कश्मीर पर भारत को नाराज़ करने वाला यह प्रिंस

  • 17 जून 2018
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Image caption संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों के उच्चायुक्त ज़ेद बिन राद अल हुसैन

संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त ज़ेद बिन राद अल-हुसैन की भारत प्रशासित कश्मीर पर हालिया को रिपोर्ट को लेकर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है.

भारत का कहना है कि इस रिपोर्ट में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह है. इस रिपोर्ट में भारत प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की बात कही गई है.

49 पन्नों की इस रिपोर्ट में जुलाई 2016 से अप्रैल 2018 तक होने वाली घटनाओं का ज़िक्र किया गया है.

भारत ने संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट को पूरी तरह से ख़ारिज करते हुए कहा है कि यह भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है और भारत की क्षेत्रीय एकता के ख़िलाफ़ है.

संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उचायुक्त ज़ेद बिन राद अल हुसैन ने यह रिपोर्ट जारी की है. उन्होंने इस रिपोर्ट में कश्मीरियों पर होने वाले कथित अत्याचारों की जांच के लिए एक अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग बनाने की भी बात कही है.

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कौन हैं प्रिंस ज़ेद राद अल हुसैन?

प्रिंस ज़ेद राद अल हुसैन जॉर्डन के शाही परिवार के सदस्य हैं. उन्होंने जॉन्स होपकिंस यूनिवर्सिटी से बीए किया है वहीं कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से फिलॉस्फी में पीएचडी की है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार साल 1989 में प्रिंस ज़ेद को जॉर्डन डेसर्ट पुलिस की तरफ़ से अधिकारी का पद भी कमिशन किया गया था. प्रिंस ने इस पद पर साल 1994 तक काम किया.

हुसैन संयुक्त राष्ट्र में सितंबर 2010 से जुलाई 2014 तक जॉर्डन के राजदूत रह चुके हैं. जनवरी 2014 में ही हुसैन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष बने थे और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक कांगो और लाइबेरिया पर बनी सुरक्षा परिषद की 1533 और 1521 समितियों की अध्यक्षता की.

जॉर्डन के प्रिंस ने परमाणु सुरक्षा पर वॉशिंगटन सम्मेलन में महिलाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कोष (यूएनआईएफईएम) की परामर्श समिति की अध्यक्षता भी की.

जब ज़ेद को मानवाधिकार उच्चायुक्त नियुक्त किया गया तब कई मानवाधिकार से जुड़ी कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने उनका यह कहते हुए स्वागत किया था कि वे अरब देशों से ताल्लुक रखते हैं और मुस्लिम हैं.

ऐसे में वो संयुक्त राष्ट्र में मौजूद पश्चिमी देश और एशियाई देशों (विशेषककर इस्लामिक देश) के बीच की खाई को पाटने में अहम योगदान देंगे.

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Image caption ज़ेद राद अल हुसैन

पहले भी की भारत की आलोचना

प्रिंस ज़ेद ने जून 2014 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त का पद संभाला. मतलब जिस वक़्त भारत की सत्ता मोदी के हाथों में आई उसी वक़्त ज़ेद के हाथों में यूएन में मानवाधिकार की.

कश्मीर पर ताज़ा रिपोर्ट से पहले भी ज़ेद भारत सरकार की आलोचना कर चुके हैं. पिछले साल सितंबर में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के 36वें सत्र में रोहिंग्या समस्या के प्रति भारत सरकार के रवैये की आलोचना की थी.

उस समय भी भारत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि संयुक्त राष्ट्र ने किसी एक घटना को काफ़ी विस्तार देकर उसे समाज की व्यापक समस्या बताया है.

साल 2014 में जब प्रिंस ज़ेद को संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त के तौर पर नामांकित किया गया था तब ह्यूमन राइट वॉच संगठन के कार्यकारी निदेशक केनैथ रोथ ने उन्हें मानवाधिकारों से जुड़े काफ़ी अच्छे रिकॉर्ड रखने वाला व्यक्ति बताया था.

उसी दौरान फॉरेन पॉलिसी वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख में बताया गया कि ज़ेद ने यौन हिंसा के ख़िलाफ़ काफ़ी अच्छा काम किया था.

ज़ेद संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अध्यक्ष बान की मून के वरिष्ठ सलाहकार समूह में शामिल पांच प्रमुख विशेषज्ञों में से एक थे.

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जब संयुक्त राष्ट्र के शक्तिशाली देशों को लगाई फटकार

इसी साल फ़रवरी माह में ज़ेद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर रखने वाले सबसे शक्तिशाली देशों को ज़बर्दस्त तरीक़े से फटकार लगाई थी.

सीबीएस न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अपने भाषण में किसी एक देश का नाम तो नहीं लिया था, लेकिन उन्होंने सीरिया में जारी युद्ध की तरफ़ सीधा संकेत दिया था.

सीरिया में रूस का समर्थन राष्ट्रपति बशर अल-असद को है जबकि चीन लगातार अपनी वीटो ताक़त के दम पर युद्ध के आरोपियों को बचाने की कोशिश करता रहा है.

सीरिया में जारी युद्ध में असद सरकार पर रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल के आरोप भी लगते रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ब्रिटेन, चीन, फ़्रांस, रूस और अमरीका के पास वीटो ताक़त है.

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केमिकल हमले की जांच

ज़ेद ने कहा था कि दुनिया की कुछ जगहें इंसानों के लिए कसाईखाने बन गए हैं. इसमें उन्होंने सीरिया के पूर्वी ग़ूटा, कांगो के इतुरी और कासाई इलाक़े, यमन का ताएज शहर और म्यांमार के रख़ाइन प्रांत का ज़िक्र किया था.

अपने देश के आलोचक हैं ज़ेद

प्रिंस ज़ेद ने जब से संयुक्त राष्ट्र में मानवााधिकार उच्चायुक्त का पद संभाला है, तब से उन्होंने दुनिया भर में कई जगह पर मानवाधिकारों के उल्लंघन पर आवाज़ उठाई है, लेकिन कई देश ज़ेद पर पक्षपाती रवैया अपनाने के आरोप भी लगाते हैं.

द इकॉनोमिक टाइम्स में प्रकाशित लेख के अनुसार ज़ेद जॉर्डन के राजा अबदुल्ला द्वितीय के चचेरे भाई हैं. जॉर्डन ने अपने देश में मृत्युदंड एक बार फिर लागू किया और साल 2014 में इसके अंतर्गत 11 लोगों को मौत को सज़ा दी गई.

प्रिंस ज़ेद ने अपने देश में मृत्युदंड के क़ानून पर आठ साल से लागू प्रतिबंध को ख़त्म करने का विरोध किया था.

सूडान के राष्ट्रपति ओमर अल बशीर के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट ने गिरफ़्तारी वॉरंट जारी किया हुआ है, पिछले साल जब ओमर अल बशीर जॉर्डन पहुंचे तो ज़ेद ने यह कहते हुए अपने देश की आलोचना की कि जॉर्डन दंड और न्याय के मसले में लगातार विफल होता जा रहा है.

पिछले कुछ वक़्त में भारत और जॉर्डन के संबंध भी घनिष्ठ हुए हैं. इसी साल फ़रवरी महीने में भारतीय प्रधानमंत्री जब फ़लस्तीन, जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात की अपनी तीन देशों की यात्रा पर निकले थे तब फ़लस्तीन जाने के लिए जॉर्डन की सरकार ने उन्हें अपना हेलिकॉप्टर दिया था.

वहीं जॉर्डन पहुंचने के बाद मोदी ने किंग अब्दुल्लाह द्वितीय के साथ अपनी मुलाक़ात को बेहद शानदार बताया था. इसके बाद मार्च की शुरुआत में जॉर्डन के किंग अब्दुल्लाह द्वितीय भारत के तीन दिन के दौरे पर आए थे.

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दूसरा कार्यकाल नहीं चाहते ज़ेद

पिछले साल दिसंबर में ज़ेद ने कहा था कि वो संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त पद पर दूसरा कार्यकाल नहीं चाहते. यह पद चार साल के लिए होता है.

द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार अपने सहयोगियों को भेजे एक ईमेल में उन्होंने इसकी जानकारी दी थी. इसमें बताया गया कि ज़ेद ने कई ताक़तवर देशों की खुलकर आलोचना की है, जिसमें ट्रंप प्रशासन भी शामिल है.

ज़ेद अब दोबारा चार साल का कार्यकाल इसलिए नहीं चाहते, क्योंकि वे किसी के आगे झुकना नहीं चाहते.

अपने छोटे से ईमेल में ज़ेद ने लिखा था, ''मैंने फ़ैसला किया है कि मैं दूसरा कार्यकाल नहीं चाहता. मैं इसके लिए किसी के आगे झुकना नहीं चाहता. इसके लिए मुझे अपनी स्वतंत्र आवाज़ को बंद करना होगा.''

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