वाराणसी पुल हादसा: जिन आंखों ने देखा ज़िंदगी और मौत के बीच का मंज़र

  • 17 मई 2018
वाराणसी
Image caption शकील और नसीरूद्दीन

वाराणसी में फ़्लाइओवर हादसे वाली जगह पर खड़े होकर अगर आप ऊपर देखें तो आसमान में लटकी सीमेंट की कंक्रीट स्लैब देखकर डर जाएंगे कि कहीं ये आपके ऊपर किसी भी क्षण धम्म से आकर न गिर जाए.

जब मैं घटनास्थल पर पहुंचा तो टीवी कैमरे पहुंचने लगे थे, कांग्रेस नेता राज बब्बर मृतकों के लिए पांच लाख को कम बताकर 50 लाख रुपए की मांग करने की बाइट दे रहे थे. आसपास सेल्फ़ी लेने वालों की कमी नहीं थी.

कैमरा लिए कुछ पत्रकार इस असुरक्षित आधे बने पुल के ऊपर या पास ही रखी सीढ़ी पर चढ़कर तस्वीरें ले रहे थे या फ़ुटेज इकट्ठा कर रहे थे ताकि कैमरे से कहीं कुछ छूट न जाए. नीचे एक बड़ी भीड़ जुटी थी. लगा कि कहीं कुछ हिल गया तो कहीं एक और अनर्थ न हो जाए.

घायलों का हाल

घटनास्थल पर खून से लथपथ जूते, चप्पल, दबी-कुचली गाड़ियों के हिस्से हादसे की जगह पर बिखरे हुए थे. सोचिए कि कंक्रीट के पहाड़ के नीचे दबे इंसानी शरीर की क्या दुर्दशा हुई होगी. वाराणसी के जिलाधिकारी ने घटना में 15 लोगों के मारे जाने और 11 लोगों के घायल होने की पुष्टि की है.

वाराणसी की तंग गलियों से कभी बाएं तो कभी दाएं फिर यू टर्न लेने के बाद बंगालीटोला के नज़दीक कबीरचौरा अस्पताल का गेट पड़ता है. आपातकालीन विभाग के अंदर फिर बांए जाकर आखिरी वार्ड के 22 नंबर बेड पर मोहम्मद शकील बैठे हुए थे.

आसपास के दूसरे बेड पर परिवार की महिलाएं पूड़ी और आलू-बीन की सब्ज़ी खा रही थीं, शायद उन्हें इस बात का संतोष था कि शकील और नसीरुद्दीन उस मनहूस शाम में ज़िंदा तो बच गए. नहीं तो कई बदनसीब ऐसे थे कि उनके शरीर के हिस्सों को साथ लाना पड़ा था.

Image caption मोहम्मद शकील

ज़िंदगी और मौत के बीच का मंजर

माला बनाने का काम करने वाले शकील जैसे किसी गहराई में खोए हुए हैं. फ़्लाइओवर गिरने से उनके सीने के पास, पैर में चोट लगी और शरीर के अलग-अलग हिस्सों में घिसने और छिलने के निशान हैं. शकील बात हमसे कर रहे थे लेकिन ऐसा लगा कि उनकी आंखें कुछ और देख रही थीं.

वो बताते हैं, "मैं मलबे में 25 मिनट फंसा रहा. चारों ओर ज़िंदगी और मौत के बीच का मंजर था. दो दिनों से मैं सो नहीं पा रहा हूं. आँखों के सामने वहीं दृश्य सामने आ जाता है. मुझे लोगों की चीखें सुनाई दे रही हैं."

अपने मौसेरे भाई नसीरूद्दीन के साथ वो शाम साढ़े पांच बचे बाइक पर सवार होकर घटनास्थल पर बस के बगल से निकले ही थे कि भारी सा कुछ गिरने की आवाज़ आई और चारों ओर अंधेरा फैल गया, "लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे. लोग बाइक खींच रहे थे लेकिन दबा होने के कारण नहीं निकाल नहीं पा रहे थे."

Image caption मोहम्मद इस्माइल

'लगा कि अंत निकट है'

मलबे में शकील का पैर एक छड़ में फंसा था लेकिन उन्होंने नसीरुद्दीन को धक्का देकर बाहर निकाला. वो कहते हैं, "एक महीने पहले ही हमारे घर में इनके वालिद साहब की मौत हुई थी. मुझे चिंता थी कि अगर इसे कुछ हो गया तो मां-बाप का यही अकेला सहारा है."

बस के टूटे टुकड़े और कंक्रीट के हिस्से नसीरूद्दीन के चेहरे पर लगे जिससे उनके चेहरे पर घाव आ गए और दांत टूट गए. शवों से घिरे शकील को लगा कि अंत निकट है.

वो बताते हैं, "ऐसा लग रहा था हम बचेंगे नहीं. हम दुआ कर रहे थे कि अगर ज़िंदगी है तो परवरदिगार ज़िंदगी दे दे, मौत हो तो उसे आसान करना. निकट ही एक शव था. मैंने हिम्मत जुटाई कि कोई हमें यहां से निकाल ले."

कबीरचौरा अस्पताल से थोड़ी दूर

उधर, स्थानीय लोग दबे लोगों को बचाने की कोशिश तो कर रहे थे लेकिन भारी कंक्रीट को उठाकर दबे लोगों को खींचकर निकालना बेहद कठिन या असंभव था. किसी तरह लोगों ने शकील को मलबे से खींचकर निकाला.

कबीरचौरा अस्पताल से थोड़ी दूर ट्रॉमा सेंटर में मटमैले सफ़ेद कुर्ता पहने मोहम्मद इस्माइल कुरैशी बिस्तर पर पड़े हुए थे. उनकी आंखे छत की ओर एकटक देख रही थीं. पट्टियों से बंधी दाहिने हाथ में सुई चुभी थी जो पाइप के सहारे एक बोतल में फंसी थी.

उनकी बहन शबाना शांत बगल में खड़ी थीं. अपने ससुराल में थीं जब उन्हें इस हादसे का पता चला. इस्माइल कहते हैं, "हमें तो चोट लगी लेकिन सोचिए मरने वालों कों क्या हुआ होगा."

Image caption वाराणसी हादसे में घायल हुए महेंद्र प्रताप

मामले की जांच जारी

ट्रामा सेंटर के एक दूसरे बेड पर वकील राजेश भास्कर लेटे हुए थे. वो वाराणसी में वकालत करते हैं. इस हादसे में उनके ससुर की मौत हो गई. पास ही चिंताग्रस्त उनसे छोटे भाई भी कुर्सी पर बैठे. थे.

स्थानीय अख़बारों में राजेश भास्कर की तस्वीरें छपी हैं कि किस तरह वो कार के अंदर फंसे हुए हैं और उन्हें निकालने की कोशिश की जा रही है. लाल कंबल से ढके राजेश एकटक छत को देख रहे थे. उनके एक पैर की हड्डियां टूट गई हैं औऱ डॉक्टरों ने उस पर प्लास्टर चढ़ाया है.

ये घटना कैसे हुई इस पर राजेश ज़्यादा बात नहीं करना चाहते थे लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक वो अपने ससुर के साथ नई कार से लौट रहे थे जब फ़्लाईओवर का एक हिस्सा उन पर गिर गया और वो दब गए.

अचानक हड़हड़ा कर पुल गिर पड़ा...

राजेश भास्कर ने बताया, "मैं करीब 45 मिनट कार में फंसा रहा है. स्थानीय लोगों ने मुझे निकालने की बहुत कोशिश की लेकिन उसका बहुत असर नहीं हुआ. वहां पहुंचे एनडीआरएफ़ के लोगो ने क्रेन और कटर की मदद से मुझे बाहर निकाला."

राजेश भास्कर के बगल वाले बेड पर महेंद्र प्रताप लेटे हुए थे. उनके सिर सफ़ेद पट्टी से बंधा हुआ था. वो बस में बैठे थे "कि अचानक हड़हड़ा कर पुल गिर पड़ा."

वो कहते हैं, "हम बीच वाली सीट पर बैठे थे. (जब ये हुआ तो) हमारा होश ही उड़ गया. बस में बहुत लोग थे. बहुत लोग मर गए. हमारा साथी सुदर्शन राम मर गया. हमें उस वक्त होश नहीं था. हम बेहोश हो गए थे. उसी हालत में हम आधा पौन घंटा थे."

"हमारा पांव सिर फट गया है. (हम किसी तरह निकालकर) बीएचयू के छात्र हमें यहां ले आए. उस सड़क पर काम कई सालों से चल रहा था. कैसे उसे बनाए हैं क्या किए हैं, इस बारे में हम नहीं जानते हैं."

Image caption ज़िला मजिस्ट्रेट योगेश्वर राम मिश्र

ज़िला मजिस्ट्रेट योगेश्वर राम मिश्र कहते हैं, "(घटना से) सीख ये है कि हर प्रोजेक्ट का अपना एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) होता है. हमने सभी विभागों को (ये जानने के लिए) बुलाया है कि सुरक्षा का क्या एसओपी है और उस एसओपी का कितना पालन किया जा रहा है, और अगर नहीं तो उसका पालन करें और इसका हम थर्ड पार्टी ऑडिट भी कराएंगे."

हादसे के दो दिन गुज़र चुके हैं लेकिन अभी से लोग कह रहे हैं कि चंद दिनों में फिर सब कुछ सामान्य हो जाएगा. जैसे कि न कोई कांक्रीट के पहाड़ के नीचे दबकर मरा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

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