प्रेस रिव्यू: प्रणब मुखर्जी के RSS मुख्यालय जाने पर कांग्रेस चिंतित!

  • 30 मई 2018
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों के सम्मलेन में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषण को लेकर कांग्रेस में चिंता है. द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी अभी सात जून को प्रणब के भाषण का इंतज़ार कर रही है और उसके बाद ही कोई प्रतिक्रिया देगी.

कांग्रेस के प्रवक्ता टॉम वडक्कन ने प्रणब के आरएसएस मुख्यालय जाने पर तो टिप्पणी नहीं की लेकिन ये ज़रूर कहा कि कांग्रेस और आरएसएस की सोच में बहुत फ़र्क़ है.

वहीं, पार्टी के एक और प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि प्रणब मुखर्जी राजनीति को छोड़कर राषट्रपति बने थे. किसी सम्मेलन में उनका भाषण उनके विश्वासों का संकेत नहीं है. वो जो कहें और 50 साल के राजनीतिक करियर में उन्होंने जो किया है, उसी आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए.

एक और कांग्रेसी नेता ने कहा कि मुखर्जी का आरएसएस मुख्यालय जाना ही कांग्रेस और धर्मनिरपेक्ष कैंप के लिए सही नहीं है.

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दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने पांच बड़े निजी अस्पतालों पर ग़रीबों के इलाज में कोताही बरतने पर जुर्माना लगाया है.

'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अधिक जुर्माना फ़ोर्टिस हेल्थकेयर के एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टिट्यूट एंड रिसर्च सेंटर पर लगाया गया है. अस्पताल को एक महीने के भीतर दिल्ली स्वास्थ्य निदेशालय में 503.36 करोड़ रुपये जमा करने के लिए कहा गया है.

अधिकारियों के मुताबिक़, ऐसा आवंटित की गई ज़मीन की शर्तों का पालन न करने के लिए किया गया है. जून 2016 में दिल्ली सरकार ने ग़रीबों को मुफ़्त इलाज देने से मना करने पर पांच अस्पतालों पर क़रीब 700 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था.

सरकारी अस्पतालों को सस्ते दामों पर ज़मीन इस शर्त के साथ दी गई थी कि वो 25 फ़ीसदी बाहरी रोग विभाग में 10 फीसदी भर्ती क्षमता ग़रीबी रेखा से नीचे के मरीज़ों के लिए आरक्षित रखेंगे और उन्हें मुफ़्त में इलाज देंगे.

एस्कॉर्ट अस्पताल दिल्ली सरकार के आदेश के ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट चला गया था. हाई कोर्ट ने जुर्माना वसूली पर रोक लगाते हुए मामले को फिर से दिल्ली स्वास्थ्य निदेशालय की विशेष समिति के पास भेज दिया था. विशेष समिति ने अब फिर से अस्पतालों को जुर्माना अदा करने के आदेश दिए हैं.

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केंद्र का बातचीत का प्रस्ताव, हुर्रियत ने कहा एजेंडा स्पष्ट नहीं

भारत प्रशासित कश्मीर के अलागववादी दलों का कहना है कि सरकार ये स्पष्ट करे कि वो किस मुद्दे पर बातचीत करना चाहती है और एक आवाज़ में बात करे.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, सरकार के बातचीत के प्रस्ताव पर पहली बार औपचारिक प्रतिक्रिया देते हुए अलगाववादी नेताओं ने कहा है कि वो बातचीत करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते भारत सरकार चीज़ें और स्पष्ट करे.

एक साझा बयान में सैयद अली ग़ीलानी, मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ और यासीन मलिक ने कहा है कि बातचीत में सभी पक्षों की चिंताओं का ध्यान रखा जाना चाहिए, ख़ासकर सबसे ज़्यादा प्रभावित पक्ष का.

बातचीत के प्रस्ताव को अस्पष्ट बताते हुए अलगाववादी नेताओं ने कहा है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह कहते हैं कि कश्मीर और पाकिस्तान दोनों के साथ बातचीत होनी चाहिए और कश्मीर और कश्मीरी हमारे हैं लेकिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज कहती हैं कि जब तक आतंकवाद ख़त्म नहीं होगा पाकिस्तान से बात नहीं होगी. मोदी कहते हैं कि विकास ही समस्या का हल है. ये अस्पष्टता हमारे लिए बहुत कम जगह छोड़ती है.

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कुमारस्वामी को वित्त मंत्रालय दे सकती है कांग्रेस

कर्नाटक में गठबंधन सहयोगी कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के बीच मंत्री पदों के बंटवारे को लेकर जारी गतिरोध के बीच कांग्रेस ने वित्त मंत्रालय कुमारस्वामी को देने के संकेत दिए हैं.

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, कांग्रेस और जेडीएस के बीच खींचतान की जड़ बने वित्त मंत्रालय को कांग्रेस छोड़ सकती है.

ऐसा लग रहा है कि कुमारस्वामी के पिता एचडी देवेगौड़ा जेडीएस के इस जीत के पीछे हैं. वहीं, मुख्यमंत्री बनने के बाद कुमारस्वामी ने कहा था कि सरकार की कमान उनके पिता के हाथ में नहीं रहेगी.

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एनसीईआरटी की किताबों में नए हीरो बने बाजीराव और महाराणा

एनसीईआरटी ने अपनी 182 किताबों में 1334 बदलाव किए हैं. इनमें अतिरिक्त जानकारी, सुधार और डाटा अपडेट शामिल हैं. सर्वाधिक 573 बदलाव विज्ञान की किताबों में किए गए हैं जिसके बाद 316 बदलाव सामाजिक विज्ञान की किताबों और 163 बदलाव संस्कृत की किताबों में किए गए हैं.

इंडियन एक्सप्रेस ने इन बदलावों की समीक्षा की है. अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक आध्यात्मिक गुरु श्री ओरोबिंदो और स्वामी विवेकानंद, स्वतंत्रता संग्राम सैनानी लाला लाजपत राय और वल्लभ भाई पटेल, पेशवा और मराठा जनरल बाजीराव बल्लाल, जाट राजा सूरज मल, राजपूत राजा महाराणा प्रताप और मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी को या तो किताबों में शामिल किया गया है या पहले से अधिक जगह दी गई है.

बीजेपी और कई हिंदुत्तववादी संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि इन राष्ट्रवादी नायकों को भारत के साझा इतिहास में जान-बूझकर नज़रअंदाज़ किया गया है. गृहमंत्री राजनाथ सिंह कई बार कह चुके हैं कि महाराणा प्रताप को इतिहास में वो स्थान नहीं मिला जिसके वो हक़दार हैं.

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