झारखंड: बिरसा मुंडा के गांव वालों को क्यों मंजूर नहीं ये सरकारी तोहफ़ा

  • 23 मई 2018
आदिवासी ठुकरा रहे सरकारी पक्के का मकान इमेज कॉपीरइट NIRAJ SINHA/BBC

अंग्रेजों के ख़िलाफ़ जोरदार क्रांति करने वाले आदिवासी योद्धा बिरसा मुंडा के वंशज और गांव के लोग इन दिनों उद्वेलित और एकजुट हैं.

आठ महीने से पक्का मकान का इंतजार कर रहे आदिवासी परिवारों ने सरकार के प्रारूप को सिरे से ठुकरा दिया है.

यहां तक कि गांव के लोग वो सरकारी समारोह भी भूलना चाहते हैं, जब सरकार पिछले साल 17 सितंबर को शहीद ग्राम विकास के तहत आवास योजना लेकर बिरसा मुंडा के घर-आंगन में पहुंची थी.

इस समारोह में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने खास तौर पर शिरकत की थी.

बिरसा के गांव में शहीद ग्राम विकास कार्यक्रम के तहत आदिवासी परिवारों के लिए पक्का मकान बनाया जाना है.

लेकिन आठ महीने बाद तक एक ईंट भी नहीं जोड़ी जा सकी है.

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आठ महीने में नहीं जोड़ी गई एक ईंट

झारखंड की राजधानी रांची से 70 किलोमीटर दूर खूंटी जिले में पहाड़ों- जंगलों से घिरे उलिहातू गांव में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था.

हालांकि इस गांव तक जाने वाली सड़क पक्की और चकाचक है. चिलचिलाती धूप और गर्म हवाओं के थपेड़े के बीच गांव में सन्नाटा पसरा है.

एक बच्चे ने बताया कि कुछ दूरी पर इमली और कटहल के पेड़ों की छांव में गांव के सभी मर्दों की बैठक चल रही है. जबकि महिलाएं घरों का काम निपटाने में जुटी हैं.

पता चला गांव के सभी बड़े- युवा हर हफ़्ते बैठकी करते हैं. इसमें सरकारी योजनाओं की हालत के साथ रोजमर्रे की ज़िंदगी पर चर्चा होती है.

इन दिनों होने वाली बैठकों में पक्का मकान का मसला चर्चा के केंद्र में होता है.

पंचायत प्रतिनिधि सामुएल पूर्ति बताते हैं कि जो नक्शा बनाया गया है उसमें आठ गुना नौ फ़ीट के आकार के दो कमरे समेत कुल 255 वर्ग फ़ीट का पक्का घर होगा, जो गांव वालों को मंजूर नहीं है.

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क्यों मकान नहीं लेना चाहते गांव वाले?

ग्राम सभा की बैठक में इस नक्शे पर आधारित घर नहीं लेने की आम सहमति बनी है और हाल ही में अड़की प्रखंड के सरकारी अधिकारी उनलोगों से बात करने आए थे, तो उन्हें लिखित तौर पर यह जानकारी दे दी गई है.

इस गांव के छह टोले में 136 परिवार रहते हैं. सभी लोगों के कच्चे और खपरैल के मकान हैं. जबकि कई लोगों के घर की हालत बेहद जीर्ण- शीर्ण है.

सामुएल कहते हैं इसकी खुशी जरूर थी कि बिरसा मुंडा के गांव में सबका पक्का मकान होगा, लेकिन जब घर के प्रारूप ( नक्शा) की जानकारी उनलोगों को मिली, तो बेहद निराशा हुई.

इससे पहले गांव वालों को ये पता होता कि पक्का मकान के नाम पर दड़बा दिया जाएगा, तो वो लोग उस समारोह में खुशियां बांटने जाते ही नहीं. चाहे कितनी बड़ी हस्तियां हमें बुलाती.

आखिर पक्का मकान क्यों नही बनवाना चाहते, इस सवाल पर वे कहते हैं, "आठ गुना नौ फ़ीट के आकार वाले कमरे का अंदाज आप लगा सकते हैं. फिर बरामदा सात गुना छह फ़ीट का होगा, तो हम चार-छह लोग लोग तो वैसे घर में देह भी सीधा नहीं कर सकते."

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Image caption 17 सितंबर 2017 को आवास योजना को लेकर समारोह का आयोजन हुआ था जिसमें अमित शाह ने शिरकत की थी

भगवान बिरसा का नाम

ग्राम प्रधान जीतराम मुंडा सिर्फ़ एक लाइन में अपनी बात ख़त्म करते हैं कि उनलोगों ने सरकार और अधिकारियों से पंद्रह गुना बारह फ़ीट के चार कमरों वाले घर बनाने की पेशकश की है. अब फ़ैसला सरकार को लेना है.

सामुएल की बगल में बैठे युवा बुधवा नाग बताने लगे कि आदिवासी उन्मुक्त ज़िंदगी जीते रहे हैं. कच्चा, खपरैल और टूटा-फूटा ही सही घर बड़ा और खुला-हवादार होता है.

इस हालत में सरकार की इस योजना से सालों के उनके सपने तो साकार होते नजर आएंगे, इस बात पर बुधवा कहते हैं, "रहने दीजिए हमें उसी हाल में. अगर सरकार भगवान बिरसा के नाम पर उनके वंशजों और गांव के लोगों को पक्का मकान देना चाहती है, तो कबूतरखाने जैसा क्यों. प्रस्तावित घर के कमरे में तो एक बड़ा सा खाट नहीं लगाया जा सकता. फिर सरकार कहेगी कि बिरसा के गांव को संवार दिया गया."

बुधवा का जोर इस बात पर था कि वेलोग सदियों से आखिरी कतार में ही शामिल रहे हैं. तब बिरसा के उलगुलान के अंकुर लहलहाएंगे इसके लिए इंतजार करते रहेंगे.

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Image caption झारखंड के उलिहातु में बिरसा मुंडा की प्रतिमा को माला पहनाते गृहमंत्री राजनाथ सिंह

आदिवासियों के नायक

गौरतलब है कि झारखंड में लोग बड़े ही गर्व से बिरसा को भगवान मानते हैं और दूरदराज के गांवों में आदिवासी अब भी उनके लौटने का इंतजार करते हैं.

उलगुलान के इस नायक को धरती आबा भी कहा जाता है जबकि महज महज 25 साल की उम्र में बिरसा मुंडा की मौत हुई थी.

देश के दूसरे राज्यों में भी आदिवासियों के बीच बिरसा मुंडा क्रांतिवीर के तौर पर पूजे जाते हैं.

इसी सिलसिले में 13 मई को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने महाराष्ट्र के मोहोली, चंद्रपुर और नागपुर में बिरसा मुंडा की मूर्ति का अनावरण किया है.

अड़की प्रखंड विकास अधिकारी ( बीजीओ) रंजीता टोप्पो बताती हैं कि उन्होंने तीन दफा उलिहातू का दौरा किया. ग्रामीणों के साथ बैठक कर आवास योजना का लाभ लेने के लिए सब कुछ समझाया.

फिर भी वे लोग ग्राम सभा के फ़ैसले का हवाला देकर सरकार के प्रारूप पर आधारित मकान लेना नहीं चाहते. ज़िले के उपायुक्त ने भी गांव वालों से बातें की है. जबकि सरकार ने इस काम के लिए फंड भेजा है. इस घर में रसोई, शौचालय भी होगा.

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तस्वीर नहीं बदली

जेरोम पूर्ति बताने लगे कि उन्होंने जब से होश संभाला है पंद्रह नवंबर को बिरसा मुंडा की जयंती तथा नौ जून को पुण्य तिथि पर साहबों और राजनेताओं को उलाहातू आकर वादे- घोषणाएं करते ज़रूर देखा-सुना है. चाहे सरकारें किसी की हो.

वैसे बिरसा मुंडा कांप्लेक्स, शौचालय, खेल का मैदान, अखड़ा भवन, आवासीय स्कूल समेत कई काम ज़रूर हुए हैं, लेकिन उलिहातू के लोगों को रोज़गार मिले, खेत और हलक को पानी मिले, गरीबी-तंगहाली दूर हो इसकी मुकम्मल व्यवस्था नहीं की जा सकी है.

बांस की चटाई बुन रही एक महिला और उसके घर की हालत दिखाते हुए वे कहते हैं कि ज़िंदगी की इसी जद्दोजहद से जूझना इस गांव के नसीब में शामिल है.

हम उलिहातू गांव के कई टोले में गए, लोगों से बातें की. एक बात साफ़ तौर पर रेखांकित होती रही कि नई पीढ़ी में रोज़गार की कसमकसाहट है. हताशा-निराशा के स्वर भी सुनाई पड़ते रहे.

खेती, यहां बारिश पर टिकी है. जबकि वनोत्पाद और दिहाड़ी मजदूरी जीने का मुख्य जरिया है.

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बुजुर्ग दामू मुंडा स्थानीय लहजे में कहते हैं, "गनीमत है कि जंगल-पहाड़ हमारे करीब हैं वरना पेट भरना भी मुश्किल होता."

"सरकार लाख दावे करती रहे कि अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास पहुंचाया जा रहा है, लेकिन तस्वीरें सामने है. पक्का मकान उनके लिए वाकई सपने जैसा है अब सरकार इसे कायदे से बनवा दे, तभी तो दिन अच्छे होंगे."

उंबुलन बोदरा कहते हैं कि बिरसा मुंडा काम्प्लेक्स निर्माण के लिए जिन लोगों ने ज़मीनें दी थीं उन्हें कम से कम सरकारी नौकरी दी जाती, जिसकी मांग सालों से की जाती रही है.

हाल ही में बिरसा मुंडा के वंशज सुखराम मुंडा केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर लौटे हैं. उन्होंने अपनी दो बेटियों को सरकारी नौकरी दिलाने तथा गांव वालों की इच्छा के अनुरूप पक्का मकान दिलाने का अनुरोध किया है.

वो कहते हैं कि जो घर सरकार बनवाना चाहती है वह बहुत छोटा पड़ेगा. इसलिए ग्राम सभा की बैठक में वैसा घर नहीं लेने की सहमति बनी है.

सुमन पूर्ति बताने लगे कि सरकार और अमित शाह के दौरे से पहले उलिहातू गांव में बकरी और मुर्गी शेड बनाने का काम शुरू हुआ था, जो अब भी अधूरा है. उनका कहना हैं उलिहातू को आदर्श गांव बनाने के लिए कई काम होने हैं, लेकिन योजनाएं धरातल पर कब उतरेंगी, इसका इंतजार रहेगा.

बरगी टोला की हाना पूर्ति की टीस य़ह है कि उलहातू में तो भगवान बिरसा मुंडा के नाम पर कई काम हुए पर इस गांव के दूसरे टोलों की हमेशा से अनदेखी होती रही है.

बरगी टोला के लिए अब तक पक्की सड़क नहीं बनी है. रोजगार का घोर अभाव है. वेलोग डाड़ी- चुआ (गड्ढों में फूटने वाला जल स्त्रोत) का पानी पीते रहे हैं.

इस टोला के कई बुजुर्ग महिलाओं को महीनों से वृद्धापेंशन नहीं मिला है, जबकि दर्जन भर लोगों को सरकारी अनाज मिलना बंद हो गया है. आधार से लिंकेज को लेकर ये परेशानी खड़ी हुई है. मकदली पूर्ति के सवाल भी है, "कहां हैं साहब और सिस्टम?"

कहां है पेच

राज्य की आदिवासी कल्याण मंत्री लुइस मरांडी कहती हैं कि पहली बार देश के झारखंड में आदिवासी वीर सपूतों के आठ गांवों में आदर्श ग्राम विकास योजना की शुरुआत की गई है. किसी भी योजना में एकरूपता दिखनी चाहिए, जबकि उलिहातू के लोग पक्का मकान के प्रारूप पर सहमत नहीं हैं.

वो कहती हैं कि एक मकान के निर्माण में दो लाख 53 हज़ार रुपये खर्च किए जाने हैं. केंद्र सरकार ने भी इस योजना और तैयारी की तारीफ़ की है. अधिकारियों से कहा गया है कि उलिहातू के ग्रामीणों से बात कर उन्हें समझाया जाए, ताकि गतिरोध दूर हो सके. ज़रूरत पड़ी, तो वो खुद भी गांव जाएंगी.

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