कौन हैं कैराना में बीजेपी को चित करने वाली तबस्सुम

  • 1 जून 2018
मृगांका सिंह और तबस्सुम

उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा सीट से उपचुनाव में जीत दर्ज करने वाली राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन के लिए न तो राजनीति नई है और न ही कैराना सीट.

राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखने वाली तबस्सुम हसन ने साल 2009 में भी कैराना सीट से बीएसपी उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की थी और 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके बेटे नाहिद हसन ने बतौर समाजवादी पार्टी उम्मीदवार बीजेपी के हुकुम सिंह को चुनौती दी थी, लेकिन हुकुम सिंह से वो चुनाव हार गए थे.

यानी तबस्सुम हसन के परिवार की राजनीतिक विरासत की बात करें तो अब उनकी तीसरी पीढ़ी भी राजनीति में आ चुकी है.

तबस्सुम हसन के ससुर चौधरी अख़्तर हसन सांसद रह चुके हैं, जबकि पति मुनव्वर हसन कैराना से दो बार विधायक, दो बार सांसद, एक बार राज्यसभा और एक बार विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं.

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तबस्सुम का सियासी परिवार

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ मुनव्वर एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने चारों सदनों का प्रतिनिधित्व किया.

1984 में चौधरी अख़्तर हसन कांग्रेस के टिकट पर कैराना से सांसद चुने गए. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर पर चढ़कर चौधरी अख़्तर हसन ने बड़ी जीत दर्ज की थी.

इससे पहले सिर्फ़ 1971 में ही कांग्रेस यहां से जीत सकी थी, अन्यथा इस सीट का मिजाज़ शुरू से ही ग़ैर कांग्रेसी रहा है. 1980 में चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी यहां से सांसद थीं.

अख़्तर हसन की राजनीतिक विरासत उनके बेटे चौधरी मुनव्वर हसन ने संभाली और 1991 में पहली बार वो कैराना सीट से विधायक बने. इस चुनाव में उन्होंने हुकुम सिंह को हराया था.

सहारनपुर के वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ हाशमी बताते हैं, "साल 1993 में भी मुनव्वर हसन विधायक बने. 1996 में कैराना लोकसभा सीट से वो सपा के टिकट पर और 2004 में सपा-रालोद गठबंधन के टिकट पर मुज़फ़्फ़रनगर से सांसद चुने गए. मुनव्वर हसन राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्य भी रहे."

2009 में मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन बसपा के टिकट पर कैराना लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं. इसी चुनाव के साथ राजनीति में प्रवेश कर रहीं तबस्सुम ने छह बार कैराना से विधायक रहे हुकुम सिंह को हराया था.

ये अलग बात है कि अगले लोकसभा चुनाव में यानी 2014 में हुकुम सिंह ने उनके बेटे को हराकर इस हार का बदला ले लिया.

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बीजेपी छोड़ हर सियासी दल से संबंध

तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद हसन साल 2014 में भले ही बीजेपी लहर के चलते हारे थे, लेकिन इलाक़े के लोगों के मुताबिक ये हार उनके परिवार में पड़ी फूट का नतीजा थी.

तब नाहिद हसन समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे और उनके चाचा कंवर हसन बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़े थे. इस चुनाव में नाहिद हसन दूसरे नंबर पर और उनके चाचा तीसरे नंबर थे.

नाहिद हसन के चाचा कँवर हसन ने उपचुनाव में तबस्सुम हसन के ख़िलाफ़ भी पर्चा दाख़िल किया था, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी भाभी तबस्सुम बेगम को समर्थन दे दिया और ख़ुद भी राष्ट्रीय लोकदल में शामिल हो गए. जानकारों के मुताबिक अगर कँवर हसन मुख़ालफ़त करते रहते तो तबस्सुम का जीतना आसान नहीं था.

2014 में लोकसभा सदस्य बनने के बाद जब हुकुम सिंह ने कैराना विधानसभा सीट खाली की तो ये सीट एक बार फिर हसन परिवार के पास आ गई. अबकी बार मुनव्वर हसन और तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद हसन ने सपा के टिकट पर यहां से जीत दर्ज की.

बाद में 2017 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने मृगांका सिंह को हराकर इस सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा.

सहारनपुर के जेबीएस इंटर कॉलेज से हाई स्कूल तक पढ़ीं तबस्सुम बेगम मुस्लिम गूजर समुदाय से संबंध रखती हैं. कैराना में हिंदू और मुस्लिम गूजरों की संख्या क़रीब तीन लाख है और राजनीतिक रूप से ये काफ़ी प्रभावी भूमिका में रहते हैं.

हुकुम सिंह और तबस्सुम की गूजर पृष्ठभूमि

इलाक़े के लोग बताते हैं कि राजनीतिक रूप से हुकुम सिंह का परिवार और तबस्सुम बेगम का परिवार एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भले ही हों, लेकिन सामाजिक ताने-बाने में दोनों का संबंध 'घरेलू' है.

दोनों परिवार को क़रीब से जानने वाले कैराना के पत्रकार संदीप इंसा बताते हैं, "दरअसल, दोनों ही परिवार मूल रूप से गूजर समुदाय से आते हैं. बल्कि दोनों ही गूजरों की एक ही खाप यानी कलस्यान खाप से संबंध रखते हैं. कैराना, शामली और मुज़फ़्फ़रनगर में जाट और गूजर समुदाय के लोग दोनों ही धर्मों यानी हिंदुओं और मुसलमानों में हैं."

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नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि जब तक हुकुम सिंह ने कैराना से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा नहीं उठाया था, तब तक गूजर समुदाय के तमाम मुसलमान भी उनके समर्थक थे, भले ही वो किसी पार्टी में रहे हों. लेकिन उसके बाद मुस्लिम समुदाय उनसे दूर हो गया.

वहीं, तबस्सुम हसन और उनके परिवार को मुस्लिम समुदाय का समर्थन मिलता रहा है. उपचुनाव के दौरान तबस्सुम हसन ने ईवीएम की ख़राबी का आरोप लगाते हुए सीधे चुनाव आयोग को पत्र लिखकर बताया कि मशीनें ज़्यादातर दलित और मुस्लिम इलाक़ों में ही ख़राब हुई हैं.

जानकारों के मुताबिक इस क़दम से तबस्सुम हसन ने अपनी परिपक्व और 'दबंग' राजनीतिक महिला की छवि अपने समर्थकों में पेश की.

सामाजिक और धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाली तबस्सुम हसन उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड की भी सदस्य है. उपचुनाव में जीत दर्ज कराने के साथ ही वो लोकसभा में उत्तर प्रदेश से मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र महिला होंगी. 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार जीत हासिल नहीं कर सका था.

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