कर्नाटक: क्या राहुल गांधी फिर मौका चूक गए?

  • 17 मई 2018
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कर्नाटक में नाटक जारी है. बीएस येदियुरप्पा राज्य के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं.

जनता दल सेक्युलर के एचडी कुमारास्वामी मुख्यमंत्री बनने का इंतज़ार कर रहे हैं. और भाजपा-कांग्रेस के बीच एक बार फिर सियासी तलवारें खिंच गई हैं.

कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने कहानी ख़त्म नहीं की, बल्कि शुरू की. भाजपा के पास नंबर कम हैं, लेकिन उसे सरकार बनाने का न्योता मिला है.

और वो बहुमत के लिए ज़रूरी विधायक जुगाड़ लेने का दावा कर रही है. कांग्रेस-जनता दल (एस) के पास पर्याप्त सीटें हैं लेकिन उसे सरकार बनाने का न्योता नहीं मिला है.

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पर्दे के पीछे

टेलीविज़न स्क्रीन पर पिछले दो दिनों से जो चेहरे नज़र आ रहे हैं, उनमें भाजपा की तरफ़ से नरेंद्र मोदी, अमित शाह, बीएस येदियुरप्पा, प्रकाश जावड़ेकर, अनंत कुमार, जेपी नड्डा और रविशंकर प्रसाद हैं.

जनता दल-सेक्युलर की तरफ़ से एचडी देवगौड़ा और कुमारास्वामी ने मोर्चा संभाला है.

कांग्रेस के किले में तैनात सिपहसालारों में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के अलावा गुलाम नबी आज़ाद, अशोक गहलोत दिख रहे हैं.

लेकिन कांग्रेस के जिस चेहरे को सबसे ज़्यादा दिखना चाहिए था, वो अभी पर्दे के पीछे ही दिख रहे हैं. राहुल गांधी.

15 मई को नतीजे आने वाले दिन उन्होंने एक ट्वीट में लिखा था, "इन चुनावों में कांग्रेस को वोट देने वालों का शुक्रिया. हम आपके समर्थन का सम्मान करते हैं और आपके लिए लड़ेंगे भी. साथ ही कार्यकर्ताओं और नेताओं का भी साधुवाद जिन्होंने लड़ने का हौसला दिखाया."

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राहुल की भूमिका क्या?

लेकिन इसके बाद दो दिन सियासी पारा चढ़ा रहा और ड्रामा जारी रहा लेकिन राहुल गांधी ने इस पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

जब ये तय हो गया है कि गुरुवार सवेरे नौ बजे येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, तो राहुल ने चंद मिनट पहले एक और ट्वीट किया, "भाजपा के पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है लेकिन इसके बावजूद वो कर्नाटक में सरकार बनाने पर ज़ोर दे रही है."

"ये कुछ और नहीं बल्कि संविधान का मज़ाक है. आज सवेरे भाजपा जब खोखली जीत का जश्न मना रही है, तो देश लोकतंत्र की हार पर दुखी है."

इसके कुछ देर बाद रायपुर में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने येदियुरप्पा की ताज़पोशी पर हमला बोलते हुए कहा कि तानाशाही में ऐसा ही होता है.

सिर्फ़ ट्वीट से काम चलेगा?

लेकिन क्या दो ट्वीट और एक जनसभा में चंद लाइनें कर्नाटक में भाजपा को बैकफ़ुट पर लाने के लिए काफ़ी साबित होंगी.

राहुल के ट्वीट के जवाब में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जवाबी हमला बोला.

उन्होंने लिखा, "कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी पार्टी का इतिहास शायद याद नहीं है. उनकी पार्टी की विरासत आपातकाल, आर्टिकल 356 का दुरुपयोग, अदालत, मीडिया और सिविल सोसाइटी पर हमला करने से जुड़ी रही है."

शाह ने एक और ट्वीट किया, "किसके पास कर्नाटक की जनता का जनादेश है? 104 सीटें जीतने वाली भाजपा या फिर कांग्रेस जो घटकर 78 सीटों पर आ गई और जिसके मुख्यमंत्री-मंत्री अपनी सीटें नहीं बचा सकें. या फिर जनता दल सेक्युलर, जिसने 37 सीटें जीतीं और दूसरों पर ज़मानत तक ज़ब्त हो गई."

"लोकतंत्र की हत्या उसी पल हो गई थी जब कांग्रेस ने जनता दल सेक्युलर के सामने अवसरवादी ऑफ़र रखा. ये कर्नाटक के भले के लिए नहीं था बल्कि सियासी फ़ायदे के लिए था. शर्मनाक!"

क्या राहुल अवसर गंवा रहे हैं?

अमित शाह कर्नाटक के नतीजों और सरकार बनाने की कोशिशों पर पहली बार नहीं बोले. नतीजों वाली शाम उन्होंने दिल्ली में भी बात की थी.

लेकिन राहुल 17 मई दोपहर तक सामने नहीं आए थे.

यहां तक कि बीएस येदियुरप्पा की शपथ का विरोध करने के लिए कांग्रेसी नेता विधानसभा के बाहर बैठे लेकिन राहुल नज़र नहीं आ रहे.

क्या राहुल गांधी कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनाने की काशिशों पर ज़्यादा सक्रियता दिखाकर अपना कद नहीं बढ़ा सकते थे?

अगर राजनीति में ये सब हथकंडे दिखाने ज़रूरी हैं, तो राहुल ने अवसर क्यों नहीं लपका?

दो मोर्चों पर लड़ रही हैं कांग्रेस

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि राहुल गांधी ने कर्नाटक के मोर्चे पर अपने वरिष्ठ नेताओं को लगाया. उन्होंने कहा, "यही वजह है कि भाजपा को इस बार गोवा और मणिपुर जैसा मौका नहीं मिला."

"कांग्रेस ने एग्ज़िट पोल के बाद ही सक्रियता दिखानी शुरू कर दी थी और रविवार को ही रणनीति को अंतिम रूप दिया गया. कुमारस्वामी और देवगौड़ा से बातचीत की गई. इस बार भाजपा गच्चा खा गई."

नीरजा कहती हैं, "जिस वक़्त नतीजे अंतिम नंबर की ओर बढ़ रहे थे, कुछ ही घंटों में दोनों दलों के बीच समझौता हो गया. ये साम, दाम, दंड, भेद का दौर है और कांग्रेस ने यही किया."

"राहुल का सामने आना ऑपरेशन का ही हिस्सा हो सकता है. लेकिन ये बात सही है कि अगर कांग्रेस नेताओं के साथ राहुल भी प्रदर्शन में शामिल होते तो इसका फ़ायदा हो सकता था."

"एक तरह से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का मतलब ये समझा जाता है कि आपने राजनीतिक रूप से हार मान ली है. लेकिन कांग्रेसी नेताओं का धरने पर बैठना ये दिखाता है कि वो दो मोर्चों पर लड़ रही है."

मीडिया का फ़ोकस?

नीरजा चौधरी के मुताबिक़, "ये बात सही है कि अगर वो अटल बिहारी वाजपेयी की तरह धरने पर बैठ जाते तो पूरे देश के मीडिया का फ़ोकस उन पर चला जाता."

अटल बिहारी वाजपेयी के धरने पर बैठने का किस्सा उत्तर प्रदेश से जुड़ा है.

फ़रवरी, 1998 में उत्तर प्रदेश में अंतिम दौर का चुनाव होने से पहले ही तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने लोकतांत्रिक कांग्रेस के नए नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी.

कल्याण सिंह की अगुवाई वाली भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और पाल को नई सरकार बनाने का न्योता दिया गया.

इस पर अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि वो कल्याण सिंह को बहुमत साबित करने का मौक़ा दिए बगैर सरकार बर्खास्त करने के ख़िलाफ़ आमरण अनशन पर बैठेंगे.

कांग्रेस की कमान

ये ऐलान होते ही सारे देश के मीडिया का फ़ोकस वाजपेयी की तरफ़ हो गया था.

हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि राजनीति में असल खेल पीछे रहकर खेला जाता है और राहुल गांधी इस बार सक्रिय हैं और संभलकर चाल चल रहे हैं.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश कहते हैं, "किसी भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष किस तरह काम करते हैं, ये उनका अपना फ़ैसला है."

"हर नेता का अपना स्टाइल होता है. राहुल गांधी का भी अपना है. उन्हीं के फ़ैसले पर ही कर्नाटक में सब कुछ हो रहा है."

लेकिन क्या कांग्रेस की सक्रियता की वजह सोनिया गांधी नहीं है, उन्होंने कहा, "कांग्रेस की पूरी कमान राहुल के हाथों में हैं."

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