भाजपा के मिशन 'राजस्थान' का हाल

  • 9 जून 2018
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भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान में अपनी चाहत का प्रदेश अध्यक्ष बनाने में कामयाब होता नहीं दिख रहा है.

पार्टी नेतृत्व ने बहुत सोच-समझ कर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया था. मगर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसे स्वीकार नहीं किया.

पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष अशोक परनामी कोई डेढ़ माह पहले अपने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं. मगर उनकी जगह शेखावत की ताजपोशी नहीं हो पा रही है. प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वालों के अनुसार यह पहला मौक़ा है जब किसी भाजपा शासित राज्य में पार्टी हाईकमान अपनी पसंद को ज़मीन पर नहीं उतार सका है.

इस मुद्दे पर पिछले डेढ़ माह से बनी अनिश्चितता में केंद्रीय नेतृत्व के मुकाबिल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मजबूत होकर उभरी हैं.

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'सर्व शक्तिमान' छवि को धक्का

जोधपुर से पहली बार सांसद बने केन्द्रीय मंत्री शेखावत को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की पसंद माना जाता है. पार्टी नेतृत्व से हरी झंडी मिलने के बाद शेखावत ने प्रदेश के कुछ हिस्सों का दौरा किया. लगा कि जल्द ही संगठन की कमान उनके हाथों में होगी.

मगर मुख्यमंत्री का समर्थन करने वाले विधायकों ने दिल्ली में डेरा डाल दिया और शेखावत की नियुक्ति के विरोध में आवाज़ उठाई. बाद में खुद मुख्यमंत्री राजे भी दिल्ली गईं और केंद्रीय नेताओं से मुलाक़ात की. पार्टी हाईकमान राजे को शेखावत के नाम पर राज़ी नहीं कर पाया.

जानकारों के अनुसार इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के पार्टी मामलों में 'सर्व शक्तिमान' होने की छवि को धक्का लगा है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी ने ही खुले तौर पर शेखावत के नाम का विरोध किया. यह दलील दी गई कि शेखावत की नियुक्ति को जाट समुदाय स्वीकार नहीं करेगा.

यह विवाद उस वक्त सामने तब आया जब सत्तारूढ़ बीजेपी ने आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए कमर कसने की तैयारी करनी शुरु की.

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'जन संवाद'

पहले पार्टी नेताओं को उम्मीद थी कि कर्नाटक चुनावों के तुरंत बाद हाईकमान शेखावत के नाम का फरमान जारी कर देगा.

मगर पार्टी में कुछ जानकर कहते है कि कर्नाटक में सरकार बनाने का अवसर गंवाने के बाद केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान के मामले में शिथिल पड़ गया था.

राज्य बीजेपी के मंत्री मुकेश दधीच कहते है कि न पार्टी में कोई विवाद है न कोई मनमुटाव. वो कहते है, "ये सब ख़बरें प्रायोजित है. हक़ीक़त यह है कि पार्टी चुनाव की तैयारी में जी जान से जुटी हुई है."

इसके उल्ट एक पूर्व मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता नाम उजागर न करने की शर्त पर कहते है, "पिछले साढ़े चार साल में संगठन कमज़ोर हुआ है और पार्टी अध्यक्ष परनामी का कार्यकाल काफी निराशाजनक रहा. परनामी को मुख्यमंत्री का विश्वस्त माना जाता है. लेकिन जैसे ही दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट के उपचुनाव में पार्टी की करारी हार हुई, पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने परनामी को इस्तीफ़े के लिए कह दिया."

"मुख्यमंत्री राजे ने केंद्रीय मंत्री शेखावत के बदले प्रदेश पार्टी अध्यक्ष के लिए अपनी ओर से कुछ नाम प्रस्तुत किये हैं. मगर हाईकमान उन नामों पर तैयार नहीं है. इन सबसे बेफिक्र राजे ने अपने दम पर चुनावी दौरे शुरू कर दिए हैं. वो 'जन संवाद' नाम से कार्यक्रम लेकर सूबे के दौरे पर निकल गई हैं."

पार्टी की नीति नियंता

पूर्व मंत्री और बीजेपी विधायक नरपत सिंह राजवी कहते है, "हमें ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे संगठन को गति मिले और उसका विस्तार हो. मुख्यमंत्री ने चुनावी तैयारियों के लिए बीते हफ़्ते ही जयपुर में पार्टी नेताओं और मंत्रियों की एक बड़ी बैठक बुलाई और तैयारियों की थाह ली थी."

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"मगर इस बैठक में अनेक विधायक और सांसद किसी न किसी बहाने गैर हाजिर रहे. निवर्तमान अध्यक्ष परनामी बेशक इस्तीफ़ा दे चुके है मगर ऐसी हर बैठक में वे सक्रिय रहते है."

इस बैठक के ज़रिये वसुंधरा राजे ने संकेत दिया है कि राजस्थान में वे ही पार्टी की नीति नियंता है.

पार्टी के एक कनिष्ठ स्तर के नेता का कहना है, "हालात अच्छे नहीं है. राज्य में गहरा व्यवस्था-विरोधी रुझान है. ये तो ठीक है कि प्रतिपक्ष से कोई बड़ी चुनौती नहीं है. मगर जनता में सरकार के प्रति उत्साह नज़र नहीं आता है."

राजस्थान में बीजेपी की स्थापना के बाद पिछले 38 वर्ष में अब तक 16 अध्यक्ष रह चुके है.

लेकिन जानकार कहते हैं कि दिल्ली और जयपुर के बीच अध्यक्ष पद को लेकर ऐसा गतिरोध पहली बार ही बना है.

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