चीनी निवेश से क्यों डरा हुआ है अमरीका?

शी और ट्रंप

अमरीका में बढ़ते चीनी निवेश ने ट्रंप प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं. इसकी वजह से अमरीका विदेशी निवेश से जुड़े नियमों को सख़्त करने पर विचार कर रहा है.

लेकिन ऐसे बदलावों से विदेशी निवेश में कमी आने और नौकरियों पर असर पड़ने का ख़तरा भी मंडरा रहा है.

ग्रेटर सिनसिनाटी चाइनीज चैंबर ऑफ कॉमर्स के कार्यकारी निदेशक लिओ चान कहते हैं, "चीनी निवेश हो रहा है, यहां कंपनियां खरीदी जा रही हैं, फैक्ट्री और रेस्तरां खुल रहे हैं जिससे इलाक़े में नौकरियां बढ़ाने में मदद मिली है."

अमरीका के ओहियो शहर में रहने वाले चान विदेशी निवेश को लेकर आशान्वित हैं.

उनका कहना है कि इससे पहले विदेशी प्रतियोगिता और वित्तीय संकट के कारण यहां का निर्माण क्षेत्र बुरे दौर से गुज़र रहा था.

चीनी अर्थव्यवस्था से चुनौती

अमरीकी सरकार चीनी निवेश पर नज़र बनाए हुए हैं और विदेशी निवेश पर नियंत्रण के लिए नियमों को और सख़्त करने पर काम कर रही है.

हालांकि, इससे अमरीका की दो प्राथमिकताएं, नौकरियां और राष्ट्रीय सुरक्षा आपस में टकरा भी सकती हैं.

नियम कड़े किए जाने से कई कंपनियों और कानून निर्माताओं ने भी निवेशकों के पीछे हटने की चेतावनी दी है.

लेकिन, नेताओं का मानना कुछ अलग है. उनका कहना है कि बढ़ती तकनीक और चीन की अर्थव्यवस्था से उपजी चुनौतियों के कारण नियमों में बदलाव की ज़रूरत है.

अमरीका की चिंता का एक कारण ये भी है कि चीनी कंपनियां उच्च तकनीक उद्योगों को लक्षित कर रही हैं, वो जिस अमरीकी तकनीक को खरीद रही हैं उसका सैन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हो सकता है.

डेमोक्रेट पार्टी के नेता डेनी हैक कहते हैं, "हम चाहते हैं कि अमरीका विदेशी निवेश के लिए एक बेहतरीन जगह बने लेकिन खुद को दूसरों के छुपे मंसूबों से बचाना भी महत्वपूर्ण है."

बदलाव के बिना भी सख्ती

अमरीका की परेशानी की झलक पहले से ही दिखने लगी है. नियमों में बदलाव किये बिना ही उसका रुख कड़ा हो गया है.

अमरीका में विदेशी निवेश के संबंध में बनी समिति जो राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों से जुड़े सौदों की समीक्षा भी करती है उसने पिछले साल हुए 230 से ज्यादा लेन-देन की जांच की. ये साल 2011 के मुकाबले करीब दोगुना है और साल 2016 की तुलना में 40 फीसदी ज्यादा है.

इस साल समिति ने ऐंट फाइनेंशियल, जो अलीबाबा की डिजिटल पेमेंट शाखा है, उसके एक मनी ट्रांस्फर फर्म की बिक्री में रुकावट डाली है.

पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स के सीनियर फेलो गैरी हफबर कहते हैं, 'अमरीका जिस तरह से विदेश निवेश का बाहें फैलाये स्वागत कर रहा था, अब उसमें पहले जैसा उत्साह नहीं है.'

हफ़बर कहते हैं कि यह मसला पहले भी उठता रहा है लेकिन औद्योगिक जासूसी के मामलों के बाद से चिंताएं और बढ़ गई हैं. अब स्थितियां और गंभीर हो चुकी हैं.

वहीं, लिओ चान कहते हैं कि अमरीका की यह चिंता कुछ वैसी ही है जैसी जापानी निवेश को लेकर हुई थीं. लेकिन, इस बात का डर है कि चीन विरोधी माहौल के चलते ​निवेशक ओहियो जैसी जगहों से चले जाएंगे.

वह कहते हैं, ''आप चीन के हर शख्स को दोषी ठहराते हैं और आपको इस पर अफसोस भी नहीं होता. लेकिन इससे स्थानीय लोगों को बुरा लगता है.''

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

चीनी निवेश को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया सिर्फ अमरीका तक सीमित नहीं है.

जर्मनी से लेकर न्यूजीलैंड के कानून निर्माता तक इस संबंध में चेतावनी जारी कर चुके हैं क्योंकि चीन का विदेशी निवेश 12,261 करोड़ रूपये से ज्यादा पहुंच चुका है. ये 10 साल पहले के मुकाबले दस गुना है. यूरोपीय संघ भी नियम सख्त करने पर विचार कर रहा है.

रो​डियम ग्रुप और अमरीकी चीनी संबंधों पर बनी राष्ट्रीय समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में चीन का अमरीका में 3,133 करोड़ रूपये निवेश का था और कपंनियों में करीब 1 लाख 40 हज़ार लोग नौकरियां कर रहे थे.

रोडियम ग्रुप के अनुसार चीन का अधिकतर निवेश रियल स्टेट और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में है.

कुछ चीनी कंपनियों ने अधिग्रहण और विलय के ज़रिये काम शुरू किया है जबकि कुछ कपंनियां अमरीका में नई शुरुआत कर रही हैं.

ओहियो में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ डेटन में अर्थशास्त्री रिचर्ड स्टॉक कहते हैं कि वो राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर पैदा हुए खतरे के बारे में जानते हैं लेकिन जो यहां हो रहा है वो बिल्कुल अलग है.

रिचर्ड कहते हैं कि जैसे फुयाओ ग्लास कंपनी ने यहां बंद हो चुके जनरल मोटर्स प्लांट में काम करने का फैसला लिया और इसके ज़रिए वो 2000 से ज्यादा लोगों को नौकरियां देगी. मुझे नहीं लगता कि इस सबसे राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा है.

निवेश में जोखिम

अभी ये तय नहीं हुआ है कि अमरीका अपने नियमों में कितनी सख्ती बरतने वाला है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मार्च में अमरीका के ट्रेजरी डिपार्टमेंट से चीनी निवेश को नियंत्रित करने के तरीकों के बारे में पूछा था.

सीनेट और हाउस इस पर काम कर रहे हैं जो इस साल कानून भी बन सकता है. इससे सरकार के पास विदेशी सौदों की जांच संबंधी अधिकार बढ़ जाएंगे.

वहीं, हफबर आगाह करते हैं कि इससे निवेश और उत्पादन पर असर पड़ सकता है. यह अमरीकी कंपनियों के लिए शोध को और महंगा बना सकता है. अगर आप एक देश के साथ दुश्मन की तरह व्यवहार करते हैं तो वह दुश्मन ही बन जाता है.

जबकि लिओ चान इन हालातों में भी हौसला बनाए रखने की बात करते हैं. उनका कहना है कि इस तरह के राजनीतिक दबाव बार-बार बनते हैं लेकिन ऐसे समय में आप सिर्फ शांत रह सकते हैं.

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