इस बीजेपी सरकार में गायों की मौत का ज़िम्मेदार कौन

  • 15 मई 2018
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झारखंड के पशुपालन मंत्री रणधीर कुमार सिंह के गृह ज़िले में पिछले एक महीने के दौरान 50 गायों की मौत हो गई है. डॉक्टरों ने पौष्टिक आहार न मिल पाने को मौत की प्रमुख वजह माना है.

इनकी मौत देवघर स्थित श्री बैद्यनाथधाम गौशाला में हुई है. यहां अभी भी कई गायें बीमार हैं. इनमें से कुछ की हालत बेहद नाज़ुक बनी हुई है. रांची से देवघर पहुंची पशु चिकित्सकों की एक टीम इनके इलाज में जुटी है, लेकिन गायों के लिए पर्याप्त दवा और पौष्टिक आहार का अभाव है.

गौशाला प्रबंधन ने इस बारे में प्रशासनिक अधिकारियों को एक पत्र भी भेजा है.

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Image caption देवघर के एसडीओ राम निवास यादव और उनको लिखा गया पत्र.

क्षमता से ज़्यादा गायें

श्री बैद्यनाथ गौशाला के सचिव रमेश बाजला ने बीबीसी से कहा, ''हमारे यहां 400 गायों को रखने की क्षमता है, जबकि 500 गायें यहां पहले से ही थीं. इसके बावजूद पुलिस ने पिछले तीन महीने के दौरान पशु क्रूरता अधिनियम के तहत जब्त 400 और (गौ वंश) गायों को गौशाला को सौंप दिया.''

वे इसमें आगे जोड़ते हैं, ''इन्हें कंटेनर में बोरे की तरह ठूंस कर लाया गया था. इन्हें उतारने के क्रम में ही कुछ गायों की मौत हो गई. जबकि कुछ गायें मरी हुई अवस्था में ही लाई गईं. कई गायें बीमार और घायल थीं. भूख-प्यास से कई गायों की हालत ख़राब थी. वो मरणासन्न थीं. इस कारण पिछले एक महीने में 50 गायों की मौत हो गई. हालांकि, इनमें से कुछ की स्वाभाविक मृत्यु भी है. इसलिए हमने गौशाला के पदेन अध्यक्ष और देवघर के एसडीओ को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई है.''

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Image caption देवघर गौशाला में गायों की पूजा करते लोग

अनुदान नहीं मिला

देवघर के एसडीओ रामनिवास यादव ने इस मामले पर कहा, ''गौशाला समिति को लंबे समय से कोई फ़ंड नहीं मिला है. इस कारण 40 एकड़ में फैली गौशाला में नए शेड का निर्माण नहीं हो सका है. साथ ही राशि के अभाव में चारे की ख़रीद भी नहीं हो सकी है.''

''ऊपर से पुलिस की पकड़ी गायें भी गौशाला में भेज दी गईं. गोड्डा से पुलिस की लाई हुई पांच गायें उतारते समय ही मर गईं और 20 बीमार हालत में पहुंची थीं. इनका प्राथमिक उपचार हुआ, लेकिन पैसे के अभाव में गौशाला समिति के लोग समुचित इलाज नहीं करा सके. इस कारण कुछ गायों की मौत की सूचना मिली है.''

झारखंड के कृषि सह-पशुपालन मंत्री रणधीर कुमार सिंह देवघर ज़िले की ही एक विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसके बावजूद गौशाला प्रबंधन के दावे के बावजूद अनुदान की राशि नहीं मिली.

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Image caption झारखंड के कृषि सह-पशुपालन मंत्री रणधीर कुमार सिंह

इतनी बड़ी संख्या में गायों की मौत के बारे में जब बीबीसी ने उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा कि चूंकि बैद्यनाथ गौशाला प्राइवेट है, इसलिए उनका इस मसले पर बोलना उचित नहीं.

Image caption झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास

सरकार ने गायों की रक्षा के मद्देनज़र साल 2006 में 'झारखंड गौसेवा आयोग' का गठन किया था. इसके ज़रिए सरकार राज्य भर की निबंधित गौशालाओं को लाखों का अनुदान देती है.

देवघर की श्री बैद्यनाथ गौशाला भी इससे निबंधित है और इसे सरकारी अनुदान भी मिलता रहा है. गौशाला के सचिव का कहना है कि पिछले दो साल से अनुदान मिलने में कठिनाई होने लगी है.

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जबकि इसी दौरान मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कई दफा गायों की रक्षा करने का सार्वजनिक संकल्प किया है.

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एक अखबार को दिए चर्चित इंटरव्यू में मुख्यमंत्री रघुबर दास ने कहा था, ''जो लोग भारत को अपना देश मानते हैं, उन्हें गाय को मां के रूप में मानना चाहिए. आप किसी भी जाति-धर्म के हों, लेकिन हमें गायों की रक्षा करनी चाहिए. हमारी सरकार गायों की रक्षा के लिए हरसंभव कदम उठा रही है.''

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मौत का ज़िम्मेदार कौन?

श्री बैद्यनाथ गौशाला के सचिव रमेश बाजला कहते हैं, ''गायों को सरकार नहीं बचा पा रही है. झारखंड में अगर गायें बच रही हैं तो उसकी वजह गौशालाएं हैं. इसके बावजूद सरकार अपनी ग़लती हमारे मत्थे मढ़ने में लगी है, जबकि हमलोग बाज़ार से उधार लेकर गौमाता की सेवा कर रहे हैं.''

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Image caption गाय का इलाज करते चिकित्सक

वे आगे कहते हैं, ''सरकार के डॉक्टर हमें दवाइयां लिखकर दे देते हैं, लेकिन वो अस्पतालों में उपलब्ध नहीं हैं. हमें बाज़ार से दवा ख़रीदनी पड़ती है. आप समझ सकते हैं कि राज्य में गायों की मौत का असली ज़िम्मेदार कौन है.''

देवघर स्थित गौशाला में गायों की चिकित्सा में लगे डॉ. पंकज कुमार ने बताया कि 'गायों की मौत की वजह तेज़ धूप, प्यास और पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक चारे का नहीं मिलना है. कड़ी धूप में बगैर शेड के रखी गई गायें तेज़ी से बीमार पड़ रही हैं और अंततः उनकी मौत हो जा रही है. ऐसे में शेड निर्माण और पौष्टिक चारे की उपलब्धता से गायों की जान बचाई जा सकती है.

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