नज़रिया: कर्नाटक में मोदी-शाह ने कांग्रेस का 'पीपीपी' कर दिखाया

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जीत का कोई विकल्प नहीं होता, लोकतंत्र में 'विनर टेक्स ऑल' होता है. ऐसा मान लिया जाता है कि जीतने वाले ने जो किया वही सही है, हारने वाले ने सब कुछ ग़लत किया.

आंकड़े, विपक्ष और विश्लेषण फ़िलहाल नहीं सुने जा रहे, मोदी का करिश्मा हर तथ्य, तर्क और रणनीति पर भारी पड़ता दिख रहा है. मानो कर्नाटक की जनता ने मान लिया है कि नेहरू ने सचमुच जनरल थिमैया और फ़ील्ड मार्शल करियप्पा का अपमान किया था.

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गुजरात बचाकर और कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी बनकर बीजेपी ने एक बार फिर दिखा दिया है कि चुनाव कैसे लड़े जाते हैं.

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कुछ महीने पहले राहुल गांधी को लोगों ने शाबाशी दी कि उन्होंने गुजरात में बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी, उन्होंने कर्नाटक में भी जान लगा दी थी, इसका मतलब फ़िलहाल तो यही है कि मोदी-शाह के आगे राहुल का बेहतरीन प्रदर्शन भी पर्याप्त नहीं है.

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कर्नाटक में बीजेपी पहले भी जीत चुकी है, कर्नाटक की जनता ने अपना रिकॉर्ड कायम रखा है, 1988 के बाद से उन्होंने राज्य में सत्ता में किसी को दोबारा नहीं आने दिया है. सिद्धरमैया के ख़िलाफ़ कितना रोष है या मोदी को कितना जनसमर्थन, इसे समझने के लिए बारीक़ विश्लेषण की ज़रूरत होगी.

2014 के बाद से जितने विधानसभा चुनाव हुए हैं उनमें से अधिकतर में सत्ताधारी पार्टी हारी है, गुजरात और बिहार को छोड़कर, कांग्रेस ने एक-एक करके राज्यों को खोया है और कर्नाटक छीनने के बाद बीजेपी उसी हालत में पहुँच गई है जहाँ कांग्रेस अपने स्वर्णकाल में थी.

ये बात साफ़ है कि मोदी की लोकप्रियता बरक़रार है, उन्हीं के नाम पर ही चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं. भाजपा का प्रचार तंत्र और चुनाव तंत्र निश्चित तौर पर कांग्रेस से कई गुना बेहतर काम कर रहा है, लोग अब भी भाजपा के संदेश पर विश्वास कर रहे हैं कि देश में सब कुछ प्रगति के पथ पर चल रहा है.

उन सभी विश्लेषकों को सोचना होगा जो कहने लगे थे कि मोदी की लोकप्रियता घट रही है, दक्षिण भारत, उत्तर भारत से अलग है, या फिर राहुल गांधी अब निखर गए हैं, ये ऐसी धारणाएँ हैं जिन्हें कर्नाटक ने संशय में डाल दिया है.

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मोदी ने कहा था कि कर्नाटक के चुनाव के बाद कांग्रेस 'पी-पी-पी' रह जाएगी यानी सिर्फ़ पंजाब, पुडुचेरी और परिवार. मोदी ने कर्नाटक में 20 से अधिक रैलियाँ कीं, कर्नाटक में भी मोदी ने नेहरू कार्ड खेला, किसी तरह की कोई कसर बाक़ी नहीं रखी.

इस चुनाव से एक बात स्पष्ट है कि मोदी-शाह किसी भी त्रिकोणीय मुकाबले में फ़ायदे में रहेंगे, जिनको भी बीजेपी से लड़ना है उन्हें एकजुट होना होगा. कर्नाटक में जेडी (एस) और कांग्रेस के बीच किसी तरह के एलायंस पर विचार न किया जाना, राजनीतिक कच्चेपन की निशानी है.

कांग्रेस के अति-आत्मविश्वास और जेडी (एस) के किंगमेकर बनने के सपने ने बीजेपी का काम आसान कर दिया है. जब तक छोटे राजनीतिक दल छोटे-छोटे स्वार्थों की वजह से बँटे रहेंगे बीजेपी का रास्ता साफ़ रहेगा, और इस वक़्त बीजेपी के आगे सभी राजनीतिक दल छोटे ही हैं.

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यह बीजेपी के लिए जितनी बड़ी जीत है, उससे बड़ी हार कांग्रेस के लिए है, और ख़ास तौर पर राहुल गांधी के लिए. 2019 के चुनाव में विपक्ष का नेतृत्व करने की पात्रता राहुल गांधी हासिल कर सकेंगे इसमें संदेह और बढ़ गया है. शरद पवार और ममता बनर्जी इस राहुल का नेतृत्व कैसे स्वीकार कर सकते हैं?

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इसी तरह कर्नाटक में जीतकर मोदी-शाह ने कांग्रेस के इस आत्मविश्वास को डिगा दिया है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ वो बीजेपी से आसानी से छीन सकते हैं.

राजनीति के बारे में एक ही बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि पक्का कुछ नहीं है, यह क्रिकेट की तरह अनिश्चित संभावनाओं का खेल है. 2019 बहुत दूर नहीं लेकिन काफ़ी दूर है, कर्नाटक की हार में विपक्ष के लिए कई सबक़ छिपे हैं, ये नहीं मालूम कि वे सबक़ सीखेंगे या नहीं.

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