कर्नाटक की 'सत्ता के खेल' में राज्यपाल क्या कर सकते हैं

  • 16 मई 2018
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कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अब ये सवाल बेहद अहम बन गया है कि राज्य में सरकार किसकी बनेगी.

चुनाव में 104 सीटों पर जीत हासिल कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर ज़रूर उभरी है. लेकिन भाजपा को बहुमत नहीं हासिल हो पाया है यानी वो सरकार बनाने से अभी भी दूर है.

दूसरे नंबर पर 78 सीटों के साथ कांग्रेस है और तीसरे नंबर पर जेडीएस है जिसे 38 सीटों पर जीत मिली है.

नतीजे आने के बाद कांग्रेस ने कहा कि वो जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देगी और जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें.

इसके बाद जेडीएस ने कांग्रेस के समर्थन में सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. वहीं सबसे बड़े दल के नाते भाजपा ने भी सरकार बनाने का दावा राज्यपाल के सामने पेश कर दिया है.

ऐसे में राज्यपाल वजुभाई वाला की प्राथामिकता होगी ये देखना कि राज्य में स्थिर सरकार कैसे बने. उनके पास कई विकल्प मौजूद हैं- सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए न्योता देना, गठबंधन के आधार पर बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बहुमत सिद्ध करने के लिए कहना और यदि ऐसा लगे कि किसी भी आधार पर स्थिर सरकार नहीं बन पाएगी तो राष्ट्रपति शासन लागू करना.

लेकिन अब ये राज्यपाल पर निर्भर करता है कि वो राज्य को एक स्थिर सरकार देने के लिए किसे पहले बहुमत साबित करने का न्योता देते हैं.

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राज्यपाल के सामने अब क्या विकल्प हैं?

संविधान मामलों के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं, "संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सवाल पर फ़ैसला पूर्णतया राज्यपाल के अधिकारक्षेत्र में आता है."

वो कहते हैं, "राज्यपाल किसी को भी मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. लेकिन ऐसा करते समय वो इस बात का ध्यान रखेंगे कि वो अपने विवेक का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के पक्ष में करें जिसे उनके विचार में सदन का बहुमत हासिल होने की आशा हो. ऐसा इसलिए क्योंकि जो सरकार बनेगी वो विधानसभा के प्रति ज़िम्मेदार होगी और वहां बहुमत होना ज़रूरी होगा."

"जहां तक पिछले उदाहरण को देखें तो आपको कई तरह के वाकये दिखेंगे. कहीं राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया है तो कहीं चुनाव के बाद हुए गठबंधन के नेता को भी बुलाया है और कभी चुनाव से पहले हुए गठबंधन के नेता को बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा है."

"ये उदाहरण भी इसी बात को साबित करते हैं कि ये पूरी तरह से राज्यपाल का फ़ैसला होता है."

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सुभाष कश्यप कहते हैं कि फ़िलहाल यहां सबसे बड़ा सवाल बहुमत का है, लेकिन इसका निर्णय केवल विधानसभा के भीतर ही हो सकता है.

इसके लिए सबसे पहले विधानसभा की गठन किया जाना ज़रूरी होगा.

वो कहते हैं, "राजभवन में विधायकों की परेड करवा कर, सरकार बनाने का दावा पेश कर, लिस्टें बना कर बहुमत सिद्ध नहीं किया जा सकता."

"सुप्रीम कोर्ट ने बोम्मई मामले में दिए फ़ैसले में और वेंकटचेलैया कमीशन रिपोर्ट और सरकारिया कमीशन रिपोर्ट में इस बात को कहा है कि बहुमत सिद्ध करने का काम सदन में ही होना चाहिए."

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राज्यपाल दोबारा करवा सकते हैं चुनाव?

सुभाष कश्यप कहते हैं ऐसा हो सकता है, लेकिन "वो तभी होता है जब कोई भी पक्ष बहुमत साबित ना कर सके. मुझे नहीं लगता कि ऐसी स्थिति आने की आशंका है कि कोई भी सरकार बन ना सके.''

"वो पहले एक पक्ष को सरकार बनाने का न्योता देंगे. अगर वो सरकार बनाने में नाकाम रही तो दूसरे पक्ष को न्योता दिया जाएगा. फिर भी सरकार ना बन पाई तो राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की सिफ़ारिश की जा सकती है. इसके बाद ही दोबारा चुनाव की स्थिति बन सकती है."

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सुभाष कश्यप कहते हैं कि केंद्र सरकार की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति ही राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं और माना जाता है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के नज़दीक होते हैं.

वो कहते हैं "ऐसे में ये संभावना जताई जाती है कि वो (राज्य की सत्ताधारी) विपक्षी पार्टी के ख़िलाफ़ फ़ैसला ले सकते हैं, लेकिन ऐसा होता नहीं है."

"ये संवैधानिक पद है और ऐसा होना मुश्किल ही है क्योंकि यहां प्राथमिकता इस बात की होती है स्थिर सरकार बने."

कौन हैं कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला?

जिस समय देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे वजुभाई गुजरात के वित्तमंत्री थे. बतौर मुख्यमंत्री मोदी के 13 साल के कार्यकाल में वजुभाई 9 साल तक इस महत्वपूर्ण पद पर रहे. साल 2005-2006 के बीच वजुभाई राज्य में बीजेपी प्रमुख भी रहे.

वजुभाई के नाम एक रिकॉर्ड ये भी है कि वो एक अकेले ऐसे वित्तमंत्री रहे जिन्होंने 18 बार राज्य का बजट पेश किया.

उनकी गिनती उन कुछ नेताओं में भी की जाती है जो गुजरात में सत्ता हस्तांतरण (केशुभाई पटेल से नरेंद्र मोदी) होने के बाद भी वजूद में बने रहे. इसकी एक बड़ी वजह ये भी रही कि वजुभाई उस वक्त वित्तमंत्री थे, जिन्होंने 2001 में मोदी के पहले विधानसभा चुनाव के लिए अपनी राजकोट की सीट छोड़ दी थी.

वजुभाई राजकोट के एक व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखते हैं. स्कूल के समय में ही वो आरएसएस से जुड़ गए थे. 26 साल की उम्र में वो जनसंघ से जुड़े और उसके बाद बहुत जल्द ही वे केशुबाई के क़रीबी हो गए. वे राजकोट के मेयर भी रहे.

1985 में पहली बार उन्होंने विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन दाख़िल किया. इस सीट से वो सात बार जीते.

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समय-समय पर वजुभाई पर आरोप भी लगते रहे. उन पर आरोप लगे कि राजकोट में बड़े बिल्डरों से संपर्क के चलते उनकी भी रियल-स्टेट संपत्ति बढ़ रही है, लेकिन इन आरोपों का उनके व्यक्तित्व पर कोई असर नहीं पड़ा.

वजुभाई वाला को उनके विधानसभा क्षेत्र में मज़ेदार और जादुई भाषणों केलिए जाना जाता है. उन्हें लोगों की भीड़ जुटाने में माहिर समझा जाता है. उनकी छवि एक बेहद सामाजिक व्यक्ति के तौर पर है जो दोस्तों-रिश्तेदारों और दूसरे सामाजिक समारोहों में शिरकत करना पसंद करते हैं.

इन सबसे इतर वजुभाई अपने कुछ बयानों के चलते विवादों में भी रहे.

मैसूर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने लड़कियों को फ़ैशन से दूर रहने की सलाह दी थी और कहा था कि कॉलेज फैशन करके आने की जगह नहीं है. उनके इस बयान पर काफी हंगामा बरपा था.

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