निपाह के कारण मरने से पहले नर्स का वो आख़िरी ख़त

  • 22 मई 2018
केरल, निपाह वायरस, लिनी पुथुसेरी इमेज कॉपीरइट FACEBOOK/lini.nanu

अपने अंतिम समय में कौन परिवार का साथ नहीं चाहता, लेकिन केरल की एक नर्स को ये भी नसीब न हो सका.

वो केरल में मरीजों को निपाह वायरस से बचाते-बचाते ख़ुद भी चपेट में आ गईं.

​31 साल की नर्स लिनी पुथुसेरी ने जीवन के आख़िरी वक़्त में अपने पति के नाम एक भावुक ख़त लिखा और फिर अलविदा कह गईं.

लिनी के प्रति संवदेना व्यक्त करते हुए केरल के पर्यटन मंत्री ने उनका ख़त फ़ेसबुक पर शेयर किया. इसके बाद ये ख़त वायरल हो गया और लोग लिनी के सेवाभाव को सराहने लगे.

लिनी ने अपने ख़त में लिखा था, ''मुझे नहीं लगता कि अब मैं तुम्हें देख पाऊंगी. हमारे बच्चों की देखभाल करना. तुम्हें उन्हें अपने साथ खाड़ी देश में ले जाना चाहिए. उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए. बहुत सारे प्यार के साथ.''

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Image caption लिनी अपने पति सजीश के साथ

लिनी कोझीकोड में पेरमबरा अस्पताल में उस टीम का हिस्सा थीं जो निपाह वायरस के पहले मरीज़ का इलाज कर रही थीं. इस दौरान वो भी इस वायरस की चपेट में आ गईं हो गईं.

जब उन्हें पता चला कि अब उनकी जान नहीं बच सकती तो उन्होंने एक कड़ा फ़ैसला किया. उन्होंने अपने पति और दो छोटे-छोटे बच्चों को ख़ुद से दूरा रखा और आख़िरी वक़्त तक उनसे नहीं मिलीं.

यहां तक कि लिनी की अंत्येष्टि में भी उनका ​परिवार शामिल नहीं हो सका. लिनी के ​पति सजीश बहरीन में काम करते हैं.

लिनी का ख़त सामने आने के बाद केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा कि नर्स लिनी की निस्वार्थ सेवा हमेशा याद की जाएगी.

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निपाह वायरस का ख़तरा

केरल में निपाह वायरस का ख़तरा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है. अब तक 12 लोग इस वायरस की चपेट में आ चुके हैं जिसमें से 10 की जान चुकी है और दो का इलाज चल रहा है.

हाल ही में कोझीकोड में इससे एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई थी.

बताया जा रहा है कि ये वायरस जानवरों से फैला है और ये इंसानों से इंसानों में भी फैल सकता है.

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Image caption लिनी अपने पति सजीश के साथ

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक़ निपाह वायरस (NiV) तेज़ी से उभरता वायरस है, जो जानवरों और इंसानों में गंभीर बीमारी को जन्म देता है.

निपाह के बारे में सबसे पहले 1998 में मलेशिया के कम्पंग सुंगाई निपाह से पता चला था. वहीं से इस वायरस को ये नाम मिला. उस वक़्त इस बीमारी के वाहक सूअर बनते थे.

लेकिन इसके बाद जहां-जहां निपाह के बारे में पता चला, इस वायरस को लाने-ले जाने वाले कोई माध्यम नहीं थे. साल 2004 में बांग्लादेश में कुछ लोग इस वायरस की चपेट में आए.

इन लोगों ने खजूर के पेड़ से निकलने वाले तरल को चखा था और इस तरल तक वायरस को ले जाने वाले चमगादड़ थे, जिन्हें फ्रूट बैट कहा जाता है.

सेंटर फ़ॉर डिज़िज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक़ निपाह वायरस का इंफ़ेक्शन एंसेफ़्लाइटिस से जुड़ा है, जिसमें दिमाग़ को नुक़सान होता है.

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बीमारी के लक्षण

इस बीमारी से ग्रस्त होने पर सिरदर्द, धुंधला दिखना, बुखार और सांस लेने में दिक़्क़त होती है.

ये लक्षण 24-48 घंटों में मरीज़ को कोमा में पहुंचा सकते हैं. इंफ़ेक्शन के शुरुआती दौर में सांस लेने में समस्या होती है जबकि आधे मरीज़ों में न्यूरोलॉजिकल दिक्कतें भी होती हैं.

साल 1998-99 में जब ये बीमारी फैली थी तो इस वायरस की चपेट में 265 लोग आए थे. अस्पतालों में भर्ती हुए इनमें से क़रीब 40% मरीज़ ऐसे थे जिन्हें गंभीर नर्वस बीमारी हुई थी और ये बच नहीं पाए थे.

आम तौर पर ये वायरस इंसानों में इंफेक्शन की चपेट में आने वाली चमगादड़ों, सूअरों या फिर दूसरे इंसानों से फैलता है.

मलेशिया और सिंगापुर में इसके सूअरों के ज़रिए फैलने की जानकारी मिली थी जबकि भारत और बांग्लादेश में इंसान से इंसान का संपर्क होने पर इसकी चपेट में आने का ख़तरा ज़्यादा रहता है.

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