नज़रियाः टीवी चैनलों के निशाने पर क्यों आए दिल्ली के आर्च बिशप

  • 26 मई 2018
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एक कैथोलिक बिशप को उनके कार्यक्षेत्र में द ऑर्डनेरी के नाम से भी जाना जाता है और उनके संवाद आमतौर पर अन्य पादरियों और अनुयायियों के अलावा बाहर तक कम ही पहुंचते हैं.

आमतौर पर ये विशेष मौक़ों पर प्रार्थना का आह्वान या जश्न की घोषणा या फिर किसी वर्षगांठ का ऐलान होते हैं. या फिर किसी भी व्यवस्थित धर्म के लिए ज़रूरी अस्थायी प्रशासनिक घोषणाएं ही होती हैं. उन्हें चर्चों या कान्वेंटों के बुलेटिन बोर्ड पर लगाया जाता है जहां वो धूल खाते रहते हैं और अंततः कूड़े में पहुंच जाते हैं.

हल्के से दिखने वाले अनिल जोसेफ़ कूटो धर्मशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और दिल्ली के आर्च बिशप हैं. उनका समूह तब चौंक गया जब उनका 8 मई को लिखा एक पत्र राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ बन गया और पत्रकार दिल्ली के सेकरेड हॉर्ट कैथेड्रल के चक्कर काटने लगे.

न्यूज़ एंकर चिल्लाने लगे कि वो रोम और वेटिकन के आदेश पर 'फ़तवा' दे रहे हैं. जब ये एंकर इटली शब्द का इस्तेमाल नहीं करते तो वेटिकन या रोम ही कहते हैं.

पाकिस्तान के बाद इटली भारतीय टीवी चैनलों की डिबेट में इस्तेमाल किया जाने वाला दूसरा पसंदीदा देश है जिसका नाम आते ही इटली में पैदा हुईं कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और दिल्ली में पैदा हुए उनके बेटे और कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम ज़हन में आ जाता है.

चुनावों के समय में दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम के किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में दिए गए बयानों को भी 'फ़तवा' ही कहा जाता रहा है. भले ही कोई मुसलमान उनकी बात न मानता हो लेकिन उनके बयान मीडिया में शोर तो पैदा करते ही हैं.

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'अशांत समय' और 'एक नई सरकार'

लेकिन बिशप अनिल ने अपने समूह को जो पत्र लिखा उसमें ऐसा कोई निर्देश नहीं था. वेटिकन के पोप के हाल के सालों में ओरिएंटल कैथोलिक चर्चों के नए स्वतंत्र चर्च स्थापित करने के बाद साइरो मालाबार और साइरो मालंकरा कैथोलिक चर्च के अलग होने के बाद दिल्ली के कैथोलिक चर्च का आकार बहुत हद तक छोटा हो गया है.

आर्च बिशप के लातिन-संस्कार वाले इस चर्च से अब मध्य भारत, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत और देश के अन्य हिस्सों से आए प्रवासी ही ज़्यादा जुड़े हैं जिनकी तादाद अधिकतम डेढ़ लाख है.

बिशप अनिल ने सिर्फ़ अपने पादरियों से देश के लिए प्रार्थना करने के लिए कहा था 'जो अशांत राजनीतिक माहौल से गुज़र रहा है जिससे हमारे संवैधानिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों और देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को ख़तरा पैदा हो रहा है.'

उन्होंने पादरियों से 'हर शुक्रवार को उपवास रखने और कम से कम एक समय का भोजन छोड़कर तपस्या और बलिदान करने के लिए कहा ताकि हमारा और देश का आध्यात्मिक नवीकरण हो सके.'

लेकिन जैसा कि ख़बर के लिए भूख़े पत्रकारों ने कहा उनका संदेश इस लाइन में था, 'जैसा कि हम आगे देखते हैं कि 2019 चुनावों में जब हमें एक नई सरकार मिलेगी, आओ हम सब मिलकर देश के लिए 13 मई से एक प्रार्थना अभियान शुरू करें,' जो हमारी लेडी ऑफ़ फ़ातिमा के प्रकट होने की वर्षगांठ भी है.

'अशांत समय' और 'एक नई सरकार' और 'उपवास और प्रार्थना' जैसे शब्द टीवी एंकरों, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं की नज़र में विस्फोटक मिश्रण है. वो इसे नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए वेटिकन के षड्यंत्र के रूप में देखते हैं.

हर चुनाव के बाद नई सरकार आती है भले ही नेता पुराने हों, जैसे तर्क भी पार्टी के वफ़ादारों और मीडिया को शांत नहीं कर सके. ना ही ये तथ्य की हर बार चुनावों से पहले आमतौर पर धर्मगुरु प्रार्थना पत्र या प्रेस में बयान जारी कर लोगों से अपनी लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी को निभाते हुए ईमानदार और अच्छे लोगों को अधिक संख्या में वोट देने की अपील करते हैं.

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भारतीय चर्च राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं

इससे पहले गोवा के बिशप के ईमानदार सरकार के लिए वोट करने के आह्वान के बाद राज्य में भाजपा की सरकार बनी क्योंकि लोग कांग्रेस को भ्रष्ट पार्टी के रूप में देख रहे थे. दिल्ली में चर्च ने ईमानदार और सत्यनिष्ठ नेतृत्व चुनने का आह्वान किया था. उस समय अरविंद केजरीवाल की सरकार बनी.

2014 आम चुनावों में कई जगह कैथोलिक बिशपों, पादरियों और अनुयायियों ने नरेंद्र मोदी के सुशासन और नौकरियां देने के वादे को ही दोहराया. बेरोज़गारी और योग्यता से कम रोज़गार ईसाई समुदाय के लिए एक बड़ा मुद्दा है.

अल्पावधि में टीवी पर उठे तूफ़ान ने लोगों के ध्यान को तमिलनाडु के तूतीकोरिन से दूर रखा जहां स्थानीय लोग, जिनमें से बहुत से कैथोलिक हैं, ब्रितानी कंपनी वेदांता के स्वामित्व वाले स्टरलाइट प्लांट के विस्तार का विरोध कर रहे थे. पुलिस की गोलीबारी में मारे गए कई कैथोलिक ही थे.

इस विवाद ने भारतीय जनता पार्टी और उसके मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को कांग्रेस पर हमला करने के लिए 48 घंटों तक अभियान चलाने का मौका दे दिया. बिशप का पत्र वो बारूद बन गया जिसकी उन्हें तलाश थी.

चर्च की जमकर आलोचना की गई. आरोप लगाया गया कि चर्च कांग्रेस के सिपाही के रूप में काम कर रहा है और रोमन फंड से धर्म-परिवर्तन का एजेंडा चला रहा है और राजनीतिक रूप से संवेदनशील पूर्वोत्तर के विनाश की योजना पर काम कर रहा है.

बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा और आरएसएस प्रवक्ता राकेश सिन्हा ने कहा कि चर्च ग़ुस्सा है क्योंकि मोदी सरकार ने विदेशी योगदान विनियमन यानी एफ़सीआरए के नियम संख्त कर विदेशी फंडिंग बंद कर दी है.

विदेशी संस्थानों से चंदा लेने पर बनाए गए नए नियमों ने चर्च को प्रभावित तो किया है लेकिन इससे मानवाधाकिर संगठन या विकास के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ अधिक प्रभावित हैं जो बच्चों या पिछड़े समूहों के लिए काम करते हैं. मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत ने कहा है कि ये अंतरराष्ट्रीय नियमों का घोर उल्लंघन हैं.

इस विवाद का एक दुखद परिणाम ये है कि इससे बेहद छोटे आकार वाले भारतीय चर्च की कमज़ोरियों और दरारें सामने आ गई हैं. भारतीय चर्च राजनीतिक रूप से बहुत सक्रिय नहीं है और ये कुछ तयशुदा वार्ताओं के अलावा समाज और अन्य धार्मिक समूहों से दूर ही रहता है.

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फिर मीडिया से बिशप अनिल ने क्या कहा?

आमतौर पर किसी भी बिशप के राजनीतिक सलाहकार नहीं होते हैं और बहुत कम के पास ही मीडिया प्रभारी होते हैं जो क्रिसमस या विशेष आयोजनों के प्रेसनोट तैयार करते हैं. लेकिन सभी बिशप पारंपरिक रूप से सभी राजनीतिक दलों के नेताओं और वरिष्ठ सिविल और पुलिस अधिकारियों से अच्छे रिश्ते रखते हैं.

ये उस समुदाय के लिए समझा ही जा सकता है जो देश की आबादी का सिर्फ़ 2.3 प्रतिशत है और जिसके पास अपने कोई साधन नहीं हैं. चर्च का इतना राजनीतिक प्रभाव भी नहीं होता जो ज़रूरत पड़ने पर प्रशासन या नेताओं से उसे बचा सके.

कई वरिष्ठ ईसाई और नागरिक समुदायों से जुड़े नेता अन्य वरिष्ठ चर्च नेताओं के स्वयं को आर्च बिशप अनिल से दूर करने के लेकर भी परेशान हैं. आर्च बिशप अनिल के ख़िलाफ़ बोलने के लिए टीवी पर एक ऐसे ऑर्थोडॉक्स बिशपों को जगह दी गई जो इस चर्च के साथ क़ानूनी लड़ाई में उलझे हैं और सरकार से मदद चाह रहे हैं. बीजेपी के कई ईसाई सदस्यों, जिनमें पर्यटन मंत्री केजे अलफोंस भी शामिल हैं, भी बिशप अनिल पर हमला करने में शामिल हो गए.

बिशप ने अपनी क्षमता दिखाई, भले ही उनके कुछ सहकर्मियों ने ही उनसे पल्ला झाड़ लिया, एक तो नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करते हुए नज़र आए. बिशप अनिल कूटो ने अपने लिए बहुत सम्मान कमाया है जो उनके अपने प्रशासनिक क्षेत्र और अपने अनुयायियों से कहीं बढ़कर है और अन्य धर्मसमूह के नेता और मानवाधिकार समूह उनका बहुत आदर करते हैं.

पटना में एक चर्च से जुड़ी बैठक में हिस्सा लेने पहुंच बिशप अनिल के पीछे जब मीडिया पड़ी तो उन्होंने कहा, 'जो हो रहा है उसे कोई नागरिक नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता, भीड़ के हाथों लोग मारे जा रहे हैं, दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा हो रही है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं.'

रिकॉर्ड के लिए बता दें कि सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि 2017 के बाद से धार्मिक आधार पर हुई हिंसा की 822 घटनाओं में 11 लोग मारे गए हैं. इसी साल भारत में दलित और मुसलमान लोगों के कथित स्वघोषित गौरक्षकों की भीड़ के हाथों मारे जाने का सिलसिला शुरू हुआ था.

बिशप अनिल ने ये नहीं कहा कि अगर मुसलमान और दलित सुरक्षित नहीं है तो ईसाई भी सुरक्षित महसूस नहीं कर सकते. लेकिन हममें से बहुत से लोग ऐसा कहते हैं.

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