कर्नाटक के सियासी महासमर में अब आगे क्या होगा

  • 17 मई 2018
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए बीएस येदियुरप्पा इमेज कॉपीरइट Reuters

बीएस येदियुरप्पा बन गए हैं कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री. कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने राजभवन में आयोजित समारोह में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई.

इस मौके पर मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कंधे पर हरे रंग की शॉल ओढ़ रखी थी, जिसे किसानों के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है.

लेकिन ये हरा रंग क्या उनके जीवन में हरियाली लेकर आएगा?

देश में सबकी नज़रें अब आने वाले दिनों में कर्नाटक में क्या होगा इस पर टिकी हैं.

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अब आगे क्या?

संविधान के जानकार सुभाष कश्यप के मुताबिक़ मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सबसे पहले विधानसभा का सत्र बुलाया जाएगा.

नियमों के मुताबिक़ प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर विधानसभा सत्र की तारीख़ तय करते हैं.

इसके लिए पत्र राज्यपाल की तरफ़ से जारी किया जाता है. ये सत्र एक दिन का भी हो सकता है या फिर एक हफ्ते का भी. इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं है. अमूमन विधानसभा के कामकाज पर सत्र की समयसीमा निर्धारित की जाती है.

विधानसभा के सत्र के साथ-साथ ही प्रोटेम स्पीकर का नाम भी राज्यपाल की तरफ़ से ही तय किया जाता है.

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कौन होता है प्रोटेम स्पीकर ?

प्रोटेम स्पीकर को अंतरिम स्पीकर या अस्थायी स्पीकर भी कहा जाता है.

आम तौर पर परंपरा ये है कि सबसे वरिष्ठ विधायक को ही प्रोटेम स्पीकर के तौर पर चुना जाता है.

वरिष्ठ विधायक तय करने के दो पैमाने होते हैं. कभी चुन कर आए विधायक की उम्र को पैमाना माना जाता है, तो कभी सबसे ज्यादा बार चुन कर विधानसभा आने वाले विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है.

संविधान के मुताबिक प्रोटेम स्पीकर के पास दो अधिकार होते हैं.

उनके पास पहला अधिकार होता है नई विधानसभा में चुन आए विधायकों को शपथ दिलाने का.

दूसरा अधिकार होता है रेगुलर स्पीकर यानी स्थायी स्पीकर का चुनाव कराने का.

क्या होगा शुक्रवार को?

कर्नाटक के मामले में हालांकि राज्यपाल ने येदियुरप्पा सरकार को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया है, तो विधानसभा का सत्र आज से 15 दिन के भीतर कभी भी बुलाया जा सकता है.

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के मुताबिक 15 दिन का समय बहुत ज़्यादा है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, "आम तौर पर विश्वास मत हासिल करने के लिए इतना लंबा समय किसी सरकार को नहीं दिया गया. हो सकता है मामले की शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट इस समयावधि को कम कर दे."

वो आगे कहते हैं, "ये भी मुमकिन है कि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा खुद विश्वास मत हासिल करने के लिए 15 दिन का इंतजार न करें और फ़्लोर टेस्ट, सोमवार या मंगलवार के दिन के लिए तय करने की घोषणा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के पहले कर दें."

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Image caption राज्यपाल को समर्थन की चिट्ठी सौंपने के बाद मीडिया से बात करते हुए जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी

कर्नाटक के राज्यपाल की तरफ़ से येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता मिलने के बाद गुरुवार देर रात कांग्रेस और जेडीएस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. मामले की गंभीरता को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रात 1.45 बजे में मामले की सुनवाई की.

तीन जजों (जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े ) ने येदियुरप्पा के कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ पर रोक नहीं लगाई. हालांकि कोर्ट ने कांग्रेस की अर्ज़ी को भी ख़ारिज नहीं किया जिसकी सुनवाई 18 मई यानी शुक्रवार को सुबह साढ़े दस बजे होनी मुकर्रर की गई है.

बहुमत का आंकड़ा

कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा था कि जेडीएस ने राज्यपाल से सरकार बनाने के लिए मिलने का वक्त मांगा था और 115 विधायकों के समर्थन की चिट्ठी भी दी थी, लेकिन फिर उसे न्योता नहीं देकर बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया गया.

कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी ने सरकार बनाने के लिए ऐसे किसी बहुमत के आंकड़े वाली चिट्ठी राज्यपाल को नहीं दी है और अगर ऐसी कोई चिट्ठी दी है तो वो दिखाए.

लेकिन क्या बहुमत के समर्थन वाली चिट्ठी के बिना भी राज्यपाल किसी को सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं.

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इस सवाल के जवाब में सुभाष कश्यप कहते हैं, "सरकार बनाने के लिए ऐसी किसी चिट्ठी की जरूरत नहीं होती. सरकार को सदन में बहुमत साबित करना होता है."

चुनाव आयोग की बेवसाइट के मुताबिक कर्नाटक चुनाव में सीटों की आखिरी संख्या है - भाजपा 104, कांग्रेस 78, जनता दल-एस 38 (बसपा की 1 सीट शामिल) और अन्य 2.

सुभाष कश्यप के मुताबिक, "भाजपा के पास 104 विधायक हैं. ये चुनाव के नतीजों के आधार पर हैं, पर ये बहुमत का आंकड़ा नहीं है. बहुमत का आंकड़ा सदन में विश्वास प्रस्ताव वाले दिन मौजूद विधायकों के आधार पर निर्धारित होता है."

विश्वास मत वाले दिन क्या होगा?

सुभाष कश्यप के मुताबिक विश्वास मत से पहले विधानसभा के स्पीकर का चुनाव किया जाता है.

कई बार स्पीकर निर्विरोध चुन लिए जाते है.

लेकिन स्पीकर के लिए दो नाम का भी प्रस्ताव हो सकता है.

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ऐसी स्थिति में स्पीकर का चुनाव होता है, जो प्रोटेम स्पीकर कराते हैं. जिस नाम को पहले बहुमत से चुना जाता है उसे स्पीकर बना दिया जाता है.

उसके बाद चुने हुए स्पीकर की मौजूदगी में मुख्यमंत्री विश्वास प्रस्ताव पेश करते हैं और फिर उस पर वोटिंग स्पीकर कराते हैं.

ये वोटिंग इलेक्ट्रॉनिक तरीके से या डिविज़न वोट या स्लीप से कराई जा सकती है.

कर्नाटक विधानसभा में विश्वास मत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से जीत और हार तय की जाएगी.

लेकिन कब और कैसे - इस पर से अभी पर्दा उठना बाकी है.

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