पश्चिम बंगाल: ग्रामीण इलाकों से ही निकलती है सत्ता की राह

  • 15 मई 2018
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देश के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों को भी इतनी अहमियत और सुर्खियां नहीं मिलतीं जितनी इस बार पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत चुनावों को मिली हैं.

नामांकन प्रक्रिया की शुरुआत से ही इसने हिंसा और अदालती विवाद का एक नया रिकार्ड बनाया है. लेकिन यह सब बेवजह नहीं हैं. दरअसल, बंगाल के ग्रामीण इलाकों से ही सत्ता की राह निकलती है.

तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन तो कहते हैं, ''अगले साल दिल्ली तक जाने वाला रास्ता भी राज्य के ग्रामीण इलाकों से ही शुरू होगा.''

राज्य में अबकी पंचायत चुनाव सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस के अलावा तेजी से नंबर दो की ओर बढ़ती भाजपा के लिए ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ को मापने का पैमाना बन गया है.

'करो या मरो'

इसके साथ ही अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस और माकपा के लिए भी यह 'करो या मरो' की लड़ाई है. यही वजह है कि जहां तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में त्रिस्तरीय पंचायतों पर कब्जे के लिए पूरा तंत्र झोंक दिया है वहीं विपक्षी राजनीतिक दलों ने भी अबकी आर या पार की तर्ज पर इसमें पूरी ताकत झोंक दी है.

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अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले आखिरी प्रमुख चुनाव होने की वजह से अबकी इन चुनावों की अहमियत काफी बढ़ गई है. लेकिन यही अकेली वजह नहीं है. यह चुनाव तो हर बार लोकसभा चुनावों के साल भर पहले ही होते रहे हैं.

इस बार बंगाल की सत्ता पर काबिज होने का सपना देखती भाजपा के उभार, बीते लोकसभा चुनावों के बाद उसे मिलने वाले वोटों में बढ़ोतरी और कांग्रेस और माकपा जैसे राज्य के पारंपरिक दलों के हाशिए पर सिमटने जैसे तथ्यों ने इन चुनावों को काफी अहम बना दिया है.

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बंगाल में ग्रामीण इलाके शुरू से ही सत्ता की चाबी रहे हैं. वाममोर्चा ने भूमि सुधारों और पंचायत व्यवस्था की सहायता से सत्ता के विकेंद्रीकरण के जरिए ग्रामीण इलाकों में अपनी जो पकड़ बनाई थी उसी ने उसे यहां कोई 34 साल तक सत्ता में बनाए रखा था.

वर्ष 2008 के पंचायत चुनावों में ग्रामीण इलाकों में पैरों तले की जमीन खिसकते ही वर्ष 2011 में यहां वाममोर्चा का लालकिला भरभरा कर ढह गया था. तृणमूल कांग्रेस ने उन चुनावों में तमाम राजनीतिक पंडतो के आकलन को गलत साबित करते हुए बेहतरीन प्रदर्शन किया था.

उन चुनावो में वर्ष 2003 के मुकाबले पार्टी के वोटों का प्रतिशत औसतन 18 फीसदी से बढ़ कर 57 फीसदी तक पहुंच गया था. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों में नतीजा सामने था. इसी तरह 2013 में भी पार्टी ने अपने प्रदर्शन को और बेहतर किया. नतीजा 2016 के चुनावों में विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की तादाद दो सौ का आंकड़ा पार कर गई.

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मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी भी ग्रामीण वोटरों की इस नब्ज़ को अच्छी तरह पहचान चुकी हैं.

यही वजह है कि वह शुरू से ही ग्रामीण इलाकों पर ख़ास ध्यान देती रही हैं और तमाम सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार करती रही है. ग्रामीण इलाकों को ध्यान में रखते हुए ही ममता ने तमाम ऐसी योजनाएं शुरू कीं जो वोटरों पर तृणमूल की पकड़ मजबूत बना सके.

इनमें कन्याश्री योजना के तहत युवतियों को सालाना 25 हजार रुपए देना, सबूज साथी योजना के तहत 40 लाख छात्र-छात्राओं को मुफ़्त साइकिलें देना, खाद्यसाथी के तहत दो रुपए किलो चावल और गेहूं मुहैया कराना और बेरोजगारों को वित्तीय सहायता देने के लिए शुरू युवाश्री योजना शामिल है.

इसके साथ ही अपने अभियान के दौरान ममता बेहद सुनियोजित तरीके से इन योजनाओं का प्रचार भी करती रही हैं. अपनी रैलियों में वह वित्तीय तंगी के बावजूद सरकार की ओर से किए गए विकास कार्यो को गिनाती रही हैं.

राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से कम से कम 38 ग्रामीण या कस्बाई इलाकों में हैं. उन पर ग्रामीण वोटर ही निर्णायक हैं.

हजारों अल्पसंख्यक चुनाव मैदान में

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ऐसे में जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर जिन इलाकों में जिस पार्टी की पकड़ मजबूत होगी, उसे वहां फायदा मिलने की संभावना भी बढ़ जाएगी. 2013 के पंचायत चुनावों में बेहतर प्रदर्शन की बदौलत ही तृणमूल कांग्रेस ने 2014 में 42 में से 34 लोकसभा सीटें जीत ली थीं.

भाजपा ने राज्य में बीते लोकसभा चुनावों में दो सीटें जीती थीं. लेकिन उसके बाद होने वाले हर चुनाव में उसका प्रदर्शन लगातार निखरता रहा है. वह तेजी से कांग्रेस और माकपा को पीछे धकेल कर मुख्य विपक्षी पार्टी बनने की ओर बढ़ रही है.

हालांकि तृणमूल कांग्रेस और उसके बीच फासला बहुत ज्यादा है. बावजूद इसके हर चुनावों में उसे मिलने वाले वोटों में बढ़ोतरी होती रही है. पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, ''हमारा तात्कालिक लक्ष्य भले अगले साल का लोकसभा चुनाव हो, असली लक्ष्य तो 2021 के विधानसभा चुनाव जीत कर बंगाल की सत्ता पर काबिज होना है.''

सिन्हा पंचायत चुनावों को क्वार्टर फाइनल, अगले साल होने वाले आम चुनावों को सेमाफाइनल और विधानसभा चुनावों को फाइनल मानते हैं. फाइनल को लक्ष्य मानते हुए पार्टी ने क्वार्टर फाइनल मुकाबले में बेहतर प्रदर्शन के लिए अपनी पूरा ताकत झोंक दी है.

इसके लिए उसने अबकी पहली बार रिकार्ड तादाद में अल्पसंख्यकों को भी टिकट दिए हैं. भाजपा की ओर से लगभग एक हजार अल्पसंख्यक चुनाव मैदान में हैं.

मुस्लिम और भाजपा

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प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, ''हम तो दो हजार से ज्यादा लोगों को टिकट देना चाहते थे. लेकिन तृणमूल कांग्रेस के आतंक की वजह से कई लोग नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं कर सके.''

उनका दावा है कि राज्य का मुसलमान अब भाजपा को दुश्मन या अछूत नहीं मानता.

राहुल सिन्हा कहते हैं, ''राज्य के लोग तृणमूल कांग्रेस का विकल्प तलाश रहे हैं. यह विकल्प उनको भाजपा ही मुहैया करा सकती है.''

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि राज्य के लोगों का ममता बनर्जी सरकार के प्रति भरोसा अटूट है.

पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, ''विपक्षी के पास न तो कोई ठोस मुद्दा है और न ही ग्रामीण इलाकों में कोई जनाधार.''

राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, ''अगले साल लोकसभा चुनावों से पहले आखिरी चुनाव होने की वजह से तमाम दलों के लिए यह पंचायत चुनाव ग्रामीण इलाकों में उनको अपनी ताकत आंकने का पैमाना साबित होंगे.''

वे आगे कहते हैं, ''इन नतीजों से बंगाल की राजनीतिक की भावी दशा-दिशा तय करने में भी सहायता मिलेगी. ऐसे में इस पर होने वाली जोर-आजमाइश पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.''

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