कर्नाटक में बाज़ी पलटने वाला कौन?

  • 19 मई 2018
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कर्नाटक में करीब पांच दिनों तक चला सियासी ड्रामा आखिरकार ख़त्म हुआ.

बीजेपी की ओर से सरकार बनाने का दावा किया जाना, बीएस येदियुरप्पा का मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना और फिर इस्तीफ़ा देना. दूसरी ओर कांग्रेस और जेडीएस का मज़बूती से एक दूसरे के साथ खड़े रहना.

बीजेपी ने बीते दिनों में खूब कोशिशें कीं और लगातार माहौल बनाया कि उसके पास कांग्रेस और जेडीएस के कुछ विधायकों का समर्थन है. लेकिन आख़िरकार ये सब धरा रह गया.

शनिवार को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत साबित करने से पहले येदियुरप्पा ने भावुक भाषण दिया और फिर इस्तीफ़े की घोषणा कर दी. स्पष्ट था कि उनके पास बहुमत नहीं है.

इस सियासी घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''बीजेपी की सारी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं. वो कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को तोड़ना चाहती थे लेकिन नाकाम रही. कांग्रेस की ढिलाई से या असावधानी से पिछले कुछ चुनावों में बीजेपी ने मैदान मार लिया. इसे बीजेपी की अच्छी तैयारी भी कह सकते हैं. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.''

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वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिये जाने को सही मानती हैं लेकिन वो इसे बीजेपी की ज़िद भी बताती हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''बीजेपी के पास नंबर नहीं थे. उसे लगता था कि केंद्र में सरकार होने का ये फायदा उठाएगी और तमाम एजेंसियों के ज़ोर पर वो बहुमत हासिल करने के लिए कांग्रेस और जेडीएस से विधायकों को तोड़ सकती है. जिस दिन परिणाम आया उसी दिन ये स्पष्ट हो गया था कि अगर कांग्रेस और जेडीएस साथ हो जाएं तो वो बीजेपी से आगे हैं लेकिन बीजेपी ने जिद नहीं छोड़ी.''

कांग्रेस मज़बूती के पीछे कौन?

राहुल देव का मानना है कि कर्नाटक में कांग्रेस की मजबूती और बीजेपी की इस हार के पीछे स्थानीय कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार की भूमिका अहम है. उन्होंने कहा, ''जेडीएस और कांग्रेस को साथ लाना हो या विधायकों को टूटने से बचाए रखने में भी पर्दे के पीछे उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है. दोनों पार्टियों के नेताओं ने काफ़ी सक्रियता से काम किया.''

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राहुव देव कहते हैं, कर्नाटक में जो हुआ उसका श्रेय कांग्रेस की चुस्ती को मानना पड़ेगा. अभिषेक मनु सिंघवी और उनके सहयोगियों ने जिस तरह सुप्रीम कोर्ट जाकर रात में सुनवाई के लिए अपील की और सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह उनकी बात को सुनी और राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में दखल दिये बिना कम से कम समय में बहुमत साबित करने के लिए कहा वो अहम है.

वहीं, राधिका रामाशेषन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को अहम बताती हैं. वो कहती हैं, ''कर्नाटक में बाज़ी तब पलटी जब सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दखल दिया. कांग्रेस और जेडीएस के साथ आने से बीजेपी हैरान थी. ये त्रिकोणीय मुक़ाबला था और बीजेपी को उन दोनों के साथ आने की उम्मीद नहीं थी. जब सुप्रीम कोर्ट ने देर रात इस मामले की सुनवाई की तो भी बीजेपी को बड़ा झटका लगा.''

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बीजेपी की ओर से क्या कमियां रहीं?

बीजेपी ने शुरुआत से ही सरकार बनाने का दम भरा लेकिन अंत में बाज़ी उसके हाथ से निकल गई. राधिका रामाशेषन का मानना है कि जब राज्यपाल ने येदियुरप्पा को शपथ ग्रहण कराया और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का वक़्त दिया तो वो भी बेहद हैरान करने वाला था.

उन्होंने कहा, ''छह दिन या सात दिन का समय देना उचित है लेकिन जिस पार्टी के पास बहुमत नहीं है उसे 15 दिन का वक़्त देना सही नहीं. इतने वक़्त में वो पार्टी सरकार बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने इसी में दखल दिया और एक दिन का वक़्त दिया. जिससे भाजपा के हाथ से खेल निकल गया.''

बीजेपी की ओर से किये गए बहुमत के दावे पर वो कहती हैं, ''बीजेपी ये फैला रही थी कि कांग्रेस में जो लिंगायत विधायक हैं वो बीजेपी में शामिल होंगे लेकिन ये उसकी गलतफहमी थी. जो लिंगायत चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़े और जीते वो बीजेपी के साथ कैसे जा सकते थे. उन्हें भी जनता को जवाब देना पड़ता.''

उन्होंने बीजेपी के कमज़ोर पड़ने के पीछे एक अहम वजह येदियुरप्पा को लेकर पार्टी के नेताओं का सहज ना होना भी है. रामाशेषन ने कहा, ''प्रदेश के जो वरिष्ठ नेता थे वो येदियुरप्पा के साथ पूरे मन से नहीं थे. मोदी और अमित शाह ने उन्हें भले ही कहा हो कि सरकार बनाने का दावा पेश करो और बहुमत साबित करो लेकिन राज्य के नेताओं का सहारा उनको नहीं मिला. ये प्रोजेक्ट पूरी तरह से येदियुरप्पा पर फोकस हो गया जिसका नुकसान हुआ.

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क्या होगा सियासी असर?

राहुल देव का मानना है कि कर्नाटक में जो हुआ कांग्रेस को इसका फ़ायदा होगा. कांग्रेस के नेतृत्व को अब ज़्यादा गंभीरता से लिया जाएगा और कांग्रेस को भी समझ आ गया कि बीजेपी से निपटने के लिए उसे किस तरह की तैयारी करनी होगी.

उन्होंने कहा, ''इस साल तीन बड़े राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने हैं. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं का आत्मविश्वास इससे बढ़ेगा. लेकिन जिस तरह बीजेपी ने हर बार बाजी मारी है उसके लिए उसकी संगठनात्मक तैयारी काफ़ी हद तक महत्वपूर्ण है.''

राहुल देव ने कहा, मोदी और शाह की जोडी का जादू जिस तरह चला है. प्लानिंग और माइक्रोप्लानिंग में अमित शाह को महारत हासिल है वैसा अभी कांग्रेस में नहीं है. इन दोनों की जोड़ी को टक्कर देने वाला अभी तक कांग्रेस में कोई नहीं है. ऐसी तैयारी अचानक नहीं हो जाती है. इसमें समय और लोग लगेंगे. कांग्रेस एक दिन में या कुछ महीनों में नहीं कर सकती.''

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''जेडीएस का फायदा सबसे ज़्यादा''

राहुल देव ने यह भी कहा कि इस पूरे मामले में सबसे अधिक फायदा जेडीएस का है. कांग्रेस के विधायकों की आधी संख्या लेने के बाद भी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री हैं.

कांग्रेस का जैसा इतिहास रहा है समर्थन देकर सरकार बनाना और समर्थन वापस लेना, वो कर्नाटक की राजनीति में फिलहाल नहीं होगा क्योंकि कांग्रेस 2019 के चुनावों के ध्यान में रखकर आगे बढ़ेगी और चाहेगी कि ये सरकार बनी रहे.

राधिका रामाशेषन भी इन चुनावी घटनाक्रम को 2019 से जोड़कर देखती हैं. उन्होंने कहा, ''विपक्ष की नज़र 2019 में है. इसलिए बाकी पार्टियां भी कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन चाहती थीं. क्योंकि ऐसा कहा जा रहा था कि कुमारस्वामी बीजेपी के साथ जा सकते हैं. कुमारस्वामी मजबूत नेता हैं और उन्हें राजनीति की समझ भी है. इसलिए उन्हें कमजोर समझने की भूल कोई न करे. भले ही कांग्रेस इस पूरे मामले में फ्रंटफुट पर दिख रही है लेकिन कुमारस्वामी का योगदान भी बहुत है. ''

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