नज़रिया: मोदी के ख़िलाफ़ बन रहे महागठबंधन की परीक्षा बाकी है

  • 24 मई 2018
कर्नाटक इमेज कॉपीरइट Reuters

तकरीबन 40-41 साल पहले की बात है.

1977 की जनता लहर से बुरी तरह पस्त कांग्रेस की मोहसिना किदवई ने जब उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ और फिर इंदिरा गांधी ने कर्नाटक के चिकमगलूर के संसदीय उपचुनाव जीत लिए तो उत्साहित कांग्रेसियों ने एक नारा लगाया था, ''आजमगढ़ से चिकमगलूर, अब नहीं है दिल्ली दूर.''

कांग्रेस और जनता दल (एस) की साझा सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में जुटे गैर भाजपा- गैर-एनडीए नेताओं की मौजूदगी से उत्साहित एक कांग्रेसी नेता की प्रतिक्रिया थी, 'अजमेर अलवर से बंगलूर, अब नहीं है दिल्ली दूर.'

यह बात इस कांग्रेसी नेता की खामखयाली भी लग सकती है क्योंकि पिछले 40-41 वर्षों में देश की राजनीतिक स्थितियां काफी बदल चुकी हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कांग्रेस के पास नहीं हैं इंदिरा गांधी

इस समय कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी जैसी कोई कद्दावर नेता नहीं है और न ही कोई ठोस संगठन जबकि इसके सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालार अमित शाह के नेतृत्व में सत्तारूढ़ भाजपा-एनडीए है जो पिछले चार वर्षों में कुछ अपवादों को छोड़कर, एक-एक करके कांग्रेस शासित राज्यों को अपनी झोली में डालता जा रहा है.

20-21 राज्यों में आज भाजपा या उसके नेतृत्व वाले एनडीए के किसी साझीदार की सरकारें हैं. कांग्रेस के पास केवल पंजाब, पुडुचेरि और मिजोरम की सरकारें ही रह गई हैं.

ऐसे में कर्नाटक में जनता दल (एस) के साथ बनी सरकार ने पस्तहाल कांग्रेस को भरपूर राजनीतिक आक्सीजन दी है. इससे पहले भी गुजरात विधानसभा के चुनाव में 'अच्छे प्रदर्शन' और गोरखपुर और फूलपूर जैसे कई संसदीय उपचुनावों में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के उम्मीदवारों की जीत ने उन्हें नई ऊर्जा दी है.

इमेज कॉपीरइट Twitter/INCINDIA

मोदी-शाह की जोड़ी

लेकिन जनता दल (एस) के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और कांग्रेस के उप-मुख्यमंत्री जी परमेश्वर के शपथ-ग्रहण समारोह में कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग सभी गैर भाजपा-गैर राजग नेताओं का उत्साहित जमावड़ा दिखाई दिया. इसमें कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और तीसरे मोर्चे के बड़े नेता, मुख्यमंत्री शामिल थे.

इस जमावड़े को देखकर लगा कि 2019 के आम चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी को विपक्ष की तगड़ी चुनौती मिलने वाली है. शपथ ग्रहण समारोह विपक्ष का राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन ही था और ख़ुद को अजेय समझने वाली मोदी-शाह के सामने ताल ठोककर मैदान में उतरने के इरादे का इज़हार भी.

कुमारस्वामी और उनके पिता 85 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की अगवानी में वहां यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, कर्नाटक के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, डी शिव कुमार, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा की अध्यक्ष मायावती, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और एनसीपी के नेता शरद पवार वहाँ मौजूद थे.

इमेज कॉपीरइट Twitter/INCINDIA

लेकिन केसीआर नहीं आए

इनके अलावा आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव, लोकतांत्रिक जनता दल के शरद यादव, झामुमो के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, झारखंड के एक और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजित सिंह, माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी, भाकपा के सचिव डी राजा, केरल के माकपाई मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पहुँचे.

तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष, मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव एक दिन पहले ही देवेगौड़ा और कुमारस्वामी से मिलकर 'अपरिहार्य कारणों से' आज के समारोह में शमिल नहीं हो पाने का अफसोस जता गए थे.

यूपीए के एक प्रमुख घटक द्रविड़ मुनेत्र कझगम के नेता एमके स्टालिन भी तमिलनाडु के तूतिकोरिन में हुए गोलीकांड की वजह से नहीं पहुँच सके क्योंकि वे वहाँ गए हुए थे.

इमेज कॉपीरइट Twitter/INCINDIA

विपक्षी नेताओं में अजब कैमिस्ट्री

फिल्म अभिनेता से नेता बनने की दिशा में सक्रिय कमल हासन भी तूतिकारिन में ही थे. नेशनल कान्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला भी नहीं दिखे. कारण रमजान और कश्मीर के हालात भी हो सकते हैं. लेकिन कांग्रेस के पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और मिजोरम के ललथनहवला भी नहीं दिखे.

ओडिसा के मुख्यमंत्री एवं बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक भी नहीं आए. संभवतः वह अभी अपनी राजनीतिक दिशा तय नहीं कर पा रहे हैं हालांकि पिछले दिनों उन्होंने भी तीसरे मोर्चे को मजबूत करने पर बल दिया था.

लेकिन शपथ ग्रहण समारोह के इस अवसर पर बेंगलुरु में विपक्ष के नेताओं की आपसी केमिस्ट्री भी गजब की दिखी. सबसे पहले पहुंचे अखिलेश यादव के साथ मायावती की करीबी साफ दिख रही थी. वहीं सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ भी मायावती और अखिलेश के बीच अलग तरह की केमिस्ट्री बनती दिखी.

इमेज कॉपीरइट Twitter/INCINDIA

यूपीए और तीसरे मोर्चे का राजनीतिक संगम

जिस तरह से सोनिया गांधी और मायावती ने एक दूसरे के कंधे और कमर में हाथ डालकर अपनापन दिखाने की कोशिश की वह भविष्य की विपक्षी राजनीति का एक अलग संकेत दे रहा था.

बीमार चल रहे आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी ने सोनिया गांधी से लेकर देवेगौड़ा, मायावती और ममता बनर्जी के आगे झुककर उनका आशीर्वाद लिया.

एक समय ऐसा भी लगा कि यूपीए और गैर-एनडीए, गैर-कांग्रेसी विपक्ष यानी तीसरे मोर्चे की बात करने वाली ममता बनर्जी मंच पर अलग-अलग दिख रही हैं, इसे महसूस करके देवेगौड़ा और सोनिया गांधी ने उनके साथ तस्वीरें खिंचवाई और फिर माहौल सहज हो गया.

फिर तो हाल ही में एनडीए से टूटे चंद्रबाबू नायडू और अरविंद केजरीवाल तथा येचुरी, राजा विपक्ष के सभी सूरमाओं के हाथ उठाकर ग्रुप फोटो खिंचवाए गए. यूपीए और तीसरे मोर्चे का राजनीतिक संगम दिखाने की कोशिश की गई.

इमेज कॉपीरइट Twiter/INCINDIA

कब तक रहेगी ये एकजुटता

यक्षप्रश्न यही है कि बेंगलुरु में दिखी विपक्षी नेताओं की यह एकजुटता कब तक बनी रहेगी और इसका नेतृत्व कौन करेगा.

एक प्रश्न के जवाब में राहुल गांधी ने यह कहा था कि कांग्रेस को बहुमत मिलने की स्थिति में वह प्रधानमंत्री बनने को तैयार हैं, इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ममता बनर्जी ने कहा था कि जरूरी नहीं कि किसी एक व्यक्ति को सामने रखकर ही विपक्ष लोकसभा का अगला चुनाव लडे. वह गाहे-बगाहे गैर भाजपा, गैर कांग्रेसी दलों, खास तौर से क्षेत्रीय दलों का अलग विपक्षी गठबंधन बनाने पर जोर देती रहती हैं.

हालांकि, कभी कांग्रेस समर्थित तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री रह चुके एचडी देवेगौड़ा ने बेंगलुरु में कहा कि कांग्रेस के बिना भाजपा विरोधी महागठबंधन की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस किसके साथ गठबंधन करेगी, वाम दलों के साथ या ममता बनर्जी की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के साथ.

क्या यह संभव हो पाएगा कि ये तीनों ही राजनीतिक ताकतें वहां भाजपा के विरोध में एकजुट हो महागठबंधन बना सकें. ओडिशा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को भी तय करना होगा कि उन्हें भाजपा से लड़ना है कि कांग्रेस से. कांग्रेस को भी इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जल्द होगी विपक्षी एकता की परीक्षा

विपक्षी एकता की एक कसौटी तो अगले कुछ महीनों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के विधानसभा चुनावों में दिखेगी जब यह तय होगा कि वहाँ मज़बूत कांग्रेस कुछ हिस्सों में जनाधार रखने वाली सपा-बसपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए कुछ सीटें छोड़ने को तैयार होती है कि नहीं.

इन सबसे बड़ी चुनौती तो कर्नाटक में भी कांग्रेस और जनता दल (एस) की साझा सरकार की स्थिरता को लेकर सामने आएगी. खंडित जनादेश के बीच सोनिया गांधी की राजनीतिक परिपक्वता और दोनों दलों की एकजुटता से राजनीतिक मात खाई बीजेपी आसानी से हार नहीं मानने वाली.

साम-दाम-दंड-भेद के जरिए सत्ता हासिल करने को तत्पर भाजपा सत्ता हाथ से निकलने के बाद बाद चैन से चुपचाप बैठकर पांच साल इंतजार करेगी? यह सोचना भी गलत होगा. भाजपा के चोटिल 'मैनेजर्स' को इस हार की कसक बदला लेने के लिए उकसाएगी.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
कर्नाटक: कहीं खुशी, कहीं ग़ुस्सा

बीजेपी को दगा दे गए कर्नाटक के नतीजे

उसकी कोशिश इस साझा सरकार में सेंध लगाकर इसे विश्वासमत हासिल करने में विफल करने की हो सकती है. इसके रणनीतिकार अपने काम में लगे हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा भी है कि कांग्रेस और जनता दल अपने विधायकों को छुट्टा खोलकर तो देखे!

भाजपा की निगाहें मंत्रिमंडल विस्तार के बाद दोनों दलों के विधायकों के बीच संभावित असंतोष पर टिकी हैं. और अभी तो विधायक चुन लिए जाने के कारण भाजपा के सांसदों-येदियुरप्पा और बी श्रीरामुलु के त्यागपत्र से खाली हुई लोकसभा की दो सीटों के लिए उपचुनाव भी होने हैं.

भाजपा को लगा था कि कर्नाटक में भी जीत का सिलसिला जारी रखते हुए वह 2019 में विपक्ष की चुनौती को यह कहते हुए भोथरा साबित कर सकेगी कि उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम हर जगह देश की जनता नरेंद्र मोदी को ही राज करते देखना चाहती है और उसका कोई विकल्प नहीं है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
क्या कर्नाटक में धार्मिक मठ राजनीतिक भविष्य तय करेंगे?

बहुमत का जुगाड़

दूसरी तरफ, गुजरात में सत्ता के करीब पहुंचते-पहुँचते रह गई कांग्रेस को भी लगता था कि कर्नाटक की जीत के बाद नई राजनीतिक ऊर्जा से लबरेज होकर वह राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में भी भाजपा को हराकर वह 2019 के लिए खुद को खड़ा कर सकेगी.

लेकिन कर्नाटक का जनादेश दोनों को ही दगा दे गया. 222 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा बहुमत के लिए जरूरी 112 के आंकड़े से पीछे रह गई, कांग्रेस को भी केवल 78 सीटें ही मिल सकीं जबकि जनता दल (एस) और बसपा के गठबंधन को 38 सीटें मिलीं. दो सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं.

साल 2013 के मुक़ाबले कांग्रेस को भारी नुक़सान उठाना पड़ा. नाटकीय घटनाक्रम और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप के बाद बहुमत का जुगाड़ नहीं होते देख, दो बार पहले भी मुख्यमंत्री रह चुके येदियुरप्पा को 55 घंटों के भीतर ही त्यागपत्र देना पड़ गया हालांकि सदन में दिए अपने भावुक भाषण में उन्होंने शीघ्र लौटने के संकेत भी दिए.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कांग्रेस को मिला एक मजबूत सहयोगी

कर्नाटक के खंडित जनादेश ने 2019 के आम चुनाव के लिए विपक्ष की चुनौती को दमदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. कांग्रेस को अगर अपने बूते कर्नाटक में बहुमत मिल जाता तो उसके सुनहरे अतीत का अहंकार विपक्ष की एकजुटता की राह में बाधक बन सकता था.

कांग्रेस में एक बड़ा तबका चुनावों में कांग्रेस के 'एकला चलो' की रणनीति की वकालत करता रहता है. कांग्रेस के इसी अहंकार ने कर्नाटक में जनता दल (एस) के साथ, गुजरात में एनसीपी के साथ और असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ भी किसी तरह का चुनावी गठबंधन अथवा सीटों का तालमेल नहीं होने दिया था.

दरअसल, कर्नाटक में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की चुनावी रणनीति को 'ओवर-एस्टिमेटट किया जबकि देवेगौड़ा परिवार की राजनीतिक ताकत को कम आँका. देवेगौड़ा परिवार के जनाधार वाले इलाकों में दलित और अल्पसंख्यक मतों का कांग्रेस और जनता दल (एस) के बीच विभाजन हुआ.

इमेज कॉपीरइट Twitter/INCINDIA

लेना होगा गलतियों से सबक

यह भी एक कारण है कि 38 फीसदी मत हासिल करके भी कांग्रेस 78 सीटें ही जीत सकी जबकि भाजपा 36 फीसदी मत प्राप्त करके भी 104 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकी. अगर कांग्रेस और जनता दल (एस) और बसपा तालमेल से चुनाव लड़ते तो क्या होता!

इस खंडित जनादेश के कारण कांग्रेस की अकड़ कुछ ढीली पड़ी और बेंगलुरु में विपक्षी महागठबंधन का एक अक्स उभरता दिखा.

कांग्रेस के लिए सबसे अच्छी बात यह हो सकती है कि उसे दक्षिण भारत के कर्नाटक में जनता दल (एस) के रूप में एक महत्वपूर्ण सहयोगी मिला है, अगर गठबंधन जारी रहा तो लोकसभा चुनाव में दोनों दल राज्य की कुल 28 सीटों में से काफ़ी सीटें जीत सकते हैं.

हालांकि कांग्रेस और देवेगौड़ा के बीच अतीत के संबंध बहुत ज्यादा मधुर और भरोसेमंद नहीं रहे हैं. कांग्रेस के सहयोग से तीसरे 'संयुक्त मोर्चे' के प्रधानमंत्री बने देवेगौड़ा की सरकार से कांग्रेस के समर्थन वापस ले लेने के कारण उनकी सरकार गिर गई थी.

इमेज कॉपीरइट Twitter/INCINDIA

राजनीतिक घटनाक्रम

और फिर एचडी कुमारस्वामी पहले भी भाजपा के साथ सरकार साझा कर चुके हैं इसलिए भी इस साझा सरकार को अतीत की गलतियों से सबक लेकर ही आगे बढ़ना होगा. अगर इनका यह गठबंधन कारगर रहा और सरकार चलती रही तो आंध्र प्रदेश-तेलंगाना में भी कांग्रेस टीडीपी और टीआरएस के साथ किसी तरह के रणनीतिक गठबंधन या तालमेल से खेल बदल सकती है.

लेकिन कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम ने भाजपा और उसे संचालित करनेवाले आरएसएस को चुनावी रणनीति पर नए सिरे से विचार करने पर विवश किया है. मोदी-शाह के प्रशंसक शायद इस बात को न मानें लेकिन मतदाताओं पर उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है. कर्नाटक में इससे पहले भी भाजपा येदियुरप्पा के नेतृत्व में 110 सीटें जीत चुकी थी.

इस बार तो 104 पर ही सिमट गई. एनडीए और भाजपा के भीतर भी असंतोष बढ़ता दिख रहा है. आंध्र में टीडीपी और बिहार में जीतनराम मांझी के 'हम' के एनडीए से अलग होने के बाद महाराष्ट्र में शिव सेना, बिहार में रालोसपा और कई अन्य राज्यों में भी एनडीए के घटक दलों में बेचैनी बढ़ रही है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए