कुमारस्वामी और सिद्धारमैया जैसे विरोधियों का मेल मोदी विरोध या 2019 पर सियासी नज़र

  • 16 मई 2018
राजभवन में राज्यपाल के समक्ष अपनी सरकार बनाने का दावा पेश करने पहुंचे सिद्धारमैय(बाएं) और एच डी कुमारास्वामी इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption राजभवन में राज्यपाल के समक्ष अपनी सरकार बनाने का दावा पेश करने पहुंचे सिद्धारमैय(बाएं) और एच डी कुमारास्वामी

कर्नाटक की राजनीति के इतिहास में यह अभी तक का सबसे विचित्र दौर है.

जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी के बगल में राज्य की सत्ता गंवाने वाले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया खड़े हैं और दोनों ही एक-दूसरे की बातों पर सहमतियां जताते हुए देखे जा सकते हैं.

राजभवन में राज्यपाल वजुभाई वाला के समक्ष कुमारस्वामी और सिद्धारमैया अपनी अगली सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे हैं.

यह दृश्य उन लोगों के लिए विचित्र है जो कर्नाटक की राजनीतिक गतिविधियों को पिछले 12 साल से देख रहे हैं.

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Image caption राज्यपाल वजुभाई वाला

देवेगौड़ा से अलग हुए थे सिद्धारमैया

कर्नाटक की राजनीति के हालिया इतिहास पर अगर नज़र दौड़ाएं तो हम पाएंगे कि सिद्धारमैया ने पूर्व प्रधानमंत्री और अपने गुरु एच डी देवगौड़ा का साथ इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि कई सालों तक देवगौड़ा के साथ निष्ठापूर्ण तरीके से काम करने के बाद, पार्टी में सत्ता की चाबी देवगौड़ा ने अपने बेटे कुमारस्वामी के हाथों में सौंप दी थी.

पार्टी के भीतर खुद के अस्वीकृत होने के बाद सिद्धारमैया ने अहिंदा (अल्पसंख्यक, ओबीसी और दलित) बनाया और कांग्रेस की मदद से उन्होंने एक बड़ी छलांग लगाई.

देवगौड़ा के साथ शुरू हुई इसी दुश्मनी के चलते सिद्धारमैया ने वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले अधिकारियों के साथ भी भेदभाव किया, दरअसल देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं.

इसके जवाब में कुमारस्वामी ने चतुराई दिखाते हुए सिद्धारमैया के देवगौड़ा पर किए जा रहे राजनीतिक हमले को पूरे वोक्कालिगा समुदाय पर हो रहे हमले के रूप मे दिखाना शुरू कर दिया.

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Image caption एच डी देवेगौड़ा

अपना-अपना वोटबैंक

इसके साथ ही वोक्कालिगा वोट की गोलबंदी होने लगी और इसका नतीजा यह हुआ कि चामुंडेश्वरी विधानसभा से सिद्धारमैया को हार का सामना करना पड़ा.

सिद्धारमैया और कुमारस्वामी के बीच यह वैचारिक मतभेद ही था कि साल 2013 के विधानसभा चुनाव में जब पार्टी हाई कमान ने सिद्धारमैया से वोक्कालिगा वोटबैंक पर पकड़ मजबूत बनाने की बात कही तो वे इसमें आना-कानी करने लगे.

इसके बदले उन्होंने लिंगायत वोटबैंक की तरफ़ अपना ध्यान लगाया जहां अखिल भारतीय वीरशैव महासभा में लिंगायत को अलग अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग उठ रही थी.

लेकिन सिद्धारमैया और उनके साथी लिंगायत समुदाय के अंतर्गत आने वाले लोगों को अल्पसंख्यक दर्जे के फ़ायदे समझा पाने में नाकामयाब रहे.

राजनीतिक विशेषज्ञ मदन मोहन की माने तों कांग्रेस का तटस्थ रहना उसके लिए सबसे उल्टा साबित हुआ है.

एक और विशेषज्ञ महादेव प्रकाश कहते हैं, ''सिद्धारमैया ने हमेशा अपनी सरकार को 'अहिंदा सरकार' होने का दावा किया. इसके साथ ही वो लगातार लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय की तरफ़ भी अपना झुकाव दिखाते रहते थे. इन दोनों समुदायों के वोटर सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ एकजुट हुए, जबकि अहिंदा वोटर उनके ख़िलाफ़ पूरी तरह एकजुट तो नहीं हुए, लेकिन ऐसा लगता है कि इनमें से भी सिर्फ़ कुरुबा (जिस जाति से सिद्धारमैया आते हैं) और मुस्लिमों ने ही उन्हें वोट किया.''

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मोदी का असर

लेकिन धारवाड़ यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर हरीश रामास्वामी के विचार थोड़ा अलग हैं. वे कहते हैं, ''मोदी की रैली ने कई जगहों पर वोट को बीजेपी की तरफ़ मोड़ दिया. वहीं कांग्रेस ने भी तीन बड़ी ग़लतियां कीं. सिद्धारमैया को अपनी लड़ाई सिर्फ़ बीएस येदियुरप्पा तक ही सीमित रखनी चाहिए थी. राहुल गांधी के मैदान में उतरने से यह लड़ाई राहुल बनाम मोदी बन गई.''

इसके साथ ही प्रोफ़ेसर रामास्वामी यह भी कहते हैं कि मोदी का असर अभी भी है, ख़ासकर युवा वोटर और वे लोग जो अंतिम समय तक अपने वोट को लेकर अनिश्चित रहते हैं वे मोदी की तरफ़ आकर्षित हो जाते हैं. वे कहते हैं, ''जब तक मोदी मैदान में नहीं उतरे थे तब तक युवाओं का वोट काफ़ी हद तक सिद्धारमैया के साथ दिख रहा था.''

वहीं मदन मोहन कहते हैं, ''यह भी एक प्रमुख बात है कि जिस तरह मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने देवगौड़ा और साथ ही साथ मोदी को नज़रअंदाज़ किया, यह जनता को पसंद नहीं आया. कांग्रेस की हार में इसका भी एक बड़ा योगदान रहा.''

अपना नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर एक बीजेपी नेता ने कहा कि इस बात में कोई शक़ नहीं है कि अगर मोदी प्रचार के लिए नहीं आते तो उनकी पार्टी कर्नाटक में 100 का आंकड़ा भी मुश्किल में छू पाती.

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बीजेपी की चूक

वहीं बीजेपी के बहुमत के जादुई आंकड़े तक ना पहुंच पाने के पीछे राजनीतिक चिंतक पार्टी के भीतर चुनाव लड़ने के लिए हुए मतभेदों के ना सुलझ पाने को एक बड़े कारण के रूप में देखते हैं.

प्रोफ़ेसर रामास्वामी कहते हैं, ''यह पूरा वोट मोदी के लिए सकारात्मक संदेश तो है, लेकिन हमें इसे पूरी तरह सिद्धारमैया सरकार के ख़िलाफ़ हुए वोट के तौर पर नहीं देखना चाहिए.''

कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों और वहां मौजूद राजनीतिक चिंतकों के बीच इस बात पर भी आम सहमति है कि सिद्धारमैया के जनकल्याणकारी योजनाओं को लोगों ने पसंद तो किया, लेकिन वे उन्हें वोट में तब्दील नहीं करवा पाए.

अंत में कांग्रेस के एक नेता के शब्दों में कहें तो 'जाति ने उन्हें हरा दिया.'

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