ग्राउंड रिपोर्ट: मुसलमानों की यादों में अब भी कफ़न और दफ़न

  • 26 मई 2018
मुज़फ्फ़रनगर
Image caption अपने अम्मी अब्बू के साथ बैठे लियाक़त (सबसे दाईं तरफ) ने दंगों में अपना एक पैर खो दिया

आज भी अपने परिजनों की दर्दनाक हत्याओं को ताज़ा ज़ख़्म की तरह अपने सीनों में लेकर जी रहे दंगा पीड़ितों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि उनके परिजनों की हत्याएं क्यों की गईं? आख़िर क्यों मुक़दमे वापस लेकर उनसे इंसाफ़ की आखिरी उम्मीदें भी छीनी जा रही हैं.

दलितों और मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर बीबीसी की स्पेशल सीरिज़ के लिए जब हम मुज़फ़्फ़नगर और शामली के उन दंगा पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे जिनके परिजनों की जान लेने वालों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुक़दमे वापस लिए जा रहे हैं.

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दंगा पीड़ित परिवारों के लिए क्या हैं न्याय के मायने?

उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले के लिसाड़ और लख बावड़ी गांव के विस्थापित मुसलमानों के दिलों में 'अपने घर' का ख्याल आज भी अतीत की यातनापूर्ण स्मृतियों में क़ैद है. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के दौरान हिंसा के केंद्र में रहे इन गांवों में सबसे ज़्यादा हत्याएँ हुई थीं.

दंगों के बाद बड़ी संख्या में देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन कर गए यहाँ के मुसलामानों ने आसपास के नए इलाक़ो में रहना तो शुरू कर दिया पर बड़े-बूढों के प्यार और बच्चों की खिखिलाहट से आबाद 'घर' का विचार आज उनके दिलों में दफ़न सिर्फ एक 'पुरानी याद' है.

ऐसा ही एक परिवार है कांधला में रहने वाला शमशाद और उनकी पत्नी मुन्नी का परिवार. दंगों से पहले तक लिसाड़ गाँव में रहने वाली शमशाद की माँ ज़रीफन को अपने काले-सफ़ेद घोड़ों और भैसों से बहुत प्यार था.

Image caption मुन्नी और शमशाद (पति-पत्नी) ने दंगों में अपने माँ-बाप को खो दिया

50 वर्षीय मुन्नी बताती हैं कि उनकी सास ज़रीफन और ससुर हाजी नब्बू को अपने पाले जानवरों और घर से इतना लगाव था कि दंगों के वक़्त उन्होंने जानवरों की चिंता में घर छोड़ कर जाने से इनकार कर दिया.

लिसाड़ में दंगे भड़कने के चार दिन बाद ज़रीफन की कटी हुई लाश एक नहर से बरामद हुई. हाजी नब्बू की हत्या के चशमदीद गवाह मौजूद हैं पर आज तक उनकी लाश का कोई सुराग नहीं मिल पाया है.

दंगों के बाद की त्रासदी

माता-पिता की हत्या के मुआवज़े में मिले पैसों से कांधला में बने अपने नए घर के आंगन में सर झुकाए बैठे शमशाद उदासी की तस्वीर लगते हैं. ईंट भट्ठे में काम करने से उनका चेहरा झुलस गया है.

गले में लटके गमछे से पसीना और आँसू एक साथ पूछते हुए वह कहते हैं, "सात सितंबर 2013 की रात थी. शाम से गांव में अफवाहें फैलाई जा रही थीं.

जाट कह रहे थे कि आज मुसलामानों का क़त्ल-ए-आम होगा. तभी शाम होते-होते ख़बर आई कि गाँव में अंसार जुलाहे को किसी ने चाकू मार दिया है. मेरे पास तुरंत फ़ोन पर फ़ोन आने लगे.

गाँव के सारे मुसलमान अब घर छोड़कर भागने लगे थे. सबको कहा गया था कि आज रात लिसाड़ के मुसलामानों को 'निपटा' दिया जाएगा. घर में बेटे वसीम की शादी होने वाली थी इसलिए मेरी बेटी भी अपने ससुराल से आई हुई थी.

मुझे याद है शाम को बैठे हम ये सोच ही रहे थे कि गर्मी बहुत है, आज छत पर बैठ कर खाना खाएँगे.

Image caption शमशाद दंगों में अपने माता-पिता की हत्या का मुक़दमा वापिस लेने को तैयार नहीं हैं

इतने में मालूम चला कि हम चारों तरफ से घिर चुके हैं. आस-पड़ोस में अफरा-तफरी मच गई और गाँव के सारे मुसलमान अपने घर खाली करने लगे. तब हम भी जान बचाने के लिए भागे. बच्चे कहीं भागे, औरतें कहीं भागीं, मर्द कहीं. जिसको जहां रास्ता मिला वो वहीं भाग निकला.

'न कफ़न दे सके न ठीक से दफ़न कर सके'

अगले दिन लिसाड़ से 10 किलोमीटर दूर एक कैम्प में मिले हम सब. पर अब्बू-अम्मी नहीं मिले. उन्होंने घर छोड़ा ही नहीं था.

घोड़ागाड़ी पर ईटें लदवाकर उन्हें भट्ठे से गोदाम तक पहुंचाने का काम करने वाले 80 साल के हाजी नब्बू और 75 साल की ज़रीफन को भरोसा था कि गांव के जाट उन जैसे बुज़ुर्गों को तो बख़्श देंगे.

सफ़ेद ओढ़नी से अपने आंसू पोंछते हुए मुन्नी कहते हैं, "हाजी थे हमारे सास-ससुर. उनके सात बेटे, सात बहुएँ और नाती-पोते. भरा-पूरा परिवार था पर आख़िर में हमको अपने सास-ससुर की लाशें तक देखने को न मिलीं. पता नहीं मार-काटकर कहाँ डाल दिया बूढों को! उन्हें हम न कफ़न दे सके न ठीक से दफ़न कर सके... ये बात हम पर कितना बड़ा अज़ाब है हम क्या बताएं आपको?"

Image caption अपने सास ससुर को आख़िरी बार ना देख पाने की टीस आज भी मुन्नी के दिल में उठती रहती है

शमशाद याद करते हैं, "उस रात हम सबने अम्मी-अब्बू को कहा कि चलें हमारे साथ पर अम्मी कहने लगी कि तुम लोग जाओ. ये तो हमारा गाँव है. जिंदगी गुज़ार दी यहाँ...कौन मारेगा हम बूढों को इस गांव में. डंगरों (घोड़े-भैंस) और घर की चिंता भी अम्मी को खाए जा रही थी. मुझसे बोली कि अगर वो चली गईं तो सुबह डंगरों का चारा-पानी कौन करेगा. वो भूख से गिरके मर जाएंगे. हम लोग अपनी जान बचाकर भागे और अम्मी-अब्बू पीछे ही रह गए घर में."

'अम्मी की लाश नहीं दी'

शमशाद ने बताया, "फिर अगली सुबह हमारे घर के दो लड़के गए अम्मी-अब्बू को देखने. जैसे ही वो पहुँचे उन्होंने देखा कि अम्मी-अब्बू ज़िंदा हैं पर घर के पास ही रहने वाले कासिम दर्ज़ी के घर में दंगाई आग लगा रहे थे. फिर वो हमारे घर की तरफ बढ़े. लड़के तो भाग निकले और गाँव के पास ही गन्ने के खेतों में छिपकर अपनी जान बचाई.''

उन्होंने कहा, ''अम्मी-अब्बू भी पीछे-पीछे दौड़ते हुए निकले पर वो बूढ़े थे इसलिए तेज़ नहीं दौड़ पाए. गाँव के दंगाइयों ने उनको पकड़ लिया और काट डाला. बाद में हमने बहुत ढूँढा पर लाश तक न मिली. चार दिन बाद थाने से ख़बर आई कि अम्मी की कटी हुई लाश नहर से बरामद हुई है. थाने वालों ने हमको सिर्फ़ जानकारी दी. अम्मी की लाश नहीं दी. अब्बू का तो आज तक कुछ पता नहीं चला".

Image caption दंगों में जल चुके अपने पुश्तैनी घर की याद आज भी शमशाद को खौलाती है

शमशाद के माता-पिता की हत्या का मामला मुज़फ़्फ़नगर के फ़ुगाना थाने में दर्ज है.

इस मामले में लिसाड़ गांव के ही 22 हिंदुओं पर मुक़दमा दर्ज है. शमशाद के माता-पिता की हत्या का मुक़दमा भी उन 131 मामलों में शामिल है जिन्हें वापस लेने की प्रक्रिया उत्तर प्रदेश सरकार शुरू कर चुकी है.

'कैसे लें मुक़दमा वापस?'

शमशाद कहते हैं, "जिनके घर में दो-दो आदमी मरे, वो कैसे मुक़दमा वपास ले लेंगे? हम पर भी दबाव आया. पैसे का लालच दिया गया, जान की धमकियाँ मिलीं. फिर भी हम कैसे मुकदमा जाने देंगे? हमारे अपने हमारे सामने क़त्ल हो गए. हम कैसे ले लेंगे मुक़दमा वापस? वो कहते हैं कि पुरानी बातों को दिमाग़ से हटा दो. मैंने कहता हूँ मेरी तो जिस ज़मीन और घर की पैदाइश थी, वही घर हट गया मेरे पैरों के नीचे से!"

लिसाड़ में जल चुके आपने पुश्तैनी घर की याद आज भी शमशाद को बहुत सताती है. वे कहते हैं,"बेटे की शादी के लिए पूरा घर दोबारा नया बनवाया था. लिंटर डलवाकर नए कमरे बनवाए थे. नया फर्श बनवाया था. अम्मी की मर्ज़ी थी कि पोते की शादी से पहले घर में मरम्मत करवाकर ही हो. 12-15 लाख रुपए लगाए थे घर में और एक रात भी नहीं सो पाए. हमारा तो सब कुछ लुट गया. हम कैसे वापस ले लेंगे मुक़दमा?"

Image caption कांधला में बसी हमज़ा कालोनी

इंसाफ़ की धुंधलाती उम्मीद

शामली ज़िले के कैराना वॉर्ड नंबर-8 में हमारी मुलाक़ात 40 वर्षीय लियाक़त ख़ान से होती है.

मूलतः शामली के लख बावड़ी गांव में रहने वाले लियाक़त दंगों के बाद से कैराना में आ बसे. लख बावड़ी के लियाक़त ने दंगों में अपने एक पैर के साथ-साथ अपना आत्मविश्वास भी खो दिया है.

सितंबर 2013 की उस रात को याद करते हुए आज भी लियाक़त की आँखें छलछला जाती हैं.

"उस दिन जैसे ही गाँव में बात फैली कि हमें मार दिया जाएगा तो हमारे मोहल्ले के सारे मुसलमान घरों के लोग मेरे घर आकर इकठ्ठा हो गए. हम सब डरे बैठे हुए थे की अचानक दरवाज़े पर हमला हो गया. हमारे साथ मोहल्ले का ही दिलशाद था, इकरा नाम की छोटी सी बच्ची थी, बच्ची की माँ सीधो थी, सबको तबल और गंडासों से मार दिया गया. मुझे भी काटा गया. पहले उन्होंने तबल से मेरा पेट काटा, फिर तलवार से मेरी टांग काटी, फिर हाथों पर वार किए."

'मैं कभी मुक़दमा वापस नहीं लूँगा'

लियाकत की आपबीती सुनकर पास ही बैठे उनके पिता मक़सूद और मां सीधो ख़ामोशी से रोने लगे. पूछने पर वह अपने नामों से ज़्यादा कुछ नहीं बोल पाए पर उनकी खामोश पथराई आँखों में आज भी उनके बेटे के लिए इंसाफ़ का इंतज़ार है.

सरकार मुक़दमा वापस लेने जा रही है, यह बताने पर लियाकत कहते हैं, "मैं कभी मुकदमा वापस नहीं लूँगा. मुझे इंसाफ़ चाहिए. मेरा पैर काट दिया गया. पूरे शरीर पर घाव के निशान हैं. मैं न कमा सकता हूं न चल फिर सकता हूँ. दंगों ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी. अब सरकार हमको इंसाफ़ कैसे नहीं देगी? ऐसा हो ही नहीं सकता कि सरकार मेरा मुक़दमा वापस ले ले. सरकार किसी एक की नहीं, सबकी होती है. सरकार हमारी माई-बाप है, हम उनके बच्चे हैं. हमें छोड़ दिया तो हम कहां जाएंगे?"

Image caption लियाकत ने दंगों में अपना दायां पैर खो दिया था. उनके इस पाँव के घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे हैं और इनसे मवाद बहता रहता है.

मुक़दमा वापसी पर सरकार का रुख़

इस साल मार्च में उत्तर प्रदेश सरकार ने मुज़फ़्फ़नगर दंगों से जुड़े 131 मुक़दमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

इन 131 मामलों में ज़्यादतर अभियुक्त हिंदू हैं जिन पर हत्या, हत्या के प्रयास और साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने से लेकर लूटपाट और आगजनी तक के मुक़दमे दर्ज हैं.

सरकार के इस नए क़दम ने दंगा-पीड़ित परिवारों को दुःख और निराशा में धकेल दिया है जहाँ से निकालने का प्रयास यह परिवार पिछले पाँच सालों से कर रहे हैं.

2013 में हुए मुज़फ़्फ़नगर दंगों में 62 लोगों की हत्या हुई और हजारों लोग बेघर हो गए. मृतकों और घर से बेघर होने वालों में ज़्यादातर मुसलमान थे.

हिंसा के बाद तब की समाजवादी सरकार ने शामली और मुज़फ़्फ़नगर के अलग-अलग थानों में 1455 लोगों के ख़िलाफ़ कुल 503 मामले दर्ज किए.

इनमें से वापस लिए जा रहे 131 मुक़दमों में से 13 हत्या और 11 हत्या के प्रयास के मामलों से जुड़े हैं.

Image caption वकीला सैफ़ी की मौत दंगों में हो गई थी. तस्वीर में मौजूद उनकी चारों बहुएं कांधला के जडाना मोहल्ले में रहती हैं. वकीला का परिवार उनकी हत्या का मामला वापिस लेने के लिए तैयार नहीं है

179 मामले वापस लेने की अर्ज़ी

बिना अदालती कार्यवाही के ही इन मुक़दमों को 'वापस' करवाने के प्रक्रिया शुरू करवाने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट नेताओं के एक दल ने फ़रवरी में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी. इस दल का नेतृत्व बीजेपी सांसद संजीव बालयान और बुढ़ाना विधानसभा से बीजेपी विधायक उमेश मलिक ने किया था.

तब मीडिया से बातचीत के दौरान बयान देते हुए बालयान ने कहा था कि उन्होंने मुख्यमंत्री से दंगों के दौरान दर्ज किए गए कुल 179 मामले वापस लेने के लिए अर्ज़ी लगाई है. इन 179 मामलों में कुल 850 लोगों के ख़िलाफ़ शिकायतें दर्ज हैं, सभी हिंदू हैं. इसके कुछ ही हफ़्तों बाद मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करने के सिलसिले में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पहला नोटिस जारी किया गया.

इस संबंध में मीडिया से बातचीत के दौरान उत्तर प्रदेश के कानून मंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि सरकार दंगों के दौरान 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' मुक़दमो को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर रही है.

अमरीका की आधिकारिक संस्था 'यूएस कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजस फ्रीडम' जो दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की हालत पर अपनी रिपोर्ट सिफ़ारिशों के साथ अमरीकी संसद को सौंपती है, उसने हाल ही में प्रकाशित अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है, "मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने के लिए कुछ नहीं किया है, इनमें से कई घटनाएँ अक्सर मोदी की ही पार्टी के नेताओं के भड़काऊ भाषणों के कारण भड़की".

Image caption हमज़ा कालोनी में रहने वाले दंगा शरणार्थियों के बच्चे

ज़्यादातर पीड़ित मुसलमान ही रहे

लंदन स्थित अंतरराष्ट्रीय संस्था 'माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप इंटरनेशनल' ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि भारत में बीते पाँच सालों में सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, 2016 के दौरान देश में सांप्रदायिक हिंसा के कुल 700 मामले आधिकारिक तौर पर दर्ज किए गए. हिंसा की इन वारदातों में ज़्यादातर पीड़ित मुसलमान ही रहे हैं.

रिपोर्ट यह भी कहती है कि सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के मामलों में पुलिस और प्रशासन के ढुलमुल रवैये की वजह से अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती जिससे बहुसंख्यक समुदाय के हिंसक तत्वों का अपराध करने का हौसला और बढ़ता है.

उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक काम कर चुके रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता एसआर दारापुरी का कहना है कि वर्तमान सरकार में मुसलामानों के प्रति दमन की घटनाएं बढीं हैं.

वे कहते हैं,"जिस स्तर पर वर्तमान योगी सरकार मुज़फ्फरनगर दंगों जैसी गंभीर घटना के दौरान हुई हत्याओं के मामलों से जुड़े मुक़दमे वापस ले रही है वह अभूतपूर्व है. इस सरकार का अल्पसंख्यकों के खिलाफ दामनकारी रवैया साफ़ नज़र आता है. राजस्थान हो, मध्य प्रदेश हो या उत्तर प्रदेश, गाय के नाम पर होने वाली हत्याएं और शंभू रैगर जैसे लोगों के हाथों मुसलमानों के मारे जाने की घटनाएं 'आम' होती जा रही हैं."

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