जब महाराष्ट्र से भी वेदांता स्टरलाइट को भागना पड़ा

  • 30 मई 2018
रत्नागिरी, तूतीकोरिन, तमिलनाडु, स्टरलाइट, कॉपर प्लांट इमेज कॉपीरइट RATNAGIRI BACHAV SANGHARSH SAMITI

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्टरलाइट कंपनी को लेकर हुए विरोध में 13 लोग मारे गए हैं. अब तमिलनाडु सरकार ने कंपनी के इस प्लांट को बंद करने के आदेश दे दिए हैं.

स्टरलाइट के विस्तार से होने वाले प्रदूषण के ख़िलाफ़ तूतीकोरिन में विरोध प्रदर्शन हुआ था जिसे 100 से ज्यादा दिन हो चुके हैं.

स्टरलाइट को लेकर तूतीकोरिन में जो हालात हुए हैं वो कई साल पहले महाराष्ट्र में भी हो सकते थे. 90 के दशक में महाराष्ट्र के रत्नागिरी में कंपनी ने कॉपर स्मलेटिंग प्लांट (तांबा पिघलाने का संयंत्र) लगाने का प्रस्ताव दिया था.

लेकिन कोंकणी के लोगों ने तब इसका इतना ज़बर्दस्त विरोध किया था कि कंपनी को वहां से जाना पड़ा.

जब स्टरलाइट कंपनी ने कोंकण में प्रवेश किया था तो एक लाख लोगों को नौकरी देने का वादा और शहर के विकास की बात की थी.

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Image caption तूतीकोरिन में स्टरलाइट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

क्या हुआ था रत्नागिरी में

कंपनी ने रत्नागिरी के पास महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) के प्लॉट नंबर 'वाई1' को लेकर एमआईडीसी के साथ 5 अगस्त 1992 को एक समझौता किया था.

इस समझौते के मुताबिक़, कंपनी को 20,80,600 वर्ग मीटर ज़मीन 99 सालों के लिए लीज़ पर दी गई थी. स्टरलाइट कंपनी यहां कॉपर स्मेलटिंग प्रॉजेक्ट शुरू करना चाहती थी.

रत्नागिरी ज़िला कोंकण मंडल के अंतर्गत आता है. यह प्रॉजेक्ट रत्नागिरी में शुरू करने की योजना बनाई गई थी.

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Image caption सुधाकर सावंत

लेकिन रत्नागिरी के लोगों का आरोप था कि कंपनी का ये प्रॉजेक्ट पर्यावरण के लिए नुक़सानदायक है. तब लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया और यह विरोध प्रॉजेक्ट के रद्द होने तक जारी रहा था.

संघर्ष समिति के सचिव सुधाकर सावंत ने बीबीसी मराठी के साथ उस वक़्त की यादें साझा कीं.

उन्होंने बताया, ''हम दुखी थे कि ये प्रॉजेक्ट रत्नागिरी शहर, इसके अल्फ़ांसो आम, किशमिश और समुद्र के तटों को नुक़सान पहुंचाएगा. हम इस बात से परेशान हो गए कि रत्नागिरी के अल्फ़ांसो आम की दुनियाभर में जो साख वो ख़त्म हो जाएगी. तब हम पांच लोग एक साथ आए और सोचा कि हमें इसे बचाने के लिए कुछ करना चाहिए.''

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तमिलनाडु में तूतीकोरिन के लोगों का कहना है कि स्टरलाइट कॉपर प्लांट से आने वाला औद्योगिक कचरा ज़मीन, हवा और पानी को प्रदूषित कर रहा था. प्लांट से हुए प्रदूषण के कारण लोगों की तबीयत भी ख़राब हुई है. कई लोगों की जान चली गई इसलिए वो प्लांट को बंद कराना चाहते थे.

वहीं, स्टरलाइट का कहना है कि ये सभी आरोप कंपनी को बदनाम करने के लिए लगाए गए हैं. स्टरलाइट वेदांता की सहायक कंपनी है. वेदांता कंपनी के मालिक अनिल अग्रवाल ने एक ट्वीट में कहा था कि अगर लोग चाहें तो वह कारोबार को आगे बढ़ाना चाहेंगे.

अग्रवाल कहते हैं, ''वेदांता स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण को लेकर कई नियमों का पालन करती है. इसी तरह हम राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का भी सख़्ती से पालन करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि ज़मीन का पानी स्टरलाइट कंपनी के उत्पादन के कारण प्रदूषित नहीं होता है. कंपनी से निकलने वाला कचरा ख़ासतौर से कचरा निपटान के लिए बनाई जगह पर डाला जाता है.''

लेकिन कंपनी के प्रॉजेक्ट को कहीं और ​भेजने के लिए 1993 में 50 हज़ार लोगों ने रत्नागिरी में मार्च निकाला था. यहां से इस लड़ाई की शुरुआत हुई थी.

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Image caption किरण साल्वे

राजनीतिक दख़ल से दूरी

सावंत बताते हैं, ''किरण साल्वी, संतोष सावंत, अशोल लांजेकर, दीपक राउत और मैंने इस लड़ाई के बारे में सबसे पहले चर्चा की थी. बाद में एडवोकेट खेतान घग को सर्वसम्मिति से रत्नागिरी बचाओ, स्टरलाइट हटाओ संघर्ष समिति का अध्यक्ष चुन लिया गया था.''

संघर्ष समिति के किरण साल्वे बताते हैं, ''जब कंपनी को लेकर विरोध चल रहा था तब उसने निर्माण कार्य शुरू कर दिया था. इतना ही नहीं, कंपनी प्रॉजेक्ट के लिए ज़रूरी मटीरियल भी ले आई थी.''

किरण साल्वे ने बताया, ''कंपनी जो मटीरियल लाई थी वो ख़राब गुणवत्ता का था. बाद में हमें पता चला कि कंपनी पहले इस्तेमाल हो चुका मटीरियल लेकर आई है जिसे चिली में 1957 से 1977 के बीच एक तांबा पिघलाने वाली कंपनी इस्तेमाल कर चुकी है. इससे कंपनी को बाहर निकालने का हमारा विरोध और मज़बूत हो गया.''

83 साल के हो चुके संघर्ष समिति के अध्यक्ष खेतान घग ने विरोध प्रदर्शन के सफल होने के कारण बताए.

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Image caption कंपनी ने रत्नागिरी के पास कारखाने का निर्माण शुरू कर दिया था.

उन्होंने बताया, ''मैंने ये पद इस शर्त पर स्वीकार किया था कि कोई राजनीतिक पार्टी इस लड़ाई में शामिल नहीं होगी. कंपनी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई को और तेज़ करने के लिए हमने रत्नागिरी के हर व्यक्ति को विश्वास में लिया.''

खेतान घग बताते हैं, ''जो लोग पैसों के लिए प्रदर्शनकारियों और कंपनी के बीच समझौता कराने के मक़सद से इस विरोध में शामिल हुए थे उन्हें हमने निकाल दिया. संघर्ष समिति ने रत्नागिरी शहर ही नहीं पूरे ज़िले में इस प्रॉजेक्ट से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को जागरुक किया. अगर हम तब लड़े नहीं होते तो आज तमिलनाडु में जो हुआ वो यहां हो सकता था.''

घग उस विरोध को लेकर ख़ुशी ज़ाहिर करते हैं. यह रत्नागिरी के लोगों के लिए मील का पत्थर बन गया है.

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मिलने गए थे शरद पवार

रत्नागिरी के इतिहास में सबसे बड़ा मार्च स्टरलाइट कंपनी के ख़िलाफ़ हुआ था. उस समय रत्नागिरी टाइम्स नाम के एक अख़बार ने लोगों की इस मक़सद में काफ़ी मदद की थी. साल्वी कहते हैं कि अख़बार के मालिक उल्हास घोसल्कर ने प्रदर्शनकारियों को मज़बूती दी थी.

खेतान घग कहते हैं, 'तकनीकी जानकारी के मामले में पर्यावरणविद रश्मि मयूर की मदद के बिना इस विरोध प्रदर्शन को सही दिशा मिलना संभव नहीं था. प्रशासन हमें टालने वाले जवाब दे सकता था.''

शरद पवार भी इस मसले पर बात करने के लिए संघर्ष समिति से मिले थे. स्टरलाइट के ख़िलाफ़ रत्नागिरी के लोगों के ग़ुस्से को देखकर शरद पवार ने प्रॉजेक्ट रोक देने की घोषणा कर दी थी.

इस दौरान शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे. लोगों के विरोध के बाद कंपनी को 15 जुलाई, 1993 में सरकार से प्रॉजेक्ट बंद करने के आदेश मिल गए. यहां तक कि उस वक़्त बनाया गया ढांचा अब भी देखा जा सकता है.

इसके बाद, साल 2010 में एमआईडीसी ने कंपनी को नोटिस जारी करके पूछा था कि कंपनी कॉपर स्मेल्टर के बजाय कुछ और शुरू करे. कंपनी ने अभी तक इसका जवाब नहीं दिया है.

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आख़िर में 31 जुलाई, 2014 को एमआईडीसी ने स्टरलाइट को ज़मीन का पोस्टमार्टम किए जाने का नोटिस भेजा थे. कंपनी तुरंत इसके ख़िलाफ़ अदालत गई और स्टे ऑर्डर हासिल किया.

वर्तमान में यह मामला विचाराधीन है. एमआईडीसी से मिली जानकारी के अनुसार, स्टरलाइट कंपनी अभी भी एमआईडीसी को भूमि के लिए सेवा शुल्क चुका रही है.

खेतान घग अंत में कहते हैं, ''रत्नागिरी के लोगों ने स्टरलाइट के ख़िलाफ़ सही समय पर विरोध किया. अगर हम सही दिशा में नहीं गए होते और नेताओं के झूठे वादों में फंस गए होते तो हमारी स्थिति तूतीकोरिन से कुछ अलग नहीं होती.''

हमने स्टरलाइट के अधिकारियों से इस संबंध में कंपनी का पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब उपलब्ध नहीं हुआ. अगर हमें उनका जवाब मिलता है तो हम उसे इस लेख में ज़रूर शामिल करेंगे.

इस दौरान हमने रत्नागिरी प्लांट के केयरटेकर मिलिंद गांधी से बात की. उन्होंने बताया कि वह कंपनी के कर्मचारी नहीं हैं और उन्हें अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया है.

उन्होंने कहा, ''कंपनी में कोई भी इस वक़्त बात करने की स्थिति में नहीं है.''

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