ग्राउंड रिपोर्ट: सहारनपुर में 'तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी' तो नहीं!

  • 11 मई 2018
सहारनपुर में दलितों का प्रदर्शन
Image caption सहारनपुर में एक दलित युवक की संदिग्ध मौत के बाद तनाव पैदा हो गया है

सहारनपुर में भीम आर्मी के एक सदस्य की मौत के बाद बना तनाव अभी भी क़ायम है. हालांकि सचिन वालिया की अंत्येष्टि के बाद गांव में शांति ज़रूर है, लेकिन बड़ी संख्या में पुलिस और सुरक्षा बलों की मौजूदगी और सचिन वालिया की अंत्येष्टि में पहुंचे लोगों की संख्या और उनके ग़ुस्से से ऐसा लगता नहीं है कि ये शांति स्थाई है.

क़रीब चौबीस घंटे की गहमागहमी, सचिन वालिया के परिवारवालों के साथ प्रशासन की कई दौर की वार्ता और फिर चार प्रमुख अभियुक्तों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने के बाद सचिन वालिया के शव का पोस्टमॉर्टम हो पाया.

सचिन का शव गांव में आते ही वहां जैसे मातम टूट पड़ा. अंतिम संस्कार के लिए नीले झंडों, बौद्ध भिक्षुओं के मंत्र पाठ और 'सचिन वालिया के हत्यारों को फांसी दो' जैसे नारे लिखी तख़्तियों के साथ शांतिपूर्वक उमड़े लोग घटना के बाद उपजे आक्रोश की कहानी बयां कर रहे थे.

बुधवार को भीम आर्मी के ज़िलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई सचिन वालिया की संदिग्ध परिस्थितियों में गोली लगने से मौत हो गई थी. यह हादसा उनके आवास रामनगर के आसपास हुआ था, जहां से चंद कदमों की दूरी पर महाराणा प्रताप की जयंती का कार्यक्रम चल रहा था.

परिजनों का आरोप

सचिन के परिवार वालों का आरोप है कि महाराणा प्रताप जयंती के आयोजकों ने उनकी हत्या की है क्योंकि भीम आर्मी के लोग जयंती की अनुमति देने पर प्रशासन का विरोध कर रहे थे. उनका कहना था कि दलितों को आंबेडकर जयंती मनाने की अनुमति नहीं दी गई थी इसीलिए वो राणा प्रताप जयंती का विरोध कर रहे थे.

पुलिस ने जयंती के आयोजकों दीपक राणा, शेर सिंह राणा, उपदेश राणा और नागेंद्र राणा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है, लेकिन अभी तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं हो पाई है.

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सचिन की मौत गोली लगने से हुई बताई जा रही है, लेकिन गोली कैसे लगी, इस पर पहले भी संदेह था और अभी भी संदेह है.

सहारनपुर के पुलिस अधीक्षक (शहर) प्रबल प्रताप सिंह इस सवाल का बेहद संक्षिप्त जवाब देते हैं, "इस एंगल से भी जांच की जा रही है कि क्या तमंचा साफ़ करते वक़्त सचिन को गोली तो नहीं लगी?"

हालांकि एक दिन पहले तक पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी ये बात दावे के साथ कर रहे थे.

युवाओं में ग़ुस्सा

सचिन वालिया की अंत्येष्टि के बाद उनके परिजन वहां जुटे लोगों से वापस लौटने की अपील कर रहे थे क्योंकि लोगों ने रास्ता जाम कर रखा था, लेकिन वहां मौजूद युवाओं में इसे लेकर बेहद ग़ुस्सा था.

वैसे तो लोग माइक के सामने बोलने को तैयार नहीं हो रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका आक्रोश और ग़ुस्सा सामने आने लगा.

पास के गांव से आए एक युवक का कहना था, "हमारी बात सुनने को कोई तैयार नहीं है. हमारे घर का लड़का मारा भी गया है और हमें परेशान भी किया जा रहा है."

वहीं सचिन वालिया के भाई और भीम आर्मी के ज़िलाध्यक्ष कमल वालिया का कहना था कि ख़ुद एसएसपी ने उनसे कहा है कि महाराणा प्रताप भवन में राजपूतों को कार्यक्रम की अनुमति उन्होंने 'राजनीतिक दबाव' में दी.

कमल वालिया कहते हैं, "प्रशासन अपनी नाकामी छिपाने के लिए एक के बाद एक झूठ बोल रहा है. सचिन को गोली नकाबपोश लोगों ने मेरे घर से क़रीब डेढ़ सौ मीटर दूर मारी है और पुलिस कह रही है कि वो तमंचा साफ़ कर रहा रहा था. आख़िर बताइए, कोई गोली भरकर तमंचा साफ़ करेगा?"

उधर, महाराणा प्रताप जयंती से जुड़े आयोजक और राजपूत समुदाय के अन्य लोग कमल वालिया को आरोपों पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं. ज़्यादातर पदाधिकारियों के मोबाइल फ़ोन भी बंद हैं.

Image caption महाराणा प्रताप के जन्मवदिवस के मौके पर राजपूत समाज ने रैली निकाली थी

सहारनपुर के वरिष्ठ पत्रकार एम रियाज़ हाशमी कहते हैं, "एक पक्ष का आदमी मारा गया है, दूसरे पक्ष के लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई है लेकिन दोनों ही पक्ष शांत बैठने वाले नहीं हैं. गांव में सन्नाटा भले ही पसरा है लेकिन ये तूफ़ान के पहले वाली ख़ामोशी भी हो सकती है."

प्रशासनिक नाकामी

रियाज़ हाशमी और कुछ अन्य पत्रकार भी घटना के लिए 'प्रशासनिक नाकामी' को भी ज़िम्मेदार ठहराते हैं. रियाज़ हाशमी कहते हैं, "प्रशासन ने पहले तो राजनीतिक दबाव में एक पक्ष को सभा करने की अनुमति दे दी और दूसरे पक्ष को मांगने के बावजूद सुरक्षा तक नहीं दी. यहां तक कि सचिन की मौत के बाद उसकी एक मनगढंत कहानी भी बनाई जा रही है जिसमें पुलिस के बयानों में ही तमाम विरोधाभास हैं."

वहां मौजूद एक व्यक्ति सवाल उठाते हैं, "यदि सचिन की मौत देसी तमंचा साफ़ करते वक़्त हुई तो इससे बड़ी पुलिस और प्रशासन की नाकामी और क्या हो सकती है कि इतनी फ़ोर्स तैनात होने के बावजूद कोई व्यक्ति अपने घर के बाहर अवैध असलहे साफ़ कर रहा है और पुलिस को उसकी सूचना तक नहीं है."

पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर इस मामले में जानकारी साझा न करने के भी आरोप लग रहे हैं. इन मुद्दों पर उनका पक्ष जानने के लिए तमाम प्रयासों के बावजूद ज़िले के एसएसपी और ज़िलाधिकारी से बात नहीं हो सकी.

ज़िलाधिकारी ने सरकारी फ़ोन उठाने पर बेतुका सा जवाब दिया, "मैं सिर्फ़ वर्किंग ऑवर में इन सब मामलों पर बात करता हूं. अब सोमवार को ही कोई बात करूंगा." इतना कहकर फ़ोन उन्होंने ख़ुद काट दिया.

दरअसल, पिछले साल इसी मुद्दे पर और इन्हीं लोगों के बीच हुए जातीय संघर्ष में दो लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे. दर्जनों दुकानें जला दी गई थीं और सहारनपुर हफ़्तों तक अशांत बना रहा. हिंसा की आग आस-पास भी पहुंच गई थी. इस हिंसा के बाद पैदा हुई कड़वाहट अब भी खत्म नहीं हुई है. दलितों और ठाकुरों के बीच मुकदमेबाजी जारी है और दोनों ही समुदाय के लोग जेलों में बंद हैं.

लोग अफ़वाह न फ़ैलाएं और अफ़वाहों में न आएं इसके लिए प्रशासन ने बुधवार से ही इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी थीं जो अभी भी बंद हैं.

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