़राब मैसेज जा रहा है जिसका असर उद्योग-धंधों पर भी पड़ेगा.

गुड़गांव इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Image caption गुड़गाँव विदेशी कंपनियों के दफ़्तरों से भरा पड़ा है

भारत की मिलेनियम सिटी कहे जाने वाले गुड़गांव में फॉरच्यून 500 कंपनियों में से ढाई सौ के दफ़्तर हैं और वो मेडिकल सुविधा के एक बड़े केंद्र के तौर पर दुनिया में उभरा है.

गुड़गाँव में रहने वाली फ़ैशन डिज़ाइनर सिमी चावला का सुझाव है कि कंपनियों को ख़ुद ही ये व्यवस्था करनी चाहिए कि उसके मुसलमान कामगार परिसर में ही जुमे की नमाज़ अदा कर पाएँ.

सिमी चावला कहती हैं, "मैंने ये सुझाव अपने कारीगरों को दिया है और वो इसके लिए तैयार हैं".

संस्कृत से आई 'नमाज़', इसी से मिला 'बग़दाद'

ब्लॉग: मीडिया मुसलमानों को एक ही तरह से क्यों देखती है?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार