विवेचना: वो फ़ैसला जिसने बदल दी भारत की राजनीति

  • 12 जून 2018
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Image caption इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेशी के लिए जाती हुईं इंदिरा गांधी

12 जून, 1975 की सुबह दस बजे से पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का कोर्टरूम नंबर 24 खचाखच भर चुका था.

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा पर पूरे देश की नज़रें थीं, क्योंकि वो राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के मामले में फ़ैसला सुनाने जा रहे थे.

मामला 1971 के रायबरेली चुनावों से जुड़ा था. ये वही लोकसभा चुनाव था, जिसमें इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को जबरदस्त क़ामयाबी दिलाई थी. इंदिरा खुद रायबरेली से चुनाव जीती थीं.

उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण को भारी अंतर से हराया था, लेकिन राजनारायण अपनी जीत को लेकर इतने आश्वस्त थे कि नतीजे घोषित होने से पहले ही उनके समर्थकों ने विजय जुलूस निकाल दिया था.

जब परिणाम घोषित हुआ तो राजनारायण के होश उड़ गए.

राजनारायण की अपील

नतीजों के बाद राजनारायण शांत नहीं बैठे, उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया.

उन्होंने अपील की कि, इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग किया है, इसलिए उनका चुनाव निरस्त कर दिया जाए.

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ठीक दस बजे अपने चेंबर से कोर्टरूम में आए. सभी लोग उठकर खड़े हुए.

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Image caption जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा फ़ैसला देने के बाद कोर्ट से बाहर निकलते हुए.

शुरुआत में ही उन्होंने साफ़ कर दिया कि राजनारायण की याचिका में उठाए गए कुछ मुद्दों को उन्होंने सही पाया है.

राजनारायण की याचिका में जो सात मुद्दे इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ गिनाए गए थे, उनमें से पांच में तो जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को राहत दे दी थी, लेकिन दो मुद्दों पर उन्होंने इंदिरा गांधी को दोषी पाया था.

फ़ैसले के अनुसार, जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत अगले छह सालों तक इंदिरा गांधी को लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया गया.

भारतीय राजनीति से जुड़ा ऐतिहासिक मुकदमा

मार्च 1975 का महीना. जस्टिस सिन्हा की कोर्ट में दोनों तरफ से दलीलें पेश होने लगीं.

दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस सिन्हा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनका बयान दर्ज कराने के लिए अदालत में पेश होने का आदेश दिया.

तारीख तय की गई 18 मार्च 1975.

भारत के इतिहास में ये पहला मौका था, जब किसी मुक़दमे में प्रधानमंत्री को पेश होना था. जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने भी पेशी की तैयारी की.

जजों को प्रभावित करने की कोशिशें

सवाल ये भी था कि जज के सामने प्रधानमंत्री और बाकी लोगों का शिष्टाचार कैसा हो, क्योंकि अदालत में सिर्फ और सिर्फ़ जज के प्रवेश करने पर ही उपस्थित लोगों के खड़े होने की परंपरा है, पर जब प्रधानमंत्री सामने हो तो...

राजनारायण की ओर से जिरह करने वाले वकील शांति भूषण याद करते हैं, "इंदिरा के कोर्ट में प्रवेश करने से पहले जस्टिस सिन्हा ने कहा, अदालत में लोग तभी खड़े होते हैं जब जज आते हैं, इसलिए इंदिरा गाँधी के आने पर किसी को खड़ा नहीं होना चाहिए. लोगों को प्रवेश के लिए पास बांटे गए थे."

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Image caption अदालत के फ़ैसले के बाद 18 जून को विचार विमर्श के लिए बुलाई गई बैठक से बाहर निकलते कांग्रेसी नेता.

अदालत में इंदिरा गांधी को करीब पांच घंटे तक सवालों के जवाब देने पड़े.

इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों को अंदाज़ा लगने लगा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ जा सकता है. तो ऐसे में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा को प्रभावित करने की कोशिशें भी शुरू हुईं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस डीएस माथुर, इंदिरा गांधी के निजी डॉक्टर केपी माथुर के क़रीबी रिश्तेदार थे.

और चुनाव रद्द कर दिया गया

शांति भूषण बताते हैं कि जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के घर पर जस्टिस माथुर, अपनी पत्नी के साथ पहुंचे.

उन्होंने जस्टिस सिन्हा से कह दिया कि अगर वो राजनारायण वाले मामले में सरकार के अनुकूल फ़ैसला सुनाते हैं, तो उन्हें तुरंत सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया जाएगा.

लेकिन इसका जस्टिस सिन्हा पर कोई असर नहीं हुआ.

जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा कि इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया.

जन प्रतिनिधित्व कानून में इनका इस्तेमाल भी चुनाव कार्यों के लिए करना ग़ैर-क़ानूनी था.

इन्हीं दो मुद्दों को आधार बनाकर जस्टिस सिन्हा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से लोकसभा के लिए हुआ चुनाव निरस्त कर दिया.

साथ ही जस्टिस सिन्हा ने अपने फ़ैसले पर बीस दिन का स्थगन आदेश दे दिया.

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

ना सिर्फ ये भारत में, बल्कि दुनिया के इतिहास में भी पहला मौका था, जब किसी हाईकोर्ट के जज ने किसी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ इस तरह का कोई फैसला सुनाया हो.

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर बताते हैं कि इस फ़ैसले के बाद उनकी मुलाक़ात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जगजीवन राम से हुई.

जगजीवन राम से उन्होंने पूछा कि क्या इंदिरा इस्तीफ़ा देंगी तो उनका कहना था नहीं और अगर ऐसा हुआ तो पार्टी में घमासान मच जाएगा.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद इंदिरा गांधी की तरफ से पैरवी करने के लिए मशहूर वकील एन पालखीवाला को बुलाया गया.

आख़िरकार इंदिरा गांधी की तरफ से अपील सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई 22 जून 1975 को और वैकेशन जज जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर के सामने ये अपील आई.

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Image caption इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में इंदिरा गांधी की पैरवी के लिए मशहूर वकील पालखीवाला को लाया गया.

इंदिरा गांधी की तरफ़ से पालखीवाला ने बात रखी, राजनारायण की तरफ से शांति भूषण अदालत में आए.

जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा था कि उनपर भी इस केस को लेकर दवाब बनाने की कोशिश हुई.

जस्टिस कृष्ण अय्यर ने स्वीकार किया था कि देश के कानून मंत्री गोखले ने उनसे मिलने के लिए फ़ोन किया था.

झटका और इमरजेंसी की घोषणा

24 जून, 1975 को जस्टिस अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर स्थगन आदेश तो दे दिया, लेकिन ये पूर्ण स्थगन आदेश न होकर आंशिक स्थगन आदेश था.

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Image caption सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद बाहर निकलते हुए राजनारायण और शांति भूषण.

जस्टिस अय्यर ने फ़ैसला दिया था कि इंदिरा गांधी संसद की कार्यवाही में भाग तो ले सकती हैं लेकिन वोट नहीं कर सकतीं.

यानी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के मुताबिक, इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता चालू रह सकती थी.

जस्टिस अय्यर के इस फ़ैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी पर अपने हमले तेज़ कर दिए.

और 25 जून को दिल्ली में जयप्रकाश नारायण की रैली रामलीला मैदान में हुई.

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Image caption 25 जून के जयप्रकाश नारायण ने रामलीला मैदान में रैली की, जिसके तत्काल बाद इमरजेंसी की घोषणा हो गई.

और इसी रैली के बाद इंदिरा गांधी ने आधी रात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी.

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