क्या राहुल गांधी अपनी दादी के वादों को पूरा करेंगे?

  • 17 मई 2018
इंदिरा गांधी, राहुल गांधी इमेज कॉपीरइट Express Newspapers/Getty Images/Twitter

आज जब छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े को नक्सलवाद-मुक्त करके वहाँ की अकूत खनिज संपदा का दोहन करने पर चर्चा हो रही है, 90 बरस के एक पुराने काँग्रेसी नेता काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को उनकी दादी इंदिरा गाँधी के दो वादे याद दिलाना चाहते हैं.

राहुल गांधी छत्तीसगढ़ में हैं, उनकी नज़रें वहाँ इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं. नक्सलवाद से जूझ रहे इस राज्य में कई मुद्दे हैं और समय बीतने के साथ-साथ ये मुद्दे सुलझने की जगह उलझते चले गए हैं.

नक्सलवादी आंदोलन बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से शुरू हुआ था, जब भूमिहीन किसानों ने स्थानीय ज़मींदारों पर हमला करके सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी इसलिए इन आंदोलनकारियों को नक्सली भी कहा जाता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

छत्तीसगढ़ के जंगल

नक्सलवादी मानते हैं कि सशस्त्र क्रांति के बिना सत्ता परिवर्तन नहीं हो सकता.

वो चीनी नेता माओ त्से-तुंग के विचारों पर चलकर क्रांति करना चाहते हैं. इनको माओवादी भी कहा जाता है.

बंगाल में नक्सल हिंसा का दौर 1967 से 1972 तक चला जब तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने आंदोलन को बुरी तरह कुचल दिया.

नक्सली नेता चारु मजूमदार की पुलिस हिरासत में हुई मौत के साथ ही बंगाल से ये दौर ख़त्म हो गया.

इसके बाद नक्सलियों ने मौजूदा छत्तीसगढ़ के जंगलों को अपनी पनाहगाह बना लिया.गढ़चिरौली: मुठभेड़ में 14 माओवादियों को मारने का दावा

इमेज कॉपीरइट Tom Goodwin/BBC
Image caption रामचंद्र सिंहदेव

इंदिरा गांधी का दौर और नक्सलवाद

साल 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई और उन्हें बस्तर क्षेत्र में नक्सल आंदोलन की आशंका की ख़बर दी गई, उन्हें बताया गया कि अगर नक्सली बस्तर में सफल होते हैं तो वे मध्य भारत के बहुत से आदिवासी इलाकों में फैल सकते हैं.

1982 में इंदिरा गांधी ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को इस बारे में बात करने के लिए दिल्ली बुलाया. अर्जुन सिंह अपने साथ राज्य के प्लानिंग बोर्ड के उपाध्यक्ष रामचंद्र सिंहदेव को भी लेकर गए.

रामचंद्र सिंहदेव कोरिया राजघराने से ताल्लुक रखते हैं. छत्तीसगढ़ के राज्य बनने पर वे उसके पहले वित्त्तमंत्री बने थे. वे कांग्रेस पार्टी में रहते हुए भी अपने जनवादी विचारों और गंभीरता से काम करने के लिए जाने जाते हैं.

रामचंद्र सिंहदेव की उम्र आज 90 साल के करीब है, वे सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके हैं और राजधानी रायपुर के अपने घर में रहते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बस्तर में न खनन और न उद्योग की शर्त

उस मुलाक़ात के बारे में वे बताते हैं, "जब इंदिरा गांधी ने अर्जुन सिंह से पूछा कि बस्तर अगला नक्सलबाड़ी न बन जाए, उसके लिए क्या करना चाहिए तो उन्होंने मुझे आगे कर दिया."

रामचंद्र सिंहदेव कहते हैं, "मैंने कहा कि हमें आदिवासी इलाकों को अलग तरह से ट्रीट करना चाहिए वरना आदिवासियों में विद्रोह की भावना बहुत पुरानी है और नक्सली उसका दुरूपयोग कर लेंगे. हमारे संविधान में भी पांचवी और छठवीं अनुसूची में कुछ ऐसा ही कहा गया है. हमें बस्तर के विकास के लिए अलग प्लान बनाना चाहिए."

इंदिरा गांधी ने कहा इस पर सहमति जताते हुए प्लान बनाने को कहा. सिंहदेव कहते हैं, "मैंने कहा कि मेरी दो शर्तें हैं, अगर आप उन्हें मानेंगी तब ही मैं इस पर काम करूंगा."

सिंहदेव बताते हैं, "मैंने अपनी दोनों शर्तें उन्हें बताईं. पहली शर्त, बस्तर में अगले सौ साल नो माइनिंग और दूसरी शर्त, अगले सौ साल बस्तर में नो हेवी इंडस्ट्री. अगर आपको यह दोनों शर्तें मंज़ूर हैं तो मैं बस्तर डेवेलपमेंट प्लान पर काम शुरू करूँगा." रामचंद्र सिंहदेव के अनुसार इंदिरा गांधी ने कहा था, "ठीक है. आप काम शुरू करिए."

इमेज कॉपीरइट Tom Goodwin/BBC

बस्तर डेवेलपमेंट प्लान

बस्तर डेवेलपमेंट प्लान दिसंबर 1984 में बनकर तैयार हुआ लेकिन उससे दो महीने पहले ही इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया.

तब से बस्तर डेवेलपमेंट प्लान सरकारी फ़ाइलों में धूल खा रहा है जिसमें यह सुझाव दिया गया था कि वन आधारित छोटे उद्योगों से बस्तर का बेहतर और टिकाऊ विकास किया जा सकता है और इससे नक्सलियों के प्रभाव को भी रोका जा सकेगा.

ज़ाहिर है, इस प्लान पर अमल नहीं हुआ बल्कि उसके बाद से राज्य एक दूसरी ही दिशा में बढ़ गया, राज्य की खनिज संपदा पर कई देशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नज़र है और वहाँ बड़े पैमाने पर खनन और उद्योग लगाने की मंशा रखते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद जब बस्तर आए तो उन्होंने वहां स्टील प्लांट शुरू करने की घोषणा की. उनके अनुसार आदिवासी बस्तर के विकास और वहां की शांति का रास्ता इन भारी उद्योगों के रास्ते होकर जाता है.

छत्तीसगढ़ का 43 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से ढंका है, आबादी कम है और भरपूर वर्षा के कारण यहाँ की ज़मीन उपजाऊ है और जंगलों के कई उत्पाद हैं जिन पर आदिवासी जीविका के लिए निर्भर हैं.

छत्तीसगढ़ में इस साल चुनाव होने हैं, कांग्रेस भी अपने मैनीफेस्टो पर काम कर रही है. क्या राहुल अपनी दादी के वादों पर गौर करेंगे?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए