पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में कितनी पॉलिटिक्स, कितनी इकोनॉमी

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देश भर में बीते 24 अप्रैल से पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है और ये स्थिति तब है जब बीते 24 अप्रैल से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें तीन डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ी हैं.

माना जा रहा है कि कर्नाटक चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार के निर्देश पर तेल कंपनियों ने पेट्रोलियम की क़ीमतों को स्थिर रखा है और चुनाव ख़त्म होते ही पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें बढ़ जाएंगी क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें बीते 55 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है.

ये स्थिति तब है जब जून, 2017 से तेल कंपनियों ने पेट्रोलियम की क़ीमतों को डायनमिक डेली रिवीज़न के तौर पर परिवर्तित करना शुरू किया है. इस नीति के तहत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के मुताबिक पेट्रोल, डीज़ल के दाम रोज़ाना बदल जाते हैं.

केंद्र सरकार कई मौकों पर ये दोहराती रही है कि तेल की क़ीमतों पर उनका अपना कोई नियंत्रण नहीं है, ऐसे में दिलचस्प सवाल यही है कि चुनावी मौसम के दौरान कैसे सरकारों के दबाव में तेल की क़ीमतें बिलकुल स्थिर हो जाती हैं.

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इस बारे में आर्थिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष सिन्हा कहते हैं, "पेट्रोलियम बाज़ार की दुनिया में एक मुहावरा खूब चलता है. ऑयल इज़ 90 फ़ीसदी पॉलिटिक्स एंड 10 फ़ीसदी इकोनॉमी. यही वजह है कि जब सरकार चाहती है तब पेट्रोलियम की क़ीमतों पर लगाम लग जाता है."

हालांकि, भारत के पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मीडिया में कहा कि इसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है, वहीं भारत की सार्वजनिक उपक्रम की तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के चेयरमैन ने भी कहा कि ऐसा करने के लिए सरकार की तरफ से कोई दबाव नहीं था.

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार प्राँजय गुहा ठाकुरता कहते हैं, "इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियां कहने भर को स्वायत्त हैं. ये बात इससे ज़ाहिर होती है जो चीज़ बीते कई महीनों से हर दिन बदल रही थी वो अब थम गई है. कोई मानेगा नहीं कि कोई दबाव है लेकिन सच लोगों को मालूम चल रहा है."

वहीं, पेट्रोलियम और एनर्जी मामलों के एक्सपर्ट और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े नरेंद्र तनेजा बताते हैं, "डायनामिक डेली प्राइसिंग का मतलब ही यही है कि हर दिन प्राइस में बदलाव होना चाहिए. लेकिन सुई अटक गई है जिससे ज़ाहिर होता है कि तेल कंपनियां इस मामले को ठीक ढंग से हैंडल नहीं कर पा रही हैं. इन परिस्थितियों में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है, लेकिन विपक्ष इसे मुद्दा बना लेता है."

नरेंद्र तनेजा के मुताबिक तेल कंपनियों के बड़े अधिकारी शायद राजनीतिक को समझते नहीं हैं. हालांकि वे एक संभावना और भी बताते हैं. वो कहते हैं, "मेरे आकलन के मुताबिक इस वक्त पेट्रोल की क़ीमत 30 पैसे सस्ती होना चाहिए और डीज़ल भी 25 पैसे सस्ता होना चाहिए. हो सकता है कि तब विपक्ष ये मुद्दा बनाता कि चुनाव में लोगों को प्रभावित करने के लिए दाम कम किए जा रहे हैं."

वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब पेट्रोलियम पदार्थ की क़ीमतों को चुनाव को देखते हुए लगाम लगाने की कोशिश हुई है. दिसंबर 2017 में गुजरात-हिमाचल विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा दबाव देखने को मिला था तब भी तेल की क़ीमतें स्थिर रखने की कोशिश हुई थी. हालांकि उस दौरान पेट्रोल की क़ीमतों में 45 पैसे का अंतर आया था, लेकिन डीज़ल की क़ीमतें स्थिर थीं.

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आशुतोष सिन्हा बताते हैं, "डायनामिक प्राइसिंग शुरू होने से पहले जनवरी- मार्च, 2017 के बीच जब उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और असम जैसे राज्यों में चुनाव थे, उस दौरान भी तेल की क़ीमतें स्थिर रखी गई थीं. तब 15 दिनों में प्राइस में बदलाव होते थे, लेकिन इस दौरान वो नहीं किया गया था. सरकार को लगता है कि क़ीमतें बढ़ने से लोगों में नाराजगी होगी जो चुनाव में फ़ायदे का सौदा तो नहीं ही होगा."

दरअसल, नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार को 2014 में सरकार आने के बाद से तेल की क़ीमतों को लेकर लगातार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है. इसकी वजह यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों के निम्नतम दर जनवरी, 2016 में 27 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, तब भी भारत में पेट्रोल, डीज़ल के दामों में कोई कमी नहीं देखने मिली थी.

इतना ही नहीं, मौजूदा केंद्र सरकार ने नवंबर, 2014 से लेकर जनवरी, 2016 के बीच पेट्रोलियम पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को नौ बार बढ़ाया ताकि ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया जा सके.

आशुतोष सिन्हा एक पुराना वाक़या याद करते हुए कहते हैं, "जुलाई, 2004 में यूपीए सरकार के वित्त मंत्री के तौर पी चिदंबरम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि पेट्रोलियम प्राइस के तीन हिस्से हैं- कंज्यूमर, तेल कंपनी और सरकार. तीनों को थोड़ा-थोड़ा बर्डन झेलना होगा. अब ऐसा लग रहा है कि तेल कंपनी और सरकार ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाना चाहती है और आम लोगों की परवाह किसी को नहीं है."

दरअसल, कमोडेटी बाज़ार का एक पेंच ये भी है कि किसी उत्पाद की मांग बढ़ने में उसकी क़ीमतों पर कोई अंकुश नहीं रह पाता है. हालांकि नरेंद्र तनेजा ये बताते हैं कि भारतीय तेल बाज़ार में जो पेट्रोल पंप पर तेल की क़ीमत होती है और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जो कच्चे तेल की क़ीमत होती है, उनमें एक तरह से तीन चार सप्ताह का अंतर होता है.

तनेजा कहते हैं, "कच्चा तेल ख़रीदने से लेकर उसे भारत तक लाने और रिफ़ाइनिंग करके पेट्रोल पंप तक पहुंचाने में अमूमन 25 दिन का वक्त तो लगता ही है, इसके चलते कच्चे तेल के बाज़ार की क़ीमत और भारत में पेट्रोल पंप की क़ीमत में अंतर तो हमेशा रहेगा."

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ये भी दिलचस्प है कि भारतीय पेट्रोलियम बाज़ार में क़ीमतों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों के मुताबिक बदलने की प्रक्रिया भी 2002 में तब शुरू हुई थी जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और राम नाइक पेट्रोलियम मंत्री हुआ करते थे.

लेकिन चुनाव के दौरान पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतों पर अंकुश लगाने का मॉडल पुराना है और दुनियाभर में इसके उदाहरण दिखते हैं. नरेंद्र तनेजा के मुताबिक कांग्रेसी सरकारों के जमाने में भी ये ख़ूब होता रहा है और तो और अमरीका तक में राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान पेट्रोल सस्ता हो जाता है.

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