भारत का वो जादूगर जिसने ब्रिटेन को डरा दिया

  • 3 जून 2018
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Image caption पीसी सरकार ने भारतीय जादू को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया

9 अप्रैल, 1956 की शाम 9 बजकर 15 मिनट पर अचानक ही बीबीसी के दफ़्तर में एकाएक सैकड़ों लोग फ़ोन करने लगे.

फ़ोन करने वालों को यक़ीन था कि उन्होंने अपनी आंखों से टीवी स्क्रीन पर एक कत्ल होते हुए देखा था.

टीवी स्क्रीन पर रहस्यमयी से दिख रहे एक जादूगर ने 17 साल की लड़की को अपने वश में करके एक मेज पर लिटा दिया. इसके बाद इस जादूगर ने एक आरी से कुछ इस तरह इस लड़की के शरीर के दो टुकड़े कर दिए जैसे कि वह कसाई की मेज पर पड़ा हुआ मांस का टुकड़ा हो.

ये उन दिनों की बात है जब टीवी पर पैनोरामा नाम का एक चर्चित कार्यक्रम आया करता था. इसी कार्यक्रम की आखिरी कड़ी में लोगों ने इस जादूगर को अपना करतब दिखाते हुए देखा लेकिन लोगों को ऐसा लगा कि कोई बड़ी गड़बड़ हो गई है.

क्योंकि जादूगर ने जैसे ही अपनी सहयोगी को मेज से उठाने के लिए उसके हाथों को मलना शुरू किया लेकिन उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. ऐसे में उसने अपने सिर को नीचे झुकाते हुए अपनी सहयोगी के चेहरे पर एक काला कपड़ा डाल दिया.

जादूगर के ऐसा करते ही कार्यक्रम के प्रस्तोता रिचर्ड डिंबलबाय ने कैमरे के सामने आकर कहा कि अब कार्यक्रम ख़त्म होता है.

इसके तुरंत बाद लाइम ग्रोव स्टूडियो में एक के बाद एक कई फोन आना शुरू हो गए.

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Image caption सरकार को उनके इंद्रजाल जादू के लिए आज भी याद किया जाता है

पश्चिमी दुनिया में कैसे पहुंचे सरकार?

सरकार के लिए पश्चिमी देशों में जादूगरी के क्षेत्र में अपनी जगह बनाना बेहद संघर्षपूर्ण था. तीन हफ़्ते के सीज़न के लिए ड्यूक ऑफ़ यॉर्क थिएटर को आरक्षित कराया गया था. लेकिन इस सीज़न के टिकटों की बिक्री अब तक बेहद कम थी.

ऐसे में चर्चित कार्यक्रम पैनोरामा की आख़िरी कड़ी में पहुंचना अपने आप में खेल बदलने जैसा फ़ैसला था और वह इस मौके का भरपूर फायदा उठाना चाहते थे.

पैनोरामा कार्यक्रम को इस तरह अचानक ख़त्म किए जाने पर आधिकारिक स्पष्टीकरण भी दिया गया. लेकिन इस स्पष्टीकरण में कहा गया कि सरकार ने उन्हें मिली समयसीमा को पार कर दिया था.

लेकिन सरकार के विरोधी भी ये बात स्वीकार करते थे कि सरकार की टाइमिंग बेहद शानदार थी.

ऐसे में अपनी सहयोगी दिप्ती डे को एक आरी से काटकर मेज पर छोड़ देना हाथ की सफाई का एक बेमिसाल नमूना था.

इस घटना के अगले दिन अख़बारों में सरकार और उनका ये करतब प्रमुखता से छाया हुआ था. इसके बाद ड्यूक ऑफ़ यॉर्क में आयोजित होने वाला उनका सीज़न के सारे टिकट तेजी से बिक गए.

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बंगाल में पैदा हुए थे सरकार

सरकार का जन्म बंगाल (मौजूदा बांग्लादेश) के टांगाइल ज़िले के अशेकपुर गांव में 23 फरवरी, 1913 को प्रोतुल चंद्र सरकार के रूप में हुआ था.

पढ़ाई करते हुए उन्होंने गणित में महारथ हासिल कर ली थी. कई लोग उन्हें एक जन्मजात प्रतिभा के नाम से भी पुकारते थे. लेकिन सरकार का दिल जादूगरी में लगता था.

सरकार ने अपना आख़िरी नाम सरकार से बदलकर सॉरसर कर लिया जो कि अंग्रेजी भाषा के सॉरसरर यानी जादूगर की आवाज़ से मिलता-जुलता था. इसके बाद उन्होंने क्लबों, सर्कसों और थिएटरों में अपना जादू दिखाना शुरू कर दिया.

लेकिन बंगाल के कुछ शहरों के परे अभी भी लोग उनसे अपरिचित ही थे. ऐसे में उन्होंने अपने आप को दुनिया का सबसे महान जादूगर कहना शुरू कर दिया. उनकी ये चतुराई काम कर गई. इसके बाद देश भर में से कई जगहों से उनके पास निमंत्रण आने लगे.

लेकिन अंतर्राष्ट्रीय जगत में अपनी जगह बनाना अभी भी एक मुश्किल काम था. पश्चिमी दुनिया के जादूगर अभी भी भारतीय जादूगरों को अकुशल मानते थे.

इसी समय सरकार ने सावधानी पूर्वक द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत आकर सैन्य टुकड़ियों का मनोरंजन करने वाले अमरीकी जादूगरों के साथ मेलजोल बढ़ाना शुरू किया. उन्होंने इनके बारे में जादूगरी क्षेत्र से जुड़ी पत्रिकाओं में लेख लिखने शुरू किए.

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जब अमरीका पहुंचे पी सी सरकार

साल 1950 में सरकार अमरीकी जादूगर समाज की ओर से आए बुलावे पर शिकागो में अपना जादू दिखाने के लिए तैयार हो गए.

इसके बाद जब वह शर्मन होटल के कंवेंशन हॉल से बाहर निकले तो वहां मौजूद दर्शकों और पत्रकारों ने उन्हें ऐसी प्रतिक्रिया दी कि जैसे वह मशहूर कहानी अरेबियन नाइट्स के पन्नों से बाहर निकलकर आ गए हों.

लेकिन उनका पहला शो आईलैस साइट निराशाजनक रहा. इस शो में उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर ब्लैकबोर्ड पर लिखी हुई चीज़ों को पढ़ना था. मगर बात यहीं नहीं थमी.

इसके बाद उन्होंने उस दौर के दो सबसे चर्चित जादूगरों पर फर्जीवाड़ा करने का आरोप लगाया.

जादूगरी के क्षेत्र से जुड़ी पत्रिका जेनी के संपादक सैमुअल पैट्रिक स्मिथ याद करते हैं उनके इस आरोप से सभी लोग सन्न रह गए.

वो कहते हैं, "अमरीका में इस तरह से व्यवहार नहीं किया जाता था. लेकिन ये बयान आने के बाद जादूगरी की दुनिया दो हिस्सों में बंट गई. एक तरफ सरकार के समर्थक थे तो दूसरी ओर उनके विरोधी."

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विवादों से भरा रहा करियर

सरकार द्वारा खुद को दुनिया का सबसे महान जादूगर कहने की हिम्मत करना भी कई लोगों द्वारा सबसे बड़े धोखे के रूप में देखा गया.

ऐसे में जब लोगों को उनकी जादूगरी पर शक़ हुआ तो इससे सरकार का ही फ़ायदा हुआ क्योंकि बॉक्स ऑफिस पर उनके शो हिट हो रहे थे.

सरकार का प्रचार तंत्र भी बेजोड़ था. जादूगरी के क्षेत्र से जुड़ी पत्रिकाएं और अख़बार उनके काम की सकारात्मक समीक्षाओं से भरे हुए होते थे. इनमें शानदार तस्वीरों और पोस्टरों की भरमार हुआ करती थी.

लेकिन ये सब कुछ अभी भी ग्लैमर तक ही सीमित था. श्वेत एंग्लो-सेक्सन जादूगरों प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में अभी भी उन्हें एक बाहरी व्यक्ति माना जा रहा था.

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साल 1955 में हुआ कुछ ख़ास

कलानग के नाम से स्टेज़ पर जादू दिखाने वाले और कभी हिटलर के पसंदीदा जादूगर रहे हेलमट एवाल्ड स्क्रिवर ने 1955 में सरकार पर उनकी तरकीबों को चुराने का आरोप लगाया.

इसके बाद जर्मन जादूगर के ख़िलाफ़ और सरकार के पक्ष में कई जादूगर खड़े हो गए.

इन जर्मन जादूगर को याद दिलाया गया कि उन्होंने अपनी राष्ट्रीयता छुपाई है और जिन तरकीबों को लेकर उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया था, वह भी चोरी की हैं या मांगी हुई हैं.

आज सरकार को उनके इंद्रजाल या द मैजिक ऑफ़ इंडिया शो के लिए जाना जाता है जिसे 1955 में पेरिस में आयोजित किया गया था. इस टूर पर सरकार अपने साथ कई सहयोगियों, अलग-अलग किस्मों के जादू और ज़्यादा उपकरणों के साथ गए.

इस कार्यक्रम ने उन अपेक्षाओं को बदलकर दिया जो पश्चिमी देशों के दर्शक किसी भारतीय जादूगर से रखते थे.

थिएटरों को ताजमहल जैसा बनाया जाता था. यही नहीं, शो में आने वाले दर्शकों का स्वागत सर्कस के हाथी अपनी रंगी हुई सूड़ उठाकर करते थे.

कार्यक्रम का प्रस्तुतीकरण भी बेहद शानदार था जिसमें कई तरह के बैकड्रॉप, कई बार कॉस्ट्यूम का बदला जाना, शानदार लाइटिंग शामिल थी.

लेकिन सरकार के करियर का टर्निंग प्वॉइंट पैनोरामा कार्यक्रम में उनका सनसनीख़ेज शो था. हालांकि, उन दिनों में टेलीविज़न अपने शुरुआती दौर में था लेकिन सरकार इतने अक्लमंद थे कि उन्होंने इसका फायदा उठा लिया. सरकार की तरह किसी भी जादूगर ने इस माध्यम का इतना सफलतापूर्वक इस्तेमाल नहीं किया था.

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अनसुनी की डॉक्टरों की सलाह

सरकार अपने स्टेज़ इफेक्ट्स और ख़ास अंदाज की बदौलत दूसरे कई जादूगरों से कहीं आगे निकल गए. उन्होंने भारतीय जादू को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया.

साल 1970 में डॉक्टरों ने उन्हें ट्रेवल नहीं करने की सलाह दी. लेकिन इसके बावजूद सरकार अपने चार महीने के कार्यक्रम के लिए जापान रवाना हो गए.

छह जनवरी, 1970 को सरकार ने होक्काइडो द्वीप के शिबेत्सू शहर में अपना इंद्रजाल शो किया. लेकिन स्टेज़ छोड़कर बाहर निकलते ही जानलेवा दिल के दौरे ने उनकी जान ले ली. सरकार को दुनिया के कई सम्मानित जादूगरों द्वारा भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई.

जादू की दुनिया का इतिहास लिखने वाले डेविड प्राइस कहते हैं कि जादू की दुनिया में भारत को पश्चिमी दुनिया के जादूगरों से टक्कर लेने के लिए एक महान जादूगर की जरूरत थी और सरकार का शुक्रिया क्योंकि उनकी वजह से भारतीय जादू ने दुनिया में अपनी जगह बनाई है.

पोप की पाठशाला में जादू-टोने की ट्रेनिंग

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