क्या रमज़ान सीज़फायर से कश्मीर में शांति आएगी?

  • 16 मई 2018
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कश्मीर दौरे के दो दिन पहले गृह मंत्रालय ने कश्मीर में 'सीज़फायर' का एलान किया है. ये सीज़फायर मुसलमानों के पाक महीने रमज़ान को देखते हुए लगाया गया है.

लगातार कई ट्वीट करके गृह मंत्रालय ने बताया कि ये फैसला इसलिए लिया गया है ताकि रमज़ान के दौरान मुस्लिमों को शांति भरा माहौल मुहैया कराया जा सके.

इस एलान के कुछ दिन पहले ही कश्मीर ने भारी हिंसा और हत्याओं का दौर देखा है, जिसे लेकर राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सर्व दलीय बैठक बुलाई थी.

इस बैठक के बाद मुफ्ती समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने केंद्र सरकार से 'ऑपरेशन ऑल ऑउट' रोकने की अपील की थी. ये ऑपरेशन सुरक्षाबल कई महीनों से कश्मीर में चला रहे थे.

ऑपरेशन ऑल ऑउट के तहत कम से कम 200 चरमपंथी मारे गए थे.

हांलाकि इस घोषणा में ये साफ़ कर दिया गया है कि हमला होने पर या लोगों की जान बचाने के लिए जवाबी कार्रवाई का अधिकार सेना अपने पास सुरक्षित रखेगी.

अलगाववादी सीज़फायर की मांग का विरोध कर चुके हैं. लेकिन राजनीति से जुड़े कई लोग इसे शांति स्थापित करने के मौके तौर पर देखते हैं.

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एकतरफा सीज़फायर

पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा, "सभी राजनीतिक पार्टियों (बीजेपी को छोड़, जो इसका विरोध करती रही है) की मांग पर केंद्र ने एकतरफा सीज़फायर का एलान किया है. अगर चरमपंथी अब नरम रुख नहीं अपनाते तो यहां के लोगों के असल दुश्मन साबित होंगे."

उन्होंने सीज़फायर के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ट्विटर पर लिखा, "केंद्र ने इसका नाम नॉन-इनिशिएटिव ऑफ कॉम्बेट ऑपरेशन्स दिया है. उन्हें वाजपेयी के ज़माने में भी इसे यही नाम दिया था. लेकिन ये अभी भी एकतरफा सीज़फायर ही है. एक गुलाब जिसे नाम कुछ और दे दिया गया है...."

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने फैसले के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह का शुक्रिया अदा किया. उन्होंने ऑल पार्टी मीटिंग में विपक्षी दलों की भागीदारी की भी सराहना की और इस घोषणा को अमली जामा पहनाने पर सहमति के लिए उनका शुक्रिया कहा.

महबूबा समेत दूसरे नेताओं ने वाजपेयी के समय को याद करते हुए प्रधानमंत्री मोदी से उनके सिद्धांत "डॉक्टरिन ऑफ पीस" का अनुसरण करने को कहा.

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पहले हुए सीज़फायरों का हाल

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान केंद्र सरकार ने रमज़ान के महीने में चरमपंथियों के खिलाफ सीज़फायर का एलान किया था. लेकिन बीजेपी की क्षेत्रीय ईकाई ने इस फैसले का विरोध किया था.

इस घोषणा के कुछ ही घंटो बाद शोपिया ज़िले में गोलीबारी शुरु हो गई थी.

पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया, "जंगलों में छिपे हुए चरमपंथियों ने सुरक्षाबलों पर गोलीबारी कर दी थी जिसके बाद सुरक्षाबलों ने उनकी घेराबंदी कर ली. लेकिन चरमपंथी भागने में कामयाब रहे थे. जिसके बाद उन्हें खोजने के लिए अभियान चलाया गया."

पाकिस्तान मूल के चरमपंथी कमांडर मुश्ताक ज़रगर ने सीज़फायर के प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा था कि "सशस्त्र संघर्ष ही एकमात्र विकल्प है."

एक साल तक चले ऑपरेशन ऑल ऑउट के दौरान चरमपंथियों की ढाल बने दर्जनों आम नागरिकों की मौत हुई.

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'सीज़फायर से महबूबा को राहत'

राजनीतिक विज्ञान में रिसर्च करने वाले पीर शौकत कहते हैं, "सीज़फायर की ये घोषणा महबूबा मुफ्ती के लिए राहत लेकर आई है क्योंकि उन्हें एक ऐसे कमज़ोर शख्स के तौर पर देखा जा रहा था जिन्हें दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार नज़रअंदाज़ कर देती है."

हिंसा-ग्रस्त अनंतनाग, पुलवामा, शोपियां और त्राल के लोग इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.

शोपिंया के एक युवा राहिल ने मुठभेड़ वाली जगह हो रहे प्रदर्शनों में अपने भाई और एक रिश्तेदार को खो दिया था. राहिल कहते हैं कि वो सीज़फायर की घोषणा से खुश हैं. लेकिन उन्हें और कई लोगों को सरकार के इस फैसले पर संदेह भी है.

वो कहते हैं, "लेकिन हमने ऐसी घोषणाओं के अंजाम देखे हैं. अगर इन्हें ठीक से लागू किया जाए को ज़मीन पर अच्छे नतीजे देखने को मिल सकते हैं."

त्राल के एक कैब ड्राइवर फारुक अहमद कहते हैं, "एक हमला होगा और ये घोषणा ओंधे मुंह गिरेगी. वो जंगलों में चरमपंथियों को ढूंढ रहे हैं. हर घर की तलाशी ली जा रही है. यहां तक कि आज भी जब सीज़फायर की बात कही गई तो शोपियां में चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ चल रही थी. मुझे नहीं लगता कि ये एक ठोस कदम साबित होगा."

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