इन वजहों से कैराना और नूरपुर चुनाव हारी भाजपा

  • समीरात्मज मिश्र
  • कैराना से बीबीसी हिंदी के लिए
कैराना चुनाव

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28 मई को कैराना और नूरपुर में उपचुनाव के लिए मतदान होने थे. 27 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बागपत में एक जनसभा कर रहे थे.

जनसभा से महज़ पांच-छह किलोमीटर दूर बड़ौत तहसील मुख्यालय पर कुछ किसान अपनी मांगों को लेकर एक हफ़्ते से धरना दे रहे थे.

ये संयोग ही था कि जनसभा से एक दिन पहले धरना दे रहे किसानों में से एक की सदमे से मौत हो गई, लेकिन किसानों का धरना जारी रहा.

प्रधानमंत्री मोदी की रैली को लेकर सवाल ये उठा कि इसका सीधा संदेश कैराना और नूरपुर तक जाएगा. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कुछ बातें ऐसी कहीं भी कि वो वहां तक पहुंचें. लेकिन प्रधानमंत्री अपनी भारी-भरकम 'फ़ौज' के साथ शायद वो संदेश नहीं दे पाए जो बड़ौत के दो-तीन दर्जन धरने पर बैठे किसानों ने दे दिया.

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वादाखिलाफी और किसानों का गुस्सा

किसानों का ग़ुस्सा ये साफ़ संकेत दे रहा था कि वो बीजेपी से खुश नहीं हैं. वहां से कैराना और नूरपुर की दूरी दो सौ किलोमीटर के भीतर है और राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक संरचना भी लगभग वही है.

किसानों की नाराज़गी सबसे ज़्यादा इस बात पर थी कि गन्ना किसानों का बकाया भुगतान वादे के बावजूद नहीं हुआ, बिजली का बिल ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा दिया गया और कर्ज़माफ़ी के नाम पर उनके साथ धोखा हुआ है.

यही नहीं, क़रीब एक हफ़्ते तक कैराना लोकसभा क्षेत्र के तहत सहारनपुर-शामली ज़िलों में दौरा करने के बाद ये साफ़ पता चल रहा था कि किसान, ख़ासतौर पर गन्ना किसान सरकार से बेहद नाराज़ है. हालांकि कुछेक गांवों में किसान ख़ुद को ख़ुश भी दिखा रहे थे लेकिन ये वही थे जो बीजेपी के समर्थक थे.

क़रीब सौ किलोमीटर दूर बिजनौर ज़िले के नूरपुर में भी लगभग यही स्थिति देखी जा सकती थी. इस पूरे इलाक़े में ज़्यादातर किसान गन्ने की खेती करते हैं.

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पार्टी के अंदर गुस्सा

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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क़रीब दो महीने पहले ही फूलपुर और गोरखपुर में भी लोकसभा के उपचुनाव हुए थे. सरकार के काम-काज को लेकर यहां भी मतदाताओं में नाराज़गी थी.

परिणाम बीजेपी के ख़िलाफ़ गए और ये बात सामने आई कि ग़ुस्से में यहां मतदाता वोट डालने ही नहीं निकले.

यही नहीं, एक सबसे अहम बात यह है कि फूलपुर और गोरखपुर की ही तरह नूरपुर और कैराना में बीजेपी के कार्यकर्ताओं में भी नाराज़गी देखी गई.

पार्टी के कई पदाधिकारी तक ये कहते हुए मिले हैं कि 'इस सरकार में उनकी कोई सुनवाई नहीं है'.

सहारनपुर में पार्टी के एक राज्य स्तरीय पदाधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, "यहां के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का तो ये हाल है कि उनके दफ़्तर जाओ तो सीधे मुंह बात तक नहीं करते हैं, बैठने को तो छोड़ दीजिए. ये हाल सिर्फ़ कार्यकर्ताओं का ही नहीं है, ये व्यवहार तो विधायकों तक के साथ होता है."

इस बारे में जब हमने बीजेपी की उम्मीदवार मृगांका सिंह से सवाल किया तो उनका कहना था, "आप बिल्कुल सही कह रहे हैं. मेरे संज्ञान में भी ये बात आई है. कई कार्यकर्ताओं ने बताया है. अभी आचार संहिता के नाते कुछ नहीं हो सकता लेकिन चुनाव बाद मैं ख़ुद इस बारे में मुख्यमंत्री से बात करूंगी."

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राजनीतिक समीकरण और भीम आर्मी का समर्थन

जहां तक कैराना लोकसभा सीट की बात है तो इसके तहत पांच विधानसभाएं आती हैं जिनमें गंगोह और नकुड़ सहारनपुर में पड़ती हैं जबकि कैराना, थाना भवन और शामली विधानसभाएं शामली ज़िले में आती हैं.

नूरपुर भी यहां से लगा हुआ है. सामाजिक रूप से यहां जाट और गूजर जातियां काफी प्रभावी मानी जाती हैं जबकि सैनी, कश्यप जैसी जातियों का भी अपना राजनीतिक प्रभाव है. कैराना लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज़्यादा मुस्लिम मतदाता हैं.

जानकारों के मुताबिक सपा, कांग्रेस और रालोद के साथ आने से बीजेपी के पक्ष में वैसा ध्रुवीकरण नहीं हो सका जैसा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ था.

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की जनसभाओं का इस संदर्भ में लोग उदाहरण देते हैं, बावजूद इसके ध्रुवीकरण में बीजेपी को क़ामयाबी नहीं मिली. हां, कुछ ही दिन पहले सहारनपुर में भीम आर्मी के नेता सचिन वालिया की हत्या और उसके बाद पुलिस और प्रशासनिक कार्रवाई से दलित मतों का ज़बर्दस्त ध्रुवीकरण हुआ, ये साफ़ दिखाई देता है.

भीम आर्मी ने साफ़तौर पर गठबंधन के पक्ष में अपने समर्थकों से वोट देने की अपील की थी.

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भाजपा की कोशिश और असफलता

वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ हाशमी बताते हैं, "मुख्य रूप से लोगों की निगाहें जाट मतों पर थीं और जाटों ने आख़िरकार चौधरी चरण सिंह के परिवार में आस्था दिखाई और राष्ट्रीय लोकदल को वोट दिया. बाक़ी मत किधर जाएंगे, इस बारे में लोगों का जैसा अनुमान था, लगभग वैसा ही हुआ है."

"बीजेपी ने मुस्लिम मतों में भी विभाजन कराने की कोशिश की थी लेकिन वो क़ामयाब नहीं हुई."

कैराना से बीजेपी उम्मीदवार मृगांका सिंह उन्हीं हुकुम सिंह की बेटी हैं जिनके निधन से ये सीट खाली हुई थी. हुकुम सिंह के जीवित रहते ही 2017 के विधान सभा चुनाव में मृगांका सिंह को कैराना विधान सभा सीट से टिकट दिया गया था लेकिन वो समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार से हार गई थीं.

इसके बावजूद बीजेपी ने उपचुनाव में उन्हें इसलिए टिकट दिया ताकि उन्हें सहानुभूति वोट मिल सकें.

रियाज़ हाशमी बताते हैं, "बीजेपी में भी एक खेमा ऐसा था जो मृगांका की जीत नहीं चाहता था. उसे ऐसा लगता था कि यदि उपचुनाव भी वो हारीं तो उनकी दावेदारी आगे के लिए ख़त्म हो जाएगी और इस सीट पर वो नेता अपने लोगों को टिकट दिलाएंगे."

रियाज़ हाशमी और सहारनपुर के कुछ अन्य वरिष्ठ पत्रकार इस संदर्भ में बीजेपी के कुछ बड़े नेताओं का भी नाम लेते हैं लेकिन "ऑफ़ द रिकॉर्ड."

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