स्टरलाइट प्रदर्शन: कब और किसके आदेश से पुलिस गोली चला सकती है

  • 26 मई 2018
तूतीकोरिन, स्टरलाइट वेदांता मामला इमेज कॉपीरइट Getty Images

बीती 22 मई को तमिलनाडु के तूतीकोरिन ज़िले में अलग-अलग जगह से आए प्रदर्शनकारियों ने वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट को बंद करवाने के लिए विरोध प्रदर्शन किए.

तांबा निर्माण में लगी इस कंपनी को बंद करवाने के लिए प्रदर्शनकारियों के हुज़ूम ने ज़िलाधिकारी कार्यालय की ओर ज़ुलूस निकाला.

स्थानीय पुलिस ने 22 मई को प्रदर्शनकारियों की भीड़ के अनियंत्रित होने के बाद गोलियां चलाईं. फिर 23 मई को भी गोलियां चलीं.

दोनों दिनों में कम से कम 13 लोगों की मौत हुई है. कुछ मीडिया चैनलों ने ऐसे वीडियोज़ भी दिखाए हैं जिनमें ये दिख रहा है कि सादी वर्दी पहने हुए पुलिसकर्मी गाड़ी पर चढ़कर निशाना लगा रहे हैं.

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गोलीबारी पर क्या बोली तमिलनाडु सरकार

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई. पालानीसामी ने इस मुद्दे पर कहा है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ में कुछ असामाजिक तत्व थे जिनकी वजह से गोलियां चलाई गईं.

तमिलनाडु पुलिस ने भी एक संदेश जारी करके कहा था, "भीड़ की पहचान कानून तोड़ने वालों के रूप में हुई है. सार्वजनिक संपत्ति और आम जीवन को किसी तरह के नुकसान से बचाने के लिए पर्याप्त चेतावनियां दी गई थीं. लेकिन जब भीड़ तितर-बितर नहीं हुई और आंसू गैस-लाठी चार्ज के बाद भी हिंसा जारी रही तब कोई विकल्प न होने की वजह से पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं. इसके बाद भीड़ तितर बितर हो गई."

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पुलिस किन हालातों में चला सकती है गोलियां?

बीबीसी ने तमिलनाडु पुलिस कॉलेज के पूर्व चेयरमैन श्री सित्थान्न से मुलाक़ात करके ये पूछा कि आख़िर किन स्थितियों में गोलियां चलाई जा सकती हैं.

श्री सित्थान्न कहते हैं कि गोलियां चलाने के नियम स्पष्ट हैं.

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धारा 144 कब लग सकती है?

अगर स्थिति तनावपूर्ण होने लगे तो सबसे पहले धारा 144 लगाई जा सकते हैं. अगर किसी शहरी क्षेत्र में ये स्थिति पैदा होती है तो पुलिस कमिश्नर को इसका आदेश देना होता है.

अगर ये स्थिति किसी ग्रामीण इलाके में पैदा होती है तो ज़िलाधिकारी ये आदेश दे सकता है. इसके साथ ही ये धारा 8 अलग अलग स्थितियों में लागू की जा सकती है.

इस धारा के लागू होने के बाद किसी एक जगह पर 5 से ज़्यादा लोगों का एक साथ खड़ा होना गैरकानूनी होगा.

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पुलिस गिरफ़्तार कब कर सकती है?

अगर धारा 144 लगाए जाने के बाद भी कई लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल होते हैं तो दंड संहिता की धारा 129, 130, 131 का इस्तेमाल करके भीड़ को तितर-बितर किया जा सकता है.

दंड संहिता 1973 की धारा 129 के तहत ज़िला राजस्व अधिकारी इस धारा के तहत फ़ैसला दे सकते हैं.

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अगर हिंसा भड़कती है तो पुलिस विभाग को ज़िला राजस्व अधिकारी को मौके पर मौजूद होने के लिए निवेदन करना होगा.

अगर राजस्व अधिकारी अपरिहार्य कारणों से मौके को छोड़कर चले जाते हैं या मौके पर उपस्थित होने में ही असमर्थ होते हैं तो ऐसी स्थिति कम से कम सब-इंस्पेक्टर की रैंक का पुलिस अधिकारी ये फ़ैसला ले सकता है. इसके तहत प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक हटाया जा सकता है या गिरफ़्तार किया जा सकता है.

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पुलिस बल प्रयोग कब कर सकती है?

अगर इसके बाद भी प्रदर्शन जारी रहता है तो धारा 131 के तहत सशस्त्र बलों को ज़िलाधिकारी की आज्ञा का पालन करना चाहिए. अगर ज़िलाधिकारी से संपर्क नहीं हो पा रहा है तो सशस्त्र बलों की टीम अपनी बटालियन के प्रमुख के आदेशों का पालन कर सकती है.

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तमिलनाडु पुलिस विभाग ट्रेनिंग क़ानून 73 बताता है:

1.सबसे पहले भीड़ को गैर-क़ानूनी गतिविधियों के लिए चेतावनी दी जाए, फिर उन्हें घटनास्थल से हटने के लिए कहा जाए.

2.अगर वे नहीं मानते हैं तो उनके ख़िलाफ़ आंसू गैस का इस्तेमाल किया जाए.

3.अगर भीड़ इसके बाद भी टिकी रहते तो हिंसा नियंत्रण वाहन वज्र के प्रयोग से पानी फेंककर भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की जाए.

4.अगर इससे भी असर न पड़े तो लाठीचार्ज किया जा सकता है.

5. अगर ऊपर लिखे हुए तरीकों से भीड़ नहीं हटती है और भीड़ आम ज़िंदगी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकती हो तो पुलिस गोलियां चला सकती है.

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लेकिन इसका एकमात्र उद्देश्य भीड़ को हटाना होना चाहिए न कि लोगों को जान से मारना. इसी वजह से पुलिस वालों को कमर से नीचे गोली मारने की सलाह दी जाती है. आईपीसी की धारा 100 और 103 इन कार्रवाइयों के लिए अधिकार देती है.

सित्थान्न कहते हैं, "आमतौर पर शुरुआत में पुलिस केवल भीड़ पर पैलट गन का इस्तेमाल करती है. इसमें जब पैलेट गन आप चलाते हैं तो छर्रे ये कई भागों में टूटकर कई सारे लोगों को चोट पहुंचाती है. तूतीकोरिन की स्थिति में पुलिस को ऐसी गोलियों का इस्तेमाल करना चाहिए. मुझे लगता है कि इससे कई मौतें बच सकती थीं. लेकिन ऐसी स्थितियों की आक्रामकता सिर्फ ज़मीन पर मौजूद अधिकारियों द्वारा ही की जा सकती है."

ऑटोमैटिक बंदूकों से गोलीबारी?

इसके अलावा पुलिस ऐसी हिंसक स्थिति में सामान्य राइफलें ही इस्तेमाल कर सकती है. सेमी-ऑटोमेटिक और ऑटो-रीफिलिंग ऑटोमेटिक राइफलें इस्तेमाल नहीं किए जा सकतीं.

"मीडिया में दिखाए गए वीडियोज़ में ऑटोमेटिक राइफलें दिख रही हैं. आम तौर पर ऐसे हथियारों से चरमपंथियों से संघर्ष किया जाता है. क्योंकि जब एक आम बंदूक इस्तेमाल करेंगे तो आपकी हर बार बंदूक को दोबारा भरने की ज़रूरत होगी. इस दौरान चरमपंथी हमारे ऊपर कई गोलियां चला चुके होंगे. ऐसे में ऐसी स्थिति में ऑटोमैटिक राइफल इस्तेमाल की जाती है."

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"ये हिंसक प्रदर्शनकारी आम तौर पर पेट्रोल बम, पत्थर और डंडे इस्तेमाल करते हैं. लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि पुलिस ने ऐसी बंदूकों का प्रयोग क्यों किया?

वो ये भी बताते हैं कि ये सभी फ़ैसले ज़मीनी स्थिति के अनुसार लिए जाते हैं और वो वहां तब की स्थितियों से अवगत नहीं हैं.

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