ब्लॉग: मोदी सरकार की ज़िम्मेदारी, नैतिकता, इस्तीफ़ा और विश्वसनीयता

  • 19 जून 2018
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  • 26 नवंबर 1956: रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने तमिलनाडु के अरियालूर में हुई रेल दुर्घटना के बाद नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
  • 5 अगस्त 1999: बंगाल के गइसाल में हुई दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
  • 22 अगस्त 2017: अनेक रेल दुर्घटनाओं के बाद सुरेश प्रभु ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देने की पेशकश की, लेकिन वे पद से इस्तीफ़ा देने वाले तीसरे भारतीय रेल मंत्री नहीं बन सके.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि विपक्ष के ज़ोरदार हंगामे और जनता में गहरे रोष के बाद भी उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया, इस्तीफ़ा देने की महज पेशकश की, पीएम ने बस इतना ही कहा कि 'इंतज़ार करिए.' इसके क़रीब दस दिन बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ.

ट्विटर पर शिकायत कर रहे यात्रियों को दूध का डिब्बा और बच्चों की नैपी भिजवाने के लिए सुर्खियाँ बटोरने वाले सुरेश प्रभु ने अगस्त 2017 में राज्यसभा को बताया था कि उनके कार्यकाल में 200 से ज्यादा छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएँ हुई थीं जिनमें 330 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

यहीं बुलेट ट्रेन के सपने और रेल सेवा की मौजूदा हालत पर भी ग़ौर कर लीजिए, लेकिन फ़िलहाल इरादा किसी एक विभाग या मंत्री की काबिलियत की चर्चा करने का नहीं है.

कितनी दिलचस्प बात है कि कैबिनेट में फेरबदल के बाद सुरेश प्रभु को पूरे देश का उद्योग-व्यापार चलाने के साथ-साथ हवाई ज़हाज़ उड़ाने का काम भी दे दिया गया. चार साल पूरा होने पर सरकार ने अपनी जो 54 उपलब्धियाँ गिनाईं उनमें से एक ये भी है कि एसी श्रेणी में रेल में जितने लोग सफ़र कर रहे हैं, उससे ज्यादा लोग उड़ान भर रहे हैं. क्या ये याद दिलाना होगा कि रेल सरकार चलाती है, एयर इंडिया को छोड़कर बाकी सारी एयरलाइनें प्राइवेट हैं.

सरकार का काम करने का तरीक़ा

अगर आप ग़ौर से देखें तो पाएँगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम कर रही सरकार के सोचने का ढंग अलग है, पीएम मोदी के 'इंतज़ार करिए' में गहरे अर्थ छिपे हैं.

काफ़ी पहले ही सरकार की नीति का इज़हार देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर चुके हैं, ललित मोदी के देश से भाग निकलने के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनका बचाव किया था, जिसके बाद विदेश मंत्री के इस्तीफ़े की माँग विपक्ष ने की थी.

जून 2015 में केंद्र सरकार के दो मंत्रियों ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की, रविशंकर प्रसाद और राजनाथ सिंह दोनों मौजूद थे. राजनाथ सिंह ने कहा, "ये एनडीए की सरकार है, मंत्रियों के इस्तीफ़े यूपीए में होते हैं, हमारे यहाँ नहीं."

उन्होंने सच कहा था, इस सरकार में कोई इस्तीफ़ा नहीं हुआ, किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति को उसके पद से नहीं हटाया गया, अगर हटाया भी गया तो इस बात का ख़याल रखा गया कि सरकार ये मानती हुई न दिखे कि कुछ कमी-कोताही हो गई है.

ख़ुद को 'गंगा मइया का बेटा' कहने वाला व्यक्ति देश और सरकार चला रहा है, गंगा सफ़ाई में विशेष प्रगति नहीं हुई, साध्वी उमा भारती का तबादला पेयजल मंत्रालय में हो गया, सड़कें बनवाने में लगे नितिन गडकरी अब गंगा भी साफ़ कराएँगे.

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मंत्रालय किसी और का, जवाब कोई और दे रहा

एक दिलचस्प ट्रेंड ये है कि मामला जिस मंत्री के विभाग का हो उसे छोड़कर बाक़ी दूसरे मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं. राफ़ेल के सौदे पर सवाल उठे तो जवाब देने के लिए क़ानून मंत्री और वित्त मंत्री आगे आए, इसी तरह नीरव मोदी के मामले में बचाव का ज़िम्मा निर्मला सीतारमण को दिया गया. ये अकारण नहीं है, मंत्री का कुछ भी कहना ज़िम्मेदारी लेना है.

मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गर्वनेंस' का नारा देने वाले पीएम के सत्ता में आने के कुछ समय बाद एक तस्वीर सामने आई थी जिनमें केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन क्लासरूम में स्टूडेंट की तरह खड़े हैं, बताया गया कि मोदी जी का काम करने का तरीक़ा ज़ोरदार है, जो काम नहीं करता उसकी क्लास लगा देते हैं.

किसानी के संकट, बढ़ती बेरोज़गारी, वित्त मंत्रालय की पीएनबी जैसे घोटाले रोकने में नाकामी, जीएसटी और नोटबंदी को लागू करने में हुई अनेक गड़बड़ियाँ, इन सबके लिए हर्षवर्धन के बाद किसी की क्लास लगी हो ऐसा दिखा तो नहीं, इसकी वजह है कि मौजूदा सरकार चार चीज़ों पर भरोसा करने लगी है- मीडिया का रोज़ का नया ड्रामा, प्रवक्ता की 'तब तुम कहाँ थे, 'आपको सवाल पूछने का कोई हक़ नहीं' वाली दलील, धुआँधार प्रचार और जनता की कमज़ोर स्मरण शक्ति.

सच ये है कि इस सरकार ने छोटे से छोटे स्तर पर राजकाज की फजीहत कराने वाले किसी व्यक्ति का बाल भी बाँका नहीं होने दिया, सरकार ने मान लिया है कि किसी पर कार्रवाई करने या किसी ग़लती या कमी को स्वीकार करना कमज़ोरी की निशानी है, सही हो या ग़लत डटे रहो या फिर चुप हो जाओ.

एक नई तरह की संस्कृति पैदा हो रही है जिसमें किसी की बर्ख़ास्तगी या निलंबन नहीं होता, उन्हें चंदा कोचर की तरह छुट्टी पर भेज दिया जाता है, माहौल नहीं बिगड़ना चाहिए, बाक़ी चाहे जो कुछ बिगड़े.

सही हो या ग़लत, डटे रहो

कितनी ही मिसालें दी जा सकती हैं, बिल्कुल ताज़ा या चार साल पुरानी. इसी साल दो मई को ये ख़बर आई कि बिहार में मोतिहारी में एक बस में आग लगने से 27 लोग झुलसकर मर गए हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गहरी संवेदना प्रकट की, देश के प्रधानमंत्री ने ट्विटर पर गहरा दुख जताया, दो दिन बाद पता चला कि किसी की मौत नहीं हुई है.

ये घटना दिखाती है कि सरकार और उसके कारिंदे कैसे काम कर रहे हैं, किसने और कैसे बताया कि इतने लोग मरे हैं, जिस घटना पर देश के प्रधानमंत्री व्यथित हों उस घटना की जाँच किसने और कैसे की, कब और किसको रिपोर्ट दी? बिना किसी पुख़्ता जानकारी के सीएम और पीएम क्यों और कैसे दुख प्रकट करने लगे? कई बार जब उन्हें दुख प्रकट करना चाहिए तब लोग इंतज़ार ही करते रह जाते हैं. इस मामले में भी 'कोई बात नहीं लोग याद नहीं रखेंगे' वाला रवैया ही कायम रहा.

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सरकार का रवैया

सवाल ही नहीं उठता कि कोई मान ले कि कहीं ग़लती हो गई है, बताया गया कि माल लेकर नीरव मोदी का भागना पिछली सरकार की ग़लती थी, इस सरकार ने नीरव मोदी का पासपोर्ट रद्द करके प्रेस को बता दिया, लेकिन इंटरनेशनल एजेंसियों से तालमेल के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है? नीरव मोदी रद्द पासपोर्ट पर यात्रा करते रहे, कोई बताएगा कौन ज़िम्मेदार था?

मंत्री तो जाने दीजिए, बनारस में यूनिवर्सिटी की लड़कियों पर लाठी चलवाने वाले वीसी को अपना कार्यकाल पूरा करके सम्मान और शांति के साथ बाहर जाने का रास्ता दिया गया. राजभवन के कर्मचारियों के यौन शोषण के आरोप में फंसे मेघालय के गवर्नर शनमुगनाथन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक थे, उनके ख़िलाफ़ बड़ी संख्या में महिला कर्मचारियों ने गंभीर लिखित शिकायत की थी, लेकिन उन्हें शांति से इस्तीफ़ा देकर निकल जाने दिया गया, पद से हटाया नहीं गया.

इसी तरह आधी रात एक लड़की का पीछा करने वाले विकास बराला के पिता सुभाष बराला हरियाणा में प्रदेश अध्यक्ष बने रहे.

राम रहीम की गिरफ़्तारी के वक़्त हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर सरकार की नाकामी और गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में अनेक बच्चों की मौत, गायों के लिए एंबुलेंस चलाने वाले रघुवर दास के राज्य झारखंड में भूख से हुई मौतें, व्यापम घोटाले की जाँच से जुड़े पचास से अधिक लोगों की असमय मौत जैसी अनेक मिसालें हैं, लेकिन आनंदीबेन पटेल के अपवाद को छोड़कर, किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बदला गया क्योंकि सोच ये है कि 'मुख्यमंत्री का क्या है, प्रचार तो मोदीजी को ही करना है'.

कांग्रेस और विपक्ष के लिए नए मंत्र

राजनीतिक पार्टी चाहे कोई हो, नेता से नैतिकता की उम्मीद करना नासमझी है. सारी पार्टियाँ पहले भी राजनीति कर रही थीं, अब भी कर रही हैं, आगे भी करेंगी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीति के तेवर बहुत बदले हैं, दिखावे के लिए भी कुछ करने की ज़रूरत नहीं रह गई है.

1956 में इस्तीफ़ा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री आगे चलकर देश के प्रधानमंत्री बने, देश उन्हें एक ईमानदार प्रधानमंत्री के तौर पर याद रखता है, उन्होंने आगे चलकर पीएम बनने की चाल के तौर पर रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा नहीं दिया था.

शास्त्री ने 1956 में ही दो महीने पहले महबूबनगर में हुए रेल हादसे के बाद भी रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देने की बात कही थी जिसे नेहरू ने अस्वीकार कर दिया था. नेहरू ने दूसरी बार इस्तीफ़े को स्वीकार करते हुए संसद में कहा था कि "शास्त्री ऊँचे आदर्शों वाले व्यक्ति हैं, हादसों से ये सबसे ज्यादा दुखी हैं, ये नैतिकता और संवैधानिक ज़िम्मेदारी मानते हुए इस्तीफ़ा दे रहे हैं, ये न समझा जाए कि इन्होंने कुछ ग़लत किया है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उच्च मानदंडों की मिसाल स्थापित करने के लिए ये इस्तीफ़ा स्वीकार किया जा रहा है".

सुरेश प्रभु के इस्तीफ़े की पेशकश और शास्त्री के इस्तीफ़े में जो अंतर है, वही अंतर इस देश के राजनीतिक-सार्वजनिक जीवन में आ चुका है, नेहरू ने जैसे शास्त्री का इस्तीफ़ा स्वीकार किया और पीएम मोदी ने जैसे प्रभु का तबादला किया वह राजनीति के मानकों में बदलाव को दिखाता है.

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विपक्ष भी उसी राह पर

कांग्रेस के कलंक पर महाग्रंथ पहले ही तैयार हैं, नेहरू के दौर से लेकर मनमोहन सिंह के कोलगेट तक ढेर सारी चीज़ें गिनाई जा सकती हैं, जब कांग्रेस ने हर तरह के कारनामे-घोटाले किए, लेकिन उसे अपनी पब्लिक इमेज की चिंता रही.

मिसाल के तौर पर नवंबर 2008 के मुंबई पर हमलों के बाद फ़िल्मी एक्टर रितेश देशमुख के पिता विलासराव देशमुख को इस गुनाह के लिए मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया क्योंकि वे रामगोपाल वर्मा को ताज होटल दिखाने ले गए थे, वे हमले पर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे. तब जनभावनाओं का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री बदल दिया गया, अब पूछा जाएगा कि "इसमें क्या बुराई है?"

कहने का ये मतलब नहीं है कि कांग्रेस साफ़-सुथरी और निष्कलंक पार्टी है, लेकिन पिछले चार सालों में जो मानक स्थापित किए गए हैं उनसे कांग्रेस सीखना शुरू कर चुकी है, राहुल गांधी का 'कोको कोला शिकंजी' मोदी के 'बिहार में तक्षशिला' की नक़ल है, जिसका सार ये है कि कुछ भी बोलो, ज़ोर से बोलो, सब चलता है.

केवल कांग्रेस नहीं, पूरा विपक्ष सीख रहा है, मंगलयान की लागत से कई गुना ज्यादा पैसा अपने प्रचार पर ख़र्च करने वाले मोदी से तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव, पश्चिम बंगाल की ममता बैनर्जी और आंध्र के चंद्रबाबू नायडू भी सीख रहे हैं, केजरीवाल तो पहले से ही प्रचार की राजनीति के चैम्पियन रहे हैं. जनता का पैसा ख़र्च करके दिल्ली के हिंदी-अँग्रेज़ी अख़बारों में क्षेत्रीय नेता फ्रंटपेज पर विज्ञापन छपवा रहे हैं कि कैसे उन्होंने अपने राज्य को स्वर्ग बना दिया है.

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बंगाल और केरल में सत्ताधारी पार्टियाँ सीख रही हैं कि सरकार में रहते हुए, पुलिस-प्रशासन चलाते हुए, राजनीतिक हिंसा की ज़िम्मेदारी से पल्ला कैसे झाड़ा जा सकता है. अब एक राष्ट्रीय आम सहमति बन चुकी है कि छवि की एक सीमा से ज़्यादा परवाह नहीं करनी चाहिए, उसे मैनेज किया जा सकता है.

कर्नाटक में कुमारस्वामी ने सातवीं पास व्यक्ति को उच्च शिक्षा का मंत्री बना दिया है और पूरे आत्मविश्वास के साथ पूछ रहे हैं कि इसमें क्या ग़लत है? वे जानते हैं कि जब प्रधानमंत्री से लेकर मानव संसाधन मंत्री रह चुकीं स्मृति ईरानी की डिग्री सवालों के घेरे में है तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेगा?

पार्टियों की सियासत से परे ये सोचने का समय है कि विश्वसनीयता, नैतिकता, आदर्श, ईमानदारी और ज़िम्मेदारी जैसे शब्दों का कोई मतलब दिखावे के लिए भी न रह जाए तो इसका नतीजा लोकतंत्र के लिए कैसा होगा.

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