ब्लॉग: शर्म-निरपेक्षता की सियासत के सूरमा मोदी-शाह और शागिर्द राहुल

  • 22 मई 2018
मोदी शाह और राहुल इमेज कॉपीरइट Getty Images

कर्नाटक के चुनाव परिणाम आने पर जितनी शर्म-निरपेक्षता दिखी उस पर नेता तो क्या ही शर्मिंदा होंगे, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का तमग़ा लिए फिरने वाले करोड़ों लोगों को कुछ तो सोचना चाहिए.

मोदी-शाह की जोड़ी ने अपनी हार-जीत को 'सदियों से मुग़लों के हाथों प्रताड़ित हिंदुओं' की हार-जीत में बदलने की जादूगरी दिखाई है, उन्होंने बहुत सारे गुर राहुल के पूर्वजों से ही सीखे हैं लेकिन वे खेल को एक लेवल आगे ले गए हैं.

अब राहुल उनके पीछे-पीछे मंदिरों में माथा टेकते फिर रहे हैं.

धर्म-निरपेक्षता को एक सुनियोजित प्रचार अभियान के तहत एक घृणित शब्द बनाया गया, ऐसा करना आसान रहा क्योंकि धर्म-निरपेक्षता के सूरमाओं ने कलंक के ढेरों कीर्तिमान बनाए हैं.

शर्म-निरपेक्षता का दौर

धर्म-निरपेक्षता की मूल भावना तो यही थी कि धर्म के आधार पर सत्ता अपने नागरिकों के साथ भेदभाव न करें, मगर मौका देखकर जाली वाली टोपी पहनने वालों की जालसाज़ी की वजह से ये 'तुष्टीकरण' कहलाया और बुरी तरह बदनाम हुआ.

धर्म-निरपेक्षता की जगह अब देश शर्म-निरपेक्षता के दौर में दाख़िल हो चुका है जहाँ हर तरह की बेहयाई, बदतमीज़ी और बेहूदगी ने मानो सिद्धांत, मूल्य और आदर्श की जगह ले ली है.

धूप में लाइन में लगकर वोटरों ने जिन्हें चुना उन विधायकों और सांसदों की चौपाया की तरह सौदेबाज़ी (हॉर्स ट्रेडिंग) नई नहीं है, पहले भी होती रही है लेकिन थोड़ा तो लाज-लिहाज बाक़ी था. भाजपा के समर्थक अगर येदियुरप्पा की तुलना वाजपेयी से किए जाने पर शर्मिंदा नहीं हैं तो वाक़ई शर्म-निरपेक्षता के झंडे गाड़े जा चुके हैं.

अटल बिहारी सचेत होते तो जाने क्या सोचते, वैसे वे भी मार्गदर्शक मंडल में ही होते. जो लोग प्रकाश सिंह बादल की तुलना नेल्सन मंडेला से कर सकते हों, उनके लिए येदियुरप्पा और वाजेपयी की तुलना सहज ही है.

'फिसल पड़े तो हर गंगे'

बहरहाल, कर्नाटक का पूरा मखौल जो अभी खत्म नहीं हुआ है, उसने लोकतंत्र,जनादेश, नैतिकता और राज्यपाल की कुर्सी की इज़्ज़त एक बार फिर उतार दी है, दोनों तरफ़ से 'तुम गंदे हो' कहकर कीचड़ उछाली जा रही है, वोटर इस 'मुफ़्त के मनोरंजन' का आनंद ले या फिर रोए?

बीजेपी जोड़-तोड़, ख़रीद-फ़रोख़्त, सीबीआई-ईडी जैसे तंत्र-मंत्र में पूर्ण आस्था और अपने चाणक्य की प्रतिभा में पूर्ण श्रद्धा के साथ मैदान में जयघोष करके कूदी थी, राज्यपाल ने उदारता के साथ 15 दिन का समय दिया, आधी रात को ऊँघती न्याय की देवी ने पट्टी के पीछे से अपनी नज़रें टेढ़ी कर लीं, समय सीमा घटा दी गई.

ऐसी हालत में बीजेपी के पास 'फिसल पड़े तो हर गंगे' के अलावा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि कांग्रेस-जेडी (एस) ने अपने विधायकों की लगाम खूँटे से कसकर बाँधी थी, 'मोरल हाइ ग्राउंड' पर उछलकर चढ़ना ही अब बीजेपी के लिए 'नेक्स्ट बेस्ट ऑप्शन' था.

कांग्रेस ने इस बार कसर नहीं छोड़ी

कांग्रेस जो लगातार मोदी-शाह की जोड़ी से पिट रही थी और एक-के-बाद-एक राज्य खोती जा रही थी उसने शर्म-निरपेक्षता दिखाने की पूरी तैयारी कर रखी थी.

कर्नाटक के जनादेश में एक ही बात साफ़ थी कि राज्य की जनता ने कान खींचकर कांग्रेस को कुर्सी से उतार दिया है, लेकिन वह तीसरे नंबर पर आई पार्टी जेडी (एस) को समर्थन देकर 'चोर दरवाज़े' से सत्ता में बने रहने का इंतज़ाम कर चुकी है.

कांग्रेस के हिसाब से ये 'लोकतंत्र की जीत' है, जब इसी फ़ॉर्मूले से बीजेपी सत्ता में आई थी तो ये बेईमानी थी. कांग्रेस और जनता दल (एस) एक दूसरे के ख़िलाफ़ आग उगलने के बाद, तरह-तरह के आरोप लगाने के बाद 'लोकतंत्र की रक्षा' के लिए गले मिल गए हैं.

सियासत का जो सस्ता कैबरे

दूसरी ओर, कांग्रेस-जेडी (एस) के गठबंधन को 'अपवित्र' बताने वाले अमित शाह ने जब गोवा और मणिपुर में यही किया था तो वह चाणक्य नीति के अनुरुप किया गया पवित्र यज्ञ था.

कर्नाटक में सियासत का जो सस्ता कैबरे देखने को मिला है वो दरअसल 2019 की चुनावी फिल्म का ट्रेलर है जिसमें नग्नता और फूहड़ता के कई आइटम नंबर देखने को मिलेंगे, क्योंकि शर्म-निरपेक्ष सियासत मानती है कि यही पब्लिक डिमांड है, और पब्लिक भी न जाने कब एक नहीं, सभी पार्टियों से कहेगी--'शेम शेम.'

राजनीति को डब्लूडब्लूएफ़ की लड़ाई बना देने वाले, 'जो जीता वही सिकंदर', 'मारे सो मीर' और 'जो डर गया समझो मर गया' को अपना ध्येय वाक्य बनाने वाले नेताओं को शायद वही लोग रोक सकते हैं जो रिंग के चारों तरफ़ खड़े उनका हौसला बढ़ाते हुए कूद रहे हैं यानी दो खेमों में बँटी देश की जनता, जिसे सिर्फ़ इस बात से मतलब है कि उसका पहलवान जीते, भले नियमों की भुर्ता-चटनी बन जाए.

समाज और राजनीति, कौन आगे, कौन पीछे?

पिछले कुछ सालों में बेईमानी, धोखाधड़ी और छल-प्रपंच से कामयाबी पाने वालों की स्वीकार्यता लगातार बढ़ी है.

'जो कामयाब वही सही', आज ये फ़ार्मूला मान्य है. इमरजेंसी लगाने वाली इंदिरा गांधी जनता सरकार की नाकामी के बाद तीन साल के भीतर ही 1980 में सत्ता वापस लौट आईं थीं, अगर वो शर्म-निरेपक्षता का दौर होता तो कहा जाता कि जनता ने इमरजेंसी के पक्ष में जनादेश दिया है, लेकिन ऐसा करने की हिमाक़त कांग्रेस ने नहीं की, अब का कोई भरोसा नहीं.

नीरव मोदी को सहज भाव से 'स्मार्ट बंदा' और विजय माल्या को 'फुल मस्ती करने वाले कूल मैन' कहने वाले आपको राह चलते रोज़ मिल जाएँगे. कामयाबी है तो सब ठीक है, गुनाह करके पकड़े न जाना स्मार्टनेस है, यही लोग जेल में होते तो कूल नहीं होते.

आरोपों की सियासी क़ीमत

पहले बेईमान आदमी के साथ कोई दिखना नहीं चाहता था, अब तो पेज-थ्री पर उनके साथ तस्वीरें न छपने पर लोग परेशान हो उठते हैं. सियासत ने समाज के इस बदले रुख़ को समझा है, यही वजह है कि शर्म-निरपेक्षता में अब जोखिम नहीं है.

भ्रष्टाचार के आरोपों की सियासी क़ीमत आख़िरी बार शायद राजीव गांधी ने चुकाई थी, जब उनकी कैबिनेट में मंत्री रहे बेदाग़ छवि वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक बड़ा आंदोलन करके बोफ़ोर्स घोटाले के आरोपों के बाद उन्हें सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.

लेकिन इसके बाद से ऐसे दाग़दार लोग अक्सर कामयाबी ही हासिल करते रहे हैं, लालू हों या सुखराम जिन्हें अदालत दोषी मान चुकी है. टेलीकॉम घोटाले के दोषी सुखराम जिनके घर से नोटों की बोरियाँ बरामद हुई थीं, उन्होंने तो इंतहा कर दी, टेलीफ़ोन छाप चुनाव चिन्ह पर निर्दलीय लड़े और जीत भी गए.

शर्म-निरपेक्षता का चक्र

यही वजह है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में गले तक डूबे पश्चिम बंगाल के मुकुल रॉय या हिमाचल के सुखराम को माला पहनाकर पार्टी में शामिल करने में या अवैध खनन से अरबों कमाने वाले रेड्डी बंधुओं की मदद लेने में बीजेपी को कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई क्योंकि देश की जनता भ्रष्टाचार को शर्मनाक नहीं, कामयाबी का मूलमंत्र मानने लगी है.

बीजेपी के लिए ये आसान इसलिए भी है क्योंकि वो कलमाडी जैसे कांग्रेसियों के बीसियों के कुकर्म गिनवा सकती है, कांग्रेस भी आगे जब-जब पकड़ी जाएगी तो नीरव मोदी, विजय माल्या, राफ़ाल और व्यापमं गिनवाएगी.

शर्म-निरपेक्षता का चक्र चलता रहेगा, तब तुम कहाँ थे, तब तुम क्यों नहीं बोले, ये सब आपसे पूछा जाएगा. बेहतर होगा कि आप बोलें और शर्म-निरेपक्षता को इस देश का सिद्धांत, मूल्य और आदर्श बनने से रोकें, चाहे आप शर्मनिरपेक्षता के उस्तादों के साथ हों या फिर शागिर्द के.

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